Thursday, 26 June 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड १६ ॥ -----

सुनत लखन सँदेसु यह प्रियकर । लहे दिए निर्देस कानन धर ॥ 
अस्त्र सस्त्र सब आयुध धारी । समर सिर सूरवाँ अनहारी ॥ 
लक्ष्मण का यह प्रिय यह हर्ष उत्पन्न करने वाला सन्देश श्रवण कर सेनापति कालजीत ने भ्राता लक्ष्मण के निर्देशों को फिर ध्यान पूर्वक सुना ॥ ( भ्राता लक्ष्मण ने कहा : -- ) अस्त शस्त्र एवं सभी आयुधों एवं संग्राम हवन में अपने मस्तक की आहुति देने वाले अविजित शूरवीरों को धारण की हुई  : - 

चातुरंगिनी सेन सँवारौ । रघुबर के आयसु अनुहारु ॥ 
जोग कलित सब काल बिनासा । लेख लखन मुख भासित भासा ॥ 
सेना को तैयार करो यह रघवीर की आज्ञा है उसका अनुशरण हो । सेना सभी उपयोगी सामग्रियों से सुसज्जित होनी चाहिए । लक्ष्मण के मुख द्वारा उद्भासित की गई भाषा को समझ कर : -- 

सकल झुझाउन साज सँमराए । जोग जुगित रन चीन्ह धराए ॥ 
सेन जूथ अस ब्यूह रचिते । दरस माहि अरि भय भीत कृते  ॥ 
समस्त रण कारी आयुधों को संवार कर ईवा सभी उपयोगी सामग्रियों को संकलित किए सेना को युद्धोपकरणों से युक्त किया । फिर सैनिक समूहों की ऐसी व्यूहरचना रची कि वह दर्शन मात्र से शत्रु को भयभीत कर दे ॥ 

बहुरि कालजित समुख पधारे । लखन नयन तब जोख निहारे ॥ 
सेनि संख्या दरसत ऐसे । दरसि गगन तारागन जैसे ॥ 
इस प्रकार सेना को तैयार किए  काल जीत भ्राता लक्ष्मण के सम्मुख पधारे । तब भ्राता लक्षमण की तीक्षण दृष्टि ने उस  निरक्षण किया ।। ( साठ सहस्त्र ) सैनिकों की संख्या ऐसी दर्श रही थी जैसे गगन में नक्षत्र का समूह दर्श रहा हो ॥ 

तदनन्तर समरोद्यत , निरखत सैन बिसाल  । 
कहि पुलक अब  कूच करें लखमन सेनापाल ॥ 
तत्पश्चात रण हेतु तैयार सेना का निरीक्षणोपरांत भ्राता लक्ष्मण ने सेनापति कालजीत से पुलकित स्वर में कहा : - अब  कूच कीजिए  । 

सोमवार, ०४ जुलाई,२०१४                                                                                                        

 तरत तरंग सम तूल जूहा । सागर नागर लोक समूहा ॥ 
जब नायक आयसु पाईं । मख मंडप तट उदकत आई ॥ 
उतरती हुई तरंग के समतुल्य वह सैन्य समूह था । नागरिकों एवं लोगों का समुदाय सागर के सरिस था । सैनिक रूपी उन जल तरंगो को जैसे ही नायक की आज्ञा हुई । वे उत्साह पूर्वक यज्ञ मंडप के तट की ओर उमड़ने लगी ॥ 

निकसत बास छतर कर जोटे । चली बाहिनी रबि किए ओटे ॥ 
जूथ चारी सकल रन बीरा । जस रत्नाकर मुकुतिक हीरा ।। 
 छत्र हस्तगत किए सूर्य को भी आच्छादित काटे हुवे सैन्य वाहिनी, अपने निवेश भूमि से  निकली । यूथ चारीयों में समस्त समर मूर्धा एवं समर-शूर मानो उन तरंगों के सह रत्नाकर सेनिकलने  वाले रत्न हों ॥ 

तोमर मुदगल खड्ग प्रचंडा । सजे भुज सिखर धनु  सर षण्डा ॥ 
भर अतुलित बल मुख अस गर्जहिं । गहे गहन रस घन जस तर्जहिं ॥ 
उनके भुजा शिखर  धनुष एवं वाण -समूह सहित तोमर मुद्गल एवं अति तीव्र खड्ग शोभायमान हैं ॥ भुजाओं में अतुलित बल भरकर उनके मुख ऐसे  गर्जना रहें हैं जैसे गंभीर घन अतिशय रस युक्त होकर तरजना कर रहें हो ॥ 

रन कामिन अस प्रगसि उछाहा । किए रवन जल पाए जस बाहा ॥ 
चले बीर जिमि सीख सिखावा । स्फुटित गति पद ताल मिलाबा ।।  
समरोद्यत सैनिक  ऐसे उत्साह प्रकट रहे हैं जैसे वायु प्राप्त  कर सिंधु का जल ध्वनिवन्त् होता हैं ॥ वे वीर  इस भांति चल रहे हाँ जैसा की उन्हें  प्रशिक्षण दिया गया है उनकी पद ताल इलाते हुवे उनकी गति असाधारण है ॥ 

भरे उतमंग परसन तरंग पद उद कांत के जस धावहीं । 
चतुरंगिनी के एक एक अंग मख मंडप तस आवहिं ॥ 
ताल गति बर ढोल डमरू धर दुंदुभी मुख संख बजे । 
सुर मनि बल गीती कंठ कल सकल संगीत समाजु सजे ॥ 
( किरणों से ) भरी मांग से  जिस प्रकार उत्तरङ्ग  समुद्र के चरण तट को स्पर्श करने तीव्र गति से चली आती है ।  सेना भी अपने समस्त अंगों सहित यज्ञ मंडप रूपी तट में उसी प्रकार प्रभु श्रीराम के चरण स्पर्श हेतु चली आ रहीं हैं ॥ ढोल और डमरू हस्तगत हुवे , तालों की श्रेष्ठ गति वरण कर जब मुख में दुंदुभी एवं शंख ध्वनित हो उठे । तब समस्त स्वर, गीतिका मणियों से वलयित होकर संगीत समाज के कल कंठ में सुसज्जित हो उठे ॥ 

सैन सहि पत पंगत हुए , चातुर रँग के साथ ।  
सौमुख सकल सिरु अवनत, निरख रहे रघुनाथ ॥ 
सेना के चतुर अंग पालक सहित पंक्तिबद्ध हुवे  । महाराज श्री रघुनाथ जी निरक्षण कर रहे हैं, और वह  उनके सम्मुख अवनत मुद्रा में है ॥   

