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Thursday, 12 September 2013

----- ।। गुजरे-लम्हे ॥ -----

दिल के दोज़े-दराजा में इक दर्दे-ग़म का दरिया है.., 
पलकों की फलक परवाजों पे कतरा होना पड़ता है..,

अर्शे-जमीं हो जाने को फ़र्शे-ख़ाक बेचैन होती है.., 
नज़रों के दर-पेश-दरवाजों पे ज़र्रा होना पड़ता है.., 

आहों उफतादों की लहरें फ़र्के-फ़राज उफनती हैं.., 
बल्सुम सियाही कनारों पे सजदा होना पड़ता है.., 

बुर्जे-बुलंद सी आवाजें सैलाबी तमन्ना रखती है..,
चश्मे-रुदाद की आबे-ऱौ में दर्रा होना पड़ता है..,   

मुबतिल मजमून से जज्बे जब फ़र्राटे भरते हैं.., 
नफ़्स कशीदे-नजीरे-नज़र, फ़र्दा होना पड़ता है.., 

मरसिया ख्वाँ की महफिल शम्मे-सोजाँ रौशन है..,  
चाक जजीरों के चश्मे-जद  पर्दा होना पड़ता है.., 

बरहमे-अकस मौजे-बर वक्त कहरे-इलाही चाहे.., 
सदीयों के नूर नज़ारों को लम्हा होना पड़ता है..... 


Wednesday, 11 September 2013

----- ।। गुजरे-लम्हे ॥ -----

काफ़ तलक दुन्या है खुदा बंद का कारख़ाना है.., 
जिस्मों की ज़र निगारी है रूहों का तानाबाना है..,


निंदों का आसमाँ है और ख़्वाबों के परिंदे हैं..,
पलकों की बंदिशे में कैदे-उल्फत का जमाना है..,

खलाओं की रिंद राहें हैं बादे-सबा रहबर है..,
मौसम के बाग़बानों में बहारे-गुल बदाना है..,

शब् के शोख पंखों पर जहां सितारे खिलते हैं..,
रोज़े-अलस्सबाह की नर्म बाहों में समाना है..,

दीवारे-दर पे दस्ती की रौगने ताब सियाही है..,
बादलों की बस्ती में बारिशों का आशियाना है..,

बर्के दानी रौशन है दिलकश खुद आसाई है.., 
कतरों की शक्ल सूरत,दरिया का आनाजाना है..,

गर्दिशों के पेशे-दर गर्दूँ  की गुज़र बानी है..,
खलक के ख़ान काहों में आबोदाँ का खज़ाना है  

 सदीयों के जुज बंदी पर काबा-ओ-कलीसा है.., 
रोज़े-दर के ज़ीने चढ़ बरसों का आस्ताना है..... 

खुदा बंद का कारख़ाना = ईश्वर का इंद्रजाल 
अलस्सबाह = तड़के 
दस्ती की = हाथ की 
रौगने ताब सियाही= चमकते  हुए काले रंग की पुताई 
खुद आसाई =बनाव-श्रृंगार 
गर्दूँ = आसमान 
खलक =जीव जगत 
ख़ान काहों = दरगाह 
जुज बंदी=क्रमबद्ध 
काबा-ओ-कलीसा = मस्जिद और मंदिर 
आस्ताना = सजदा का पत्थर 

Thursday, 4 July 2013

----- ।। गुजरे-लम्हे ॥ -----

  प्रकाशन तिथि : --  7-11-2011  

एक लहर उतर गए साहिल भिगो गए..,
एक नजर उतर गए लबों का तिल भिगो गए..,
ओ नील समंदर गहरे हो इस कदर..,
तुम रूह से उतर गए तो दिल भिगो गए..,

आंस्ती में आफताब है आंस्ती में है जहर..,
आबरू से उतर गए तो कातिल भी हो गए..,

तेरा फलसफा देख लिया, मशगला देख लिया..,
जहां से उढ उढकर हमने, जलजला देख लिया..,

देंखे तेरी सफ्फाकी और देखें तेरा सफ़र..,
हम जुनूं से उतर गए तो मराहिल भी हो गए..,

देंखे आईने शफक और देंखें तेरा शहर.,
चारसूं से उतर गए तो मंजिल भी हो गए..,

बादबाने कश्ती हम हो के तरबतर..,
जुस्तजू से उतर गए तो काबिल भी हो गए..,

देखे तुन्हें अगर कोई देखे हमें अगर..,
हुबहू से उतर गए तो मुश्किल भी हो गए..,

उढ़ता तेरा जोबन..,
बांहों में आबोदाना..,
वो बलखाती लहरें..,
एक एक कर आना जाना..,

लहजा है आशिकाना..,
लुक छूप के दिल चुराना..,
वस्ता उनवां वल्लाह..,
पुरकश मुस्कराना..,

छम छम करता पानी..,
है शोर खानदानी..,
एक हद सराबोर हो..,
आये जो दरम्यानी..,

पढ़के तेरा सफीना..,
हो जाए चाके सीना..,
मुश्तहर मुक़द्दस..,
जैसे के हो मदीना..,

दामन तेरा सिलाबी..,
रुखसार महताबी..,
जब रंग हो गुलाबी..,
तासीर तेरी सैलाबी..,

महबुबो दरियाई..,
दिलकश तेरी रियाई..,
मुस्तफा मुजस्सम..,
घुलती रही स्याही..,

मौजों पे साफगोई..,
जैसे हो ताज कोई..,
शिकस्ती फिर अदाएं..,
मुमताजी सी वफायें..,

रेतों का आशियाना..,
चुपके से तोड़ जाना..,
बेशकीमती खजाना..,
हंस हंस के छोड़ जाना..,

अमरत अब्र में है और है अरब-ओ-गौहर..,
बिस्मिल भी हो गए कभी साइल भी हो गए.....

Wednesday, 3 July 2013

----- ।। गुजरे-लम्हे ॥ -----

 प्रकाशन तिथि : -- 20-4-2012                  

गुलसिताँ ने गुल, आस्तां ने संग देखे हैं..,
समंदर ने कतरे कतरे में धनक के रंग देखे है.....
धनक = इन्द्रधनुष 

महताब उतर गया इक पायदां जमाल पर..,
समंदर कहे छोड़ दे मुझे हाजिरे-हाल पर..,


शमईं समाँ पे चाँदनी लुटा रही है रौशनी..,
हर सिम्त रौजा वां जवां वस्ल-ए-हिलाल पर..,


नगमगी सी शाम पर मुन्तही ता-सहर..,
शहाब की नालिशें रौ आबे-लाल पर..,


सुलग सुलग ऐ साहिल गर्मां ये सर्दे-दिल..,
इश्क की लहर लहर हुस्न के उबाल पर..,


उम्र दराज तमाम माह सूरते-विसाल पर..,
है रायगाँ है रायगाँ मिसालें बेमिसाल पर.....

वस्ल-ए- हिलाल = नए और आखरी चाँद का मिलन 

शहाब = कुसुम को भिगोकर निकाला जाने वाला लाल रंग 
नालिशें =फ़रियाद 
रौ आबे-लाल = बहते हुवे पानी का  माणिक स्वरूप