रविवार, ०३ जुलाई, २०१४                                                                                                        

इहाँ भरत प्रभु आयसु पाईं । अग्याकारी सेबक नाईं ॥ 
अचरम तुरग भवन पधारे । चयनित हय के रसना धारे ॥ 
इधर भ्राता भरत प्रभु श्री रामचन्द्रजी प्राप्त कर एक आज्ञाकारी  सेवक की भाँती अतिशीघ्र अश्वशाला में पदार्पण किए एवं चयनित मेधीय अश्व की रश्मियाँ धारण किए ।। 

मणि मंडित बहु लमनी ग्रीवा । लसत लवन के नहि कछु सींवा ॥ 
गह रद बिसद बदन के कांति । लघु करन लघु पाँखि के भाँति ॥ 
मणियों मंडित अति प्रलंबित  आकर्षक ग्रीवा, जिसके सौंदर्य  की कोई सीमा नहीं । दन्त युक्त मुख  जिसकी उज्जवल कांति है छोटे छोटे कान छोटे  छोटे पंख की  भाँती लक्षित हो रहे हैं ॥ 

ललित नयन तापर सुठि नासा । बरधे सुहा हरित मुख ग्रासा ॥ 
मुकुतिक माल रतन रतनारे । कलित चरण पुनि बाहिर धारे ॥ 
अभिराम नयन उसपर  एक सुन्दर सी नासिका, मुख में शोभा वर्धन करता हुवा हरित-ग्रास था ।  रत्नारी रत्नों एवं मुक्ता माल्य से विभूषित उस अश्व की जब  अश्वशाला से निकासी हुई 

लागहि  तीर तरंगित ताना । पलासित पोत पीठ पलाना ॥ 
हिरन सकल बल कल मनि खाँचे । आवत जिमि कर धर रबि राँचे ॥ 
॥ तब ऐसा प्रतीत हुवा मानो  पीठ पर अरुणारी पोत उसपर सूत्रों द्वारा तरंगित कग़ारी  युक्त जीन पर आरूढ़ होकर , स्वर्ण कणों  से वलयित एवं सुन्दर मणियों से खचित  किरणों को  हस्तगत किए  स्वयं सूर्यदेव चले आ रहे हों ॥ 

गौर गिरि सम छतर ता ऊपर । द्योत सरिस दुइ धवलित चँवर ॥ 
साधन संपन सकल सरीरा । अस्व बृंद मैं लागत हीरा ॥ 
उसके ऊपर हिमगिरि की भांति श्वेत छत्र और धूप की भांति धवलित दो चँवर ।  इस  प्रकार उस अश्व  का समस्त शरीर विभिन्न शोभा सम्पत्तियों से विभूषित था और वह अश्व समूह में सबसे श्रेष्ठ था ॥  

जेहि भाँति मनु रिषि मुनि देबा । जुगत  जोग श्री हरि के सेबा ॥ 
तेह भाँति बहुतक सेनाचर । करे राख हय के रस्मी धर ॥ 
 जिस प्रकार देवताओं सहित मनुजन, ऋषि मुनि गण, सेवा -योग्य श्री हरि सुश्रुता में नियोजित रहते हैं उसी प्रकार  बहुंत से सेनाचर  रश्मियाँ ग्रहण किए उस अश्व की रक्षा में नियोजित थे । 

खुर न्यास उत्खचित खल , परस रहा आगास । 
हिंसत अस पैठइ अस्व, मख मंडप के पास ॥  
इस प्रकार धरा ऊपर खुर के चिन्ह खचित कर आकाश स्पर्श करता वह अश्व  हिनहिनाते हुवे यज्ञ मंडप के निकट पहुंचा ॥ 

उजरित लघु रोमावली, दस ध्रुवक के चीन्ह । 
कंठ चरन नूपुर धरे, रुरी रुनझुन कीन्हि ॥ 
उज्जवल महीन रोमावलियां उपसार दस ध्रुवक के चीन्ह मधुर स्वर में रुनझुन करते हुवे उसके कंठ एवं चरण 

कलित कमन तन सित बरन, दुइ करन घन स्याम । 
करत लजित रबि रथ किरन , पूजन किए श्रीराम ॥  
श्वेत वर्ण से युक्त उसकी देह घने काल वर्ण से युक्त  दो कर्ण  मानो कामदेव ने स्वयं रचित किया हो किया हो । ऐसी शोभा से युक्त वह अश्व  रवि के रथ की किरणों को लज्जित कर रहा है भगवान श्री राम उसकी पूजा कर रहे हैं ॥ 

मंगलवार, ०५ जुलाई, २०१४                                                                                                   

हय सह अनी आन जब देखे । प्रभु श्री लोचन मुनि पुर पेखे । 
दिरिस पंथ चर लिए तिन घेरे । समयोचित कृत करतन प्रेरे ॥ 
अश्व के सह भगवन ने जब सेना को आते देखा तब उनकी अर्थ पूर्ण दृष्टि  मुनि वशिष्ट को  देखने लगे ।। दृष्टि गोचर पथ पर चली उसने मुनिवर को घेर लिया एवं समयोचित कार्य करने हेतु उन्हें उत्प्रेरित किया ॥ 

सुबरन मई सिया बोलाईं । बहुरि अनुठान हाथ लगाईं ॥ 
कुम्भज मन बिधि काज सँभारे । बाल्मीकि अधबर निरधारे । 
तब बुद्धिमान महर्षि  वशिष्ट ने स्वर्णमयी माता सीता को बुलाया । तत्पश्चात यज्ञ अनुष्ठान को आरम्भ किया ॥ तपोनिधि अगस्त्य मुनि ने ब्रह्मा का ( कृताकृतावेक्षणरूप ) कार्यभार ग्रहण किया । महर्षि वाल्मीकि को  अध्वर्यु बनाए गए ।। 

कन्य भयउ द्वार प्रतिपाला । ले घेर मख कुण्ड बिसाला ॥ 
आठ दुअरि तोरन अस साजे । सुरग पुरी के पौरी  लाजे ॥ 
कण्व को जब द्वारपाल नियुक्त किया गया । तब उन्होंने उस विशाल यज्ञ कुण्ड को चारों और से सुरक्षित कर लिया । यज्ञ स्थल की अष्ट द्वार तोरण से ऐसे सुसज्जित थे जो स्वर्ग-सोपान की भी निंदा कर रहे थे ॥ 

कहत सेष हे बात्स्यायन । रखे राख तँह दुइ दुइ ब्रह्मन ॥ 
पूरब देबल असित आसिते । पिछु जातू करन जाजलि थिते ॥ 
भगवान शेषजी कहते है हे मुनि वात्स्यायन ! उनमें से प्रत्येक द्वार पर दो-दो मंत्र वेत्ता ब्राह्मण बैठाए गए । पूर्व द्वार पर तपस्या के भंडार देवल एवं असित मुनि थे । पश्चित द्वार पर महर्षि जातूकर्ण्य  एवं जाजलि उपस्थित थे ॥ 

उत्तर मुखी दुआरी, द्वित एकत किए राख । 
दक्खन माहि लगे रहे, कस्यप अत्रि के आँख ॥ 
उत्तर मुखी द्वार  द्वित एवं एकत मुनियों द्वारा रक्षित था । दक्षिण में महात्मा कश्यप एवं मुनिवर अत्रि की दृष्टि लगी थी ॥ 

बृहस्पतिवार, ३१ जुलाई,२०१४                                                                                                     

ऊँच मंच मख मंडप साजे । निकट नागर निबासि बिराजे ॥ 
सौहहि  संगी संग संगिनी । गावहि मंगल कंठ भामिनी ॥ 
ऊँचे मंच पर यज्ञ  मंडप स्थापित किया गया । नगर मन निवासित नागरिक गण निकट विराजमान थे ॥ सहधर्मचारि धर्मचारिणियों के संग सुशोभित हो रहे थे ॥ 

देखू बनाउ नैन किए सैने ।  भए मौनी मुख नैनहि बैने ॥
चितइ चितबत कौतुहल कारी । भरि मख भूमि भीड़ भइ भारी ॥ 
यज्ञ भूमि की रचना के दर्शन हेतु जब उनके नयन संकेत करते तब मुख मौन धारण कर लेते, नयन वाणी से युक्त हो जाते  ॥ 

बिधिदर्शीन सब भाँति तोले ।श्रुतानवित बसिष्ठ मुनि बोले ।। 
बिनहि प्रिया मैं बेद बिलोका । धरम कर्म नहि होत त्रिलोका ॥ 
विधिदर्शियों से न्यूनाधिक की विवेचना कर वेद के ज्ञाया मुंवार वशिष्ट बोले । हे त्रिलोकपत ! मैने वेदों का अवलोकन किया है धार्मिक कर्मकांड अर्द्धनिगिनी से रहित होकर धारामिन कर्मकांड पूर्णता को प्राप्त नहीं होते ॥ एतएव इस समय माता सीता की उपस्थिति परम आवश्यक  है ॥ 

रहे मौन प्रभु कछु न उचारें । नत सिरु नयन पलकिन्हि ढारे ॥ 
छाए मख भूमि अस निरबताए । सूचि कर गिरहि सोइ रबनाए ॥ 
मुनिवर के ऐसे वचन  श्रवण प्रभु  मौन मुद्रा धारण कर अनुच्चरित रहे ।  उनका शीश अवनत था एवं दृष्टि पलक पट से अर्धाच्छादित थीं ॥ यज्ञ भूमि में ऐसी नीरवता छा गई कि यदि वहां सूचिका भी गिरे तो वह भी ध्वनित हो उठे ॥ 


कहे प्रभो करु जुगति अस , मुनि मम किरिया जान । 
करौं मैं आपनि करतब, रहे धर्म सनमान ॥  
तदनन्तर प्रभु श्रीराम चन्द्र जी ने कहा : --  हे मुनिवर ! मेरे वचनों को संज्ञान कर कोई ऐसी युक्ति  करिये जिससे मैं अपने कर्त्तव्य भी पूर्ण करूँ एवं धर्म का सम्मान भी रह जाए ॥ 

शुक्रवार, ०१ अगस्त, २०१४                                                                                                        

सिरुनत प्रभु पुनि लए उछबासे । अवनत नयन मंद सुर भासे ॥ 
कहो मुने अस कोउ उपाई । लहे सम्मति सबहि के नाईं ॥ 
अवनत शीश मुद्रा में ही फिर उच्छ्वास लेते हुवे नत लोचन स्वरूप में ही मंद स्वर में बोले । हे मुनिवर ! ऐसा कोई उपाय कहें जो सर्वसम्मत हो ॥ 

तब रिषि नारद मुनिहि मनीषा । किए मंथन मत जोरत सीसा ॥ 
जोग जुगति गुरुबर  सनकादी । सुनौ  बचन कहि परम अनादी ॥ 
तब ऋषि गण, महर्षि नारद  सहित सभी मनीषियों ने सिर जोड़ कर  विचार-विमर्श किया ॥ गुरुवर एवं सनकादि आदि मुनियों ने एक योग्य युक्ति विचार कर कहा : -- हे अनादि पुरुष ! सुनिए ॥ 

सुबरन मई मूरत रचाहू । सील सीय सरि रूप धराहू ॥ 
भगवन सुबुध बचन अनुहारे । रचत मूरत संग बैठारे ॥ 
स्वर्णमयी मूर्ति की रचना कर उसे परम शीलवती श्री सीताजी के सदृश्य रूपानतरित कीजिए ॥ तदोपरांत भगवान श्रीरामचन्द्रजी ने मुनि महर्षियों के कहे वचनों का अनुशरण किया । और कही गई रचना रचित  कर उसे अर्द्धांगिनी स्वरूप में अपने संग विराजित किया ॥ 

 ललित कला  कृति  बूषन साजे । बिचित्र देह बर बसन बिराजे ॥ 
 चित्रकृत कहि चितबत नर नारी । मूरति नहि जगजननि हमारी ॥ 
वह ललित कला कृति श्रेष्ठ आभूषण कलित किए हुवे थी उसके सुगठित वपुर्धर पर श्रेष्ठ वस्त्र विराजित थे । स्तब्ध  नर एवं नारियों  ने कहा : -- अद्भुद !यह मूर्ति नहीं है साक्षात जगज्जननी है ॥ 

 बहुरि जजमान जग्यधर, बिप्रबर परम प्रबीन । 
बाहि जोग मख रथ केतु, किए तिन्ह के अधीन ॥ 
 तत्पश्चात यज्ञ के धारण कर्त्ता पुरुष श्री रामचन्द्र जी ने ( दो सहस्त्र ) वेद-मत से भली भांत परिचित यज्ञन्न विप्रवर को यज्ञ वाह नियुक्त कर यज्ञ-रथ को संचालित करने हेतु यज्ञ-केतु उनके अधीन किया ॥ 

शनिवार, ०२ अगस्त, २०१४                                                                                              

मकर मास रितु सिसिर सुहाई । मख मंडप बैठे रघुराई ॥ 
बोले गुरु जस बेद बखाने । मेधीअ तुरग तस लय आने ॥  
माद्य मास की सुन्दर शिशिर ऋतु में रघुकुल के कान्त श्रीरघुनाथ जी यज्ञा वेदी पर विराजमान हुवे ॥ तत्पश्चात गुरुवर वशिष्ट ने खा जैसा वेदों में वर्णित किया गया है वैसा मेधीय अश्व यज्ञ के मंडप में लाया जाए ॥ 


जोड़न बिनु जज्ञ होए न भाई। सुबरन मई सिया रच साईँ ॥ 
किए गठ जुग जज्ञ बेदी बैठे । बिमौट सह लव कुस तँह पैठे ॥ 
अर्द्धांगिनी के बिना  कोई भी धार्मिक कार्य संपन्न नहीं होता यज्ञ कर्म काण्ड भी नहीं । इस प्रकार भगवान श्रीरामचन्द्र ने स्वर्णमयी सीता की रचना कर गठ बंधन किए यज्ञ वेदी पर विराजमान हुवे  ही थे कि उसी क्षण महर्षि वाल्मीकि भी लव कुश के साथ अयोध्या नगरी पधारे ॥ 

दौनौ बाल पुर पुरौकाई । भँवर भँवर रामायन गाईं ॥ 
मधुर गान रहि अस रस बोरे। पागत श्रवन पुरौकस घोरे॥    
दोनों बालक ने नगर में घूम घूम कर नगर वासियों महर्षि वाल्मीकि द्वारा रचित श्री रामायण महा काव्य का पाठ बांच कर सुनाया ॥ उनका मधुरित गायन रसों में इस प्रकार से डूबा हुवा था कि वह गहरा होकर नगर वासियों के कानों में घुलने लगा ॥ 

बाँधे लय जब दुहु लरिकाई । सुर मेली के गान सुनाईं ॥ 
संग राग छह रंगन लागे । पुर जन के मन मोहन लागे ॥ 
जब दोनों गदेले लय बद्ध होकर सुर को मिलाते हुवे रामायाण की गाथा गा कर सुनाते  तब छहों राग साथ में  तरंगित हो उठते, और उस गान ने अवध वासियों के मन को मोह लिया ॥ 

आगिन गवने सुत रघुराई । पाछू सब जन रमतत  आईं ॥ 
मोद मुदित मुख निगदित जाते । जो तिन्ह जनि धन्य सो माते ॥ 
राजा राम चन्द्र के पुत्र जब थोड़ा आगे चले तो सब जन मुग्ध होते हुवे उनके पीछे पीछे चलने लगे ।। प्रसन्न चित एवं आनन्दित होते हुवे वे अपने मुख से कहते चलते कि जिस माता ने इन पुत्रों को जन्म दिया है वह माता धन्य है ॥ 

जन मुख कीर्ति कीरतन, श्रुत दोनौ निज मात । 
भए भावस्थ ग्रहत प्रवन, वंदन चरन अगाध ॥    
नगर वासियों से अपनी माता की कीर्ति का कीर्तन श्रवण कर, वे भाव में लीन होकर उस कीर्तन का आशय ग्रहण कर वे भाव विभोर हो उठे, अपनी माता के चरणों में उनकी श्रद्धा और अधिक हो गई ॥ 

गुरूवार, २ ७ जून, २ ० १ ३                                                                                        

प्राग समउ मह भारत खंडे । रहहि लघु राज भू के षण्डा ॥ 
कहूँ नदिया कहूँ नद के धारी । घेर बाँध भू किए चिन्हारी  ॥ 
प्राचीन समय में भारत वर्ष की भूमि,सुव्यवस्थित राजनीतिक क्षेत्रों की लघु ईकाइयों का समूह था । कहीं  क्षुद्र तो कहीं वृहदाकार नदियाँ ही राज्य क्षेत्र  की सीमाओं को चिन्हांकित करती थीं ॥ 

तेइ बयस  मह देसिक धारे । रहहि न अबाधित अंतर सारे ॥ 
समाज सन रहि भेद अभेदे । भेद अभेद भेदीहि भेदे ॥ 
उन परिस्थितियों में राष्ट्रीयता की धारा  अपने आतंरिक  विस्तार में अबाधित नहीं थी अर्थात वे बाधित थी  । प्राचीन भारतीय समाज में भेद और अभेद दोनों ही था । भेदी अर्थात भेद अभेद का लाभ लेने वाले  भेद-नीति अपना कर अपना उल्लू सीधा करते ॥ 

सस्य स्यामलि सुमनस सूमिहि । एक छत्र करतन भारत भूमिहि ॥ 
देस भूमि जन घेरन बंधे । चिन्ह तंत्र प्रद पाल प्रबंधे ॥ 
शस्य श्यामल, सौमनस्य, जल से परिपूर्ण इस भारत की भूमि को एकछत्र अर्थात सार्वभौम स्वरूप देने हेतु राज्य का  क्षेत्र एवं उसके वासियों को  अर्थात भारतीय गणराज्य को एक सीमा रेखा में बाँधते हुवे उसकी सीमाओं का चिन्हांकन कर समस्त भारत में एक ही शासन   पद्धति लागू  करने एवं राष्ट्र को संगठित करने के उद्देश्य से  : -- 

महातिमह मख कल्पन धारे । भारत भू एवम एकीकारे ॥ 
एक कौ अश्व मेध जज्ञ कहही । दूजन राज सूय यज्ञ रहहीं ॥  महा यज्ञों की कल्पना की गई थी कि इस यज्ञ विधि से भारत की भूमि का एकीकरण हो ॥ इन  महा यज्ञों में  एक यज्ञ को अश्व मेध यज्ञ कहते हैं दूसरा  राज सूय यज्ञ कहलाता है  ॥ 

प्रतीकतह तजैं एक हय , भँवरि सकल भू बाट । 
जे राउ तेहिं कर धरहि, जोधहि संग सम्राट ॥ 
प्रतीक स्वरूप समस्त राज्यों की वीथीकाओं में एक घोड़ा छोड़ा जाता । जिस राजा ने उस घोड़े की रस्सियों को पकड़ लेता उसे सम्राट के साथ युद्ध करना पड़ता ॥  

बुधवार,०६ अगस्त, २०१४                                                                                                

सब समिंधन समित हबि बाहा । हबिर रसन  दए बोलि सुवाहा ॥ 
उठे गगन भुक धूम सुगंधा । पास देस सह पुर पुर गंधा ॥ 
समस्त यज्ञीय ईंधन को एकत्रिभूत कर ऋत्विज हवन में रसन दान कर स्वाहा की ध्वनि करने लगे ॥ गगन में अग्नि धूम उठने लगा । जिसके सुगंध से निकटवर्ती देशों सहित नगर-नगर सुंगंधित हो गए ॥ 

दाए आसन भुक देउ बिराजे । परगस रूप गहे निज भाजे ॥ 
मख मुख अंतिम हूति सँजोई  । अस्व मेध तब पूर्ण होई ॥ 
पितृगण, भगवान शिव एवं अग्नि आदि देवता आदर पूर्वक दिए गए आसन में विराजित हुवे प्रकट स्वरूप में  अपना भाग ग्रहण करने लगे ॥ यज्ञ के श्री मुख ने जब अंतिम आहुति संकलित की तब अश्व मेध यज्ञ पूर्णता का प्राप्त हुवा ॥ 

सेन सहित जन  जय जय कारे । एकीकरन बिथुरित संसारे ॥ 
नेकानेक बस्तु बिधि नाना । याचकिन्ह  भगवन दिए दाना ॥ 
सेना सहित सभी उपस्थित जन अस्त-व्यस्त विश्व के एकीकरण हेतु प्रभु श्रीरामचन्द्रजी की जय जय कार  करने लगे ॥ फिर भगवान ने याचकगण को  नाना प्रकार की अनेकानेक याचित वस्तुएं प्रदान की ॥ 

लिखत पत्री मुनि मुद्रा चीन्हे । हय भाल तूल तिलकित कीन्हे ॥ 
नागर गन  दरसे तृन तोड़े । पत्री बाँध्यो देवन छोड़े ॥ 
मुनिवर वशिष्ट ने मस्तक-पत्री में प्रभु के नाम की मुद्रा चिन्हांकित की एवं अश्व के तेजस्वी मस्तक पर लाल तिलक लक्षित किया ॥ नागरिक समूह  उसे देखते और तृण तोड़ते । फिर मुद्रांकित  पत्री  को अश्व के मस्तक पर बांधा गया वह अश्व त्याग हेतु तैयार हो गया ।।  

बात्स्यायन अहि राउ, सुने धरे चित साँति । 
पूछे बिप्रवर मम प्रभो , लिखि लेख केहि भाँति ।। 
मुनिवर वात्स्यायन भववान शेष जी को स्थिर चित्त से श्रवणरत हैं । वे प्रश्न करते हैं : -- हे प्रभु ! बंधे पत्री  किस प्रकार लेखित की गई थी ॥ 

बृहस्पतिवार, ०७ अगस्त, २०१४                                                                                               
चंचलाख्य चंदन चर्चिता  ।सोहा सम्पद्  कुमकुम अर्चिता ॥ 
तपे हिरन मनमोहक गंधे । पुनि पत्री देइ मस्तक बंधे ।। 
भगवान शेष जी ने उत्तर दिया : -- हे मुनिवर वह पत्र चंचलाख्य ( एक सुगन्धित द्रव्य ) चन्दन से चर्चित कुमकुम से अर्चित होकर शोभा की सम्पति स्वरूप तपे हुवे स्वर्ण की मनमोहक गंध से युक्त कर तत्पश्चात उसे अश्व के तेजस्व ललाट पर मुनि श्री वशिष्ट ने आबद्ध  किया ॥ 

दसरथ नंदन रघुवर जी के । तपित रूप लिखि आखर नीके ॥ 
बरनि अवध प्रताप बल चाका । प्रहरैं जो रबि बंस पताका ॥ 
जिसमें दशरथ नंदन श्री रघुवीर जी के तपाए हुवे शुद्ध रजत से उज्जवल एवं सुन्दर अक्षरों में अवध साम्राज्य के शौर्य एवं प्रताप वर्णन करते हुवे यह उल्लेखित किया कि  रवि वंश की पताका का प्रहरण करने वाले : - 

श्री दशरथ जी बर धनुधारी । धनुहाई के जो गुरु भारी ॥ 
तिन्ह के सुपुत सदपत गामी । ए काल रघु  बंस के स्वामी ॥ 
धनुर विद्या के श्रेष्ठ गुरु एवं धनुर्धर श्री दशरथ जी के धर्म का अनुशरण करने वाले सुपुत्र महाभाग श्री राम चन्द्र जी इस समय रघुवंश के स्वामी हैं ॥ 

सूर सिरोमनि कँह तिन लोगे । धूरिकारू  मान बल जोगे ॥ 
बिधि दर्सी जो नेम उचारा । करें प्रभु मख तासु अनुहारा ॥ 
उन्हें बल के अभिमान को चूर्ण करने वाले वीरों का सिरोमणि कहा जाता है  उन्होंने  विधिदर्शी गुरुवर एवं मुनियों की कही गई विधि के अनुसार महा अश्वमेध यज्ञ के अनुष्ठान का श्री गणेश कर दिया है  ॥ 

तेजस तूल तिलक लक लासे । कमन कलित कृत किरनन कासे ॥ 
फटिक बरन जो गहि गुन गाढ़े । सोइ अस्व श्री रामहि छाँड़े ॥ 
जो श्वेत -वर्णी जो गुणों का ग्राम है उस अश्व का श्री रामचद्र जी द्वारा त्याग किया जा रहा है ॥ जिसके मस्तक पर तीक्ष्ण अति शोण तिलक चमक  रहा है किरणों को आकर्षित किए जो  रतिपति कामदेव की रचना है एवं ूानहीं के द्वारा विभूषित किया गया है ॥ 

सकल है बंस  अवतंस बाहन माहि प्रधान । 
रामानुज सत्रुहन जोग, रखे तिन्ह के त्रान ॥  
यह हय अपने वंश में सर्वश्रेष्ठ है वाहनों में सबसे उत्तम वाहन है । रामानुज शत्रुध्न को इस अश्व का रक्षक नियुक्त किया गया है ॥ 

शुक्रवार, ०८ अगस्त, २०१४                                                                                                

सेनाचर सह सैन बिसाला । अस्त्र सस्त्र धनु बान कराला ॥ 
सहसई है संग गज राजू । रथ रन सूर रथि बन बिराजे ॥ 
सेनाचरों के संग विशाल सेना है । जो धनुष-बाण खड्ग आदि अस्त्र-शस्त्र से युक्त है ॥ इसके संग सहस्त्रों अश्व एवं सहस्त्रों गजराज हैं । समरशूर रथी बनकर रथों में विराजित हैं ॥ 

गह घमंड प्रचंड बलि  बाहू । सकल मही मह राउन्हि काहू ॥ 
 हमहि सरिस जग कह नहि कोई । करे हरन है साहस जोई  ।॥
समस्त पृथ्वी में जिन राजाओं को अपने प्रचंड  बाहुबल का घमंड है जो यह समझते हैं की  संसार में हमसे बढ़कर कोई समर शूर  है ही नहीं वह इस अश्व को हरण करने का साहस करे ॥ 

जासु चित ऐसेउ अभिमाना । सूर धनुर्धर बर बल्बाना ॥ 
उद्यत होत समर जो कारिहि । सोइ सत्रुहन जुझावत हारिहि ।  ॥ 
जिसके चित्त में ऐसा अभिमान है कि वह सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर एवं प्रचंड बलवान है ॥ एवं उद्यत होकर संग्राम हेतु उत्कंठित होगा वह  रामानुज वीर शत्रुध्न द्वारा परास्त हो जाएगा ॥ 

लिखी जन अंग नाउ बल चाका । पत्री पटल है दंड पताका ।। 
अरु लिखत कहि नीति नय नाना । मान न तासु काल निअराना ॥ 
 उस पत्री में जब अवध साम्राज्य के जनसमूह एवं अवध राज्य के अंग जैसे प्रकृति, राजा,अमात्य ,दुर्ग कोष, बल उसके मैत्रीदेश आदि उल्लेख किया गया तब वह पत्री मानो अवध साम्राज्य की केतुचिन्ह हो गई एवं अश्व उस केतु का दंड स्वरूप हो गया ॥  

सुबरन मय इतिहास सन बरनि अवध के बान । 
राम नाम उद्गार के  पुनि देइ मुद्रा दान ॥ 
ततपश्चात अवध के स्वर्णिम इतिहास के संग उसकी सभ्यता एवं संस्कृति का वर्णन करते हुवे उसपर महाराज प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के नाम की आधिकारिक मुद्रा का चिन्ह दिया गया ॥ 

शनि/रवि , ०९/१०  अगस्त, २०१४                                                                                                   

श्रव श्री सोहा के भंडारे । भंवरन भुइँ पुनि  दिए परिहारे ॥ 
निकसि बेग बल बायु समाना । चरण पंख किए काइ बिमाना ॥ 
हे मुनिवर : -- तदोपरांत यशो धन एवं शोभा की सम्पती  का भंडार स्वरूप  उस अश्व का  पृथ्वी में विचरण हेतु  त्याग कर  दिया गया ॥वायु के सदृश्य वेग युक्त होकर चरणों को पंख एवं काया को विमान किएवह अश्व अवध से निर्गत हुवा ॥ 

भूमि अमरावति  कि पाताला । चले चरन समरूप सुचाला ॥ 
तदनन्तर रबि कुल बर रघुराई । भ्रात सत्रुहन्हि आयसु दाईं ॥ 
 त्रैलोक अर्थात पृथ्वी स्वर्ग  एवं पाताल पर वचरण करते  उसकी गति में समरूपता थी । उसके त्यागकरण के पश्चात रवि वंश के अवतंस  राजा रामचन्द्रजी ने भ्राता शत्रुध्न को आज्ञा देते हुवे : -- 

कहे बीर हे सुमित्रा नंदन । बिचरत यह है सो अपनै मन ॥ 
पथ दरसत तुम गावै पिठाई  । रनोद्यत जो कोउ अवाई  ॥ 
कहा : -- हे सुमित्रा नंदन !  हे वीर ! यह अश्व अपनी मन-मानस के अनुरूप विचरने वाला है । । तुम इसका मार्ग दर्शन करते हुवे इसके पीछे जाओ । रणोद्यत होकर जो कोई इसके सम्मुख आवे ॥ 

 प्रगसत धर खल रूप अनेकिहु । जतात निज बिक्रम ताहि छेकिहु ॥ 
वीरोचित गुन संगत राखिहु । सयनित पत निरबसित न लाखिहु ।। 
जिसने की धृष्टता का अनेक रूप वरण किए  हो अपने पराक्रम का प्रदर्शन कर तुम उसका अवरोधन करना । वीरोचित गुणों की संगती रखना । जो निद्राशील निपतित निर्वस्त्र  हों उनपर  दृष्टिक्षेप न करना ॥ 

चरन निपतित त्रसित भैभीते । संग्राम सूर तेहि न जीतें ॥ 
तुम रथारूढ़ रथ हीन बिपाखा । तासु कोत कभु करिहु न आँखा ॥ 
जो चरणों में गिरे हुवे हों,त्रस्त हों, जो भयभीत हों संग्राम शूर उन्हें नहीं जीतते,  उन्हें भीरू ही जीतते हैं ॥ यदि तुम रथारूढ़ हो और शत्रु पक्ष रथहीन हो तब कभी भी उसकी ओर दृष्टि न करना ॥ 

जो निज फूरि कीर्ति न गावए । तासु संग सम बीर जुधावए ॥ 
रनमद भयद्रुत सस्त्र बियोगे । रने सो अधम गति के जोगे ॥ 
जो अपनी असत्य कीर्ति न करता हो  उसके संग उसके जैसा  ही बली जूझता है ॥ जो युद्ध हेतु केवल उन्मत्त हो  उसमें रन-सामर्थ्य न हो भयवश जो दृष्ट-पृष्ठ हो,  जो शस्त्र-वियुक्त हो,   ऐसे योद्धा से युयुधान रन कारित नहीं करते,  जो करते हैं वह अधम गति के योग्य होते  है ॥  

परतिय पर धन चित न लगाहू । करिइहु न सँगत अधमी काहू ॥
सद्गुन चारन रहिहु अपनाए । लागिहु न पहिले तुअ बुढ़ताए ॥
पराई स्त्री एवं पराए धन की ओर चित्त न ले जाना । किसी अधमी की संगती न  करना ॥ सभी सद्गुणों को अंगीकार किए रहना । बड़े-बूढ़ों के ऊपर प्रथमतस  प्रहार न करना ॥ 

गौ ब्रह्मन अरु धरम परायन । बिष्नु भगत प्रनम्य नत लोचन ॥
तेहि प्रनामत जहँ कहुँ जावैं ।  कृतबीर तहाँ  कृतफल पावैं ॥
गौ, ब्राह्मण तथा धर्म परायण वैष्णवों को अवनत लोचन से प्रणाम अर्पित करना । उन्हें प्रणाम करने वाले वीर्यशील जहां कहीं भी जाते हैं  वहां सफलता को प्राप्त होते हैं ॥ 

 लाँघहु न  पूजीत के पूजा । दया भाव चित चेत न दूजा ॥
रहिहु ते  हुँत सदा सचेता । जगजननी पत जगत प्रनेता ॥ 
अर्चित पुरुषों के पूजा-अर्चना का कभी उल्लंघन न करना । जो चित्त दया भाव से युक्त होता है इससे अवर कोई मंदिर नहीं है ॥ इस प्रकार मेरे द्वारा कही गई  उक्त  वचनों के लिए सदैव सचेष्ट रहना । जगज जननी के स्वामी जगत के प्रणेता स्वरूप : -- 

महाबाहु हरि सर्व स्वामी । ब्यापक रूप अंतरजामी ॥
जो भगता श्री हरिहि पियारे । सोइ सरूप सर्वत्र बिहारे ॥
महाबाहो भगवान श्री विष्णु,सर्वेश्वर हैं वह सर्वव्याप्त एवं अंतर जगत के ज्ञाता हैं जो भक्त भगवान विष्णु को प्रिय होते हैं । वह उन्हीं के स्वरूप में सर्वत्र विहार करते हैं ॥ 

सकल भूत के निलय निबासी । तेहि नाउ पुनि पुनि उद्भासी ॥ 
सुमिरि  जो हरि नाउ  गुन रासी । लाखिहु तिन श्री पत संकासी ॥
जो सम्पूर्ण भूतों के निवास करने वाले  हों  उनका नाम का वारंवार जाप करते हों और जो हरि नाम के गुण समूहों का स्मरण करते हों उन्हं तुम श्री के पति साक्षात श्री विष्णु के समरूप ही समझना  

जाके हुँत को आपना, नाहीं  कोउ पराए ।
सो बिस्नुभगत छन माहि, पापिन को पबिताए ॥
जिसके लिए कोई अपना है न कोई पराया है वह वैष्णव क्षण मात्र में ही पापियों को पवित्र कर देता है ॥ 

 सोम/मंगल  ११ /१२ अगस्त २०१४                                                                                                

जो द्विजन्हि के चरन पखारे । भगवदीअ हरि भजन पियारे ।
अरु वैर भाव के प्रतिमोचन । सो सुचिकरन जग लिए अव्तरन ॥ 
 जो सुसंस्कृत बाह्मणों के चरण धोते हैं जिन भगवद् भक्तों को हर भजन प्रिय है जो वैर स्वभाव का विमोचन करने में समर्थ हैं वे संसार को पवित्र करने हेतु ही वैकुंठपुर से अवतरित हुवे हैं ॥ 

जासु चित हरि भगति मह लागा । भाव हरिदै चरन  अनुरागा ।।
जासु उदर  हरि भोग प्रसादा ।  कँह  हरिजन सोइ निर्बिबादा ॥ 
जिसका चित्त हरि भक्ति में ही अनुरक्त है । ह्रदय में सनातन विष्णु ( ईश्वर) का ध्यान ) उनके चरणों में अनुराग है । जिनके उदर में उन्हीं का प्रसाद हो उन्हें निर्विवाद स्वरूप में वैष्णव ही कहा जाएगा ॥ 

दया भाव जिनके मन माही  । लगे बेद प्रिय जग सुख नाही ॥ 
धर्मवान भृत सदकृत कामा । होत भेँट तुअ  करिहु प्रनामा ।। 
जिनके मन में दया का भाव है जिन्हें वेद प्रिय है जगत के सुख नहीं । जो निरंतर धर्म (अर्थात सत्य तप शौच दान )का पालन करते हैं उनसे भेंट होते ही तुम प्रणाम करना ॥  

 सीस धरे पद पंकज धूरी । हर हरि के किए  भगति भूरी ॥ 
गौ गौरी सुरसरि सम देखें । तिनइ बीच जो भेद न लेखें ॥ 
शीश पर उनके चरणारविन्द की धूलि धारण किए जो  श्री विष्णु एवं भगवान शिव की अतिशय भक्ति करते हैं जो गौ गौरी एवं गंगा को समान दृष्टि से देखते हैं इनमें कोई भेद नहीं करते । 

कहे कथन सम सरासन साँच बचन सम  बान । 
भरे अंतर भाव छिमा, सूर न तासु समान  ॥ 
जिनका कहे कथन कोदंड के समान है कथन में निहित सत्य वचन वाण के सदृश्य हैं जिनके अंतर में काशमा का भाव हो उसके सदृश्य कोई वीर नहीं ॥ 

 मान सकल जन पातक नासा । सो सरि अवतर सुर संकासा ॥ 
भगत भाउ निज बल अनुहरे  । सरनागत  के राखनहारे ॥ 
उन सभी भक्तों को वैकुण्ठधाम के निवासी ही समझना इन सभी जनों को वैकुण्ठधाम में निवास करने वाले एवं अघनाशक ही मानना कारण कि ये सभी स्वर्ग से भूमि पर अवतरित हुवे देव ही हैं ॥ 

सरन  दात दानए बर दाने । बिसनौ मह सर्बोपरि माने ॥ 
जासु नाउ के  परभूता  । किए पातक तुर भस्मिन् भूता ॥ 
जो सत्पात्रों के करतल उत्तम दान देते हैं जो शरण -दातृ है एवं सत्पात्र को उत्तम दान देता हो उसे वैष्णवों में श्रेष्ठ जानना चाहिए ॥ जिसके नाम का प्रभुत्व ऐसा है कि वह तत्काल ही पापों को भस्मीभूत  कर देता है ॥ 

बिसई बाहि कर कासे किरन । अंतर्मन  भगवन के चिंतन ॥ 
बिष्नु चरन सरोज रति राखे ।  तासु भगत तिन लोचन लाखे ॥ 
जो विषयों के घोड़ों की किरणों को कर्षित किए अंतरमन में भगवान का ही चिंतन करता हो ।  के चरण सरोज में ही जिसका अनुराग हो ऐसे भक्तों  को तुम्हारी दृष्टि वैष्णव स्वरूप में ही देखे ॥ 

ऐसेउ समुह सिरु परनावै । सो जन निज जीवन पवितावै ॥
एहि भाँति मम अग्या अनुहरिहू । जो मैँ कहा रे सोइ करिहू  ॥ 
 ऐसे विष्णु भक्तों के सम्मुख जो शीश नवाता है वह अपने सम्पूर्ण जीवन को पवित्र कर  देता है ॥ इस प्रकार तुम मेरी आज्ञा का पालन करना जो मैने उपदेश कहा हे भ्राता तुम वही करना ॥ 

मम कहे कथन संग जो, होहिहु कबहु न बाम । 
बर जोग तैं लहनहारु , पैहिहु परमम धाम ।। 
हे लक्ष्मण ! यदि तुम मेरे कहे कथन के संग कभी विरुद्ध नहीं जाओगे । तब  उत्तम योगों के द्वारा प्राप्त होने वाले परम धाम के तुम् अधिकारी होगे । 
बुधवार, १३ अगस्त, २०१४                                                                                                

जासु निगम नित निगम प्रसंसा । हे रिसि अस रघुकुल अवतंसा ॥ 
कृताकृत के देत उपदेसा  । दिए सत्रुहन पयनै आदेसा ॥ 
यह वह परम धाम है जिसकी निगमगम सदैव प्रसंशा करते हैं ॥ हे महर्षि !हे वात्साययन ! इस प्रकार रघुकुल के अवतंस ने कर्त्तव्य-अकर्त्तव्य का उपदेश देते हुवे शत्रुध्न को कूच  करने का आदेश दिया ॥ 

अबर सूर पेखत प्रियताई । बहुरिमधुर बोले रघुराई ।।  
अहइँ कोइ अस अमित बीर बर । पीठ देस के रच्छा बल धर ॥ 
तत्पश्चात श्री रामचन्द्रजी अन्य वीरों के सम्मुख होकर उन्हें अनुरागपूरित दृष्टि से निहारते हुवे मधुर स्वर में कहा : -- है कोई श्रेष्ठ ? है कोई ऐसा अमित तेजस्वी ? जिसमें सेना के पृष्ठ भाग की रक्षा करने की क्षमता हो ॥ 

अहँ को  बिक्रमी भुजबल धारी । रच्छत है जो पाछिनु चारिहि ॥ 
मर्माघाती आयुध सँजुहा  । जीतएँ अरि सो आवैं समुहा ॥ 
है कोई पराक्रमी कोई बाहुबली जो राजस्कंद की रक्षा करते हुवे सेना अनुगमन करे । जो मर्म भेदी आयुधों से संयुक्त हो एवं सम्मुख आए अमित्र को जीतने में समर्थ हो ॥ 

हैं समर सूरवाँ अस कोई । एहि भार गहन समर्थ होई ॥ 
अस कह मौन भाव गह रघुबर । भरत पुत पुष्कल होइ अगुसर । 
है ऐसा कोई समर सूरवाँ जो यह बीड़ा उठाने में समर्थ हो । ऐसा कहकर जब रघुनाथ के मुख ने मौन भाव ग्रहण कर लिया तब भरत-पुत्र पुष्कल आगे आए ॥ 

गह भुज भार बिनयाबत, कह हे सर्व स्वामि । 
महनुभाव के अनुकामि, प्रतिमुख यह अनुगामि ।।   
अपनी भुजाओं में वह भार उठाए वह शिष्टता पूर्वक  बोले : -- हे सर्वेश्वर ! आप महानुभाव के कामनानुकूल यह आज्ञाकारी अनुचर सादर उपस्थित है ॥ 




Thursday, 12 June 2014

----- ॥ जल ही जीवन है ॥ ----

भारत एक जन एवं जीवसंख्या बाहुल्य देश है, जल ही जीवन है और इस जीवन पर सभी निवासियों का अधिकार है ।  नदियां पेय जल की प्रमुख स्त्रोत हैं । अधुनातन इसकी अनुपलब्धता को दृष्टिपात कर पर्यावरण की रक्षा करते हुवे पारिस्थितिक- तंत्र  का चिंतन कर जल- संरक्षण हेतु एक कठोर नियम का उपबंध करना  परम आवश्यक हो गया है..,

>> नदियां जीवन दायिनी स्वरूप में सभी धर्म एवं वर्गों की आदरणीया रही हैं..,

>> एक ग्राम  में केवल श्याम के लिए  नियन उपबंधित नहीं किया जाना चाहिए, अपितु यह  समस्त ग्रामीणों हेतु होना चाहिए उसी प्रकार केवल माँ गंगा जी के लिए ही नियम उपबंधित नहीं होकर नदियों पर किया गया नियम उपबंध व्यापक अर्थ उत्पन्न  करता है..,

>> सर्वप्रथम उद्यम एवं उपक्रमों के उत्सर्जित मल-मूत्र को  प्रतिबंधित करना चाहिए  यह प्रमुख प्रदूषण-स्त्रोत है उद्यमों एवं उपक्रमों को  अवशिष्ट का  पुनर्चक्रीकरण कर उसमें निहित जल का पुनरोपयोग हेतु परमार्श देना चाहिए जो वाष्पीकरण विधि से संभव है..,

>> इसके अतिरिक्त अन्य प्रदूषण-स्त्रोतों को समाज के  लोगों द्वारा जनजागरण अभियानद्वारा उसकी  रोकथाम करनी चाहिए,

>> शासन को चाहिए कि वह नदियों के प्रदुषण को दंडनीय अपराध घोषित कर उस पर कठोर दंड के सह अर्थदंड का प्रावधान करे 

Friday, 30 May 2014

----- ॥ हमर राष्ट ॥ -----

"मतदाता एवं मतग्रहिता की जीवनशैली समान रूप से द्रष्टिगत होना ही 'समानता' की वास्तविक एवं
संवैधानिक परिभाषा है जो की एक उत्तम लोकतंत्र का महत्वपूर्ण लक्षण भी है "

"लोकतंत्र आधुनिक या कलिकाल की परिकल्पना है, जो समानता एवं समदृश्यता के सूत्र पर ही आधारित है, विद्यमान कल में अधिकतम राष्ट्रों ने इस तंत्र को अंगीकार किया है । किन्तु उक्त सूत्र कहीं दृष्टिगत नहीं होता । राष्ट्राध्यक्ष प्रासादों में सुशोभित हो रहे हैं, एवं जनता विपन्नता ( यहां विपन्नता की परिभाषा व्यापक है)  से ग्रसित है"

तात्पर्य है की : -- "श्रेष्ठ उपकरण से ही कार्य सिद्ध नहीं हो जाता, श्रेष्ठ उत्पादन भी होना चाहिए "


"विद्यमान सत्ताधारी दलों का ध्येय केवल  मात्र 'सत्तासुख' अर्जित करना अथवा सत्ता सवारी हेतु अपने अवसर की प्रतीक्षा करना भर है,'मतलोलुपता' के अतिरिक्त इन दलों को जनसामान्य व जनतंत्र से कोई अन्य सरोकार नहीं है"

सभी राष्ट्रों के जनसामान्य को अपने जन संचालनतंत्र  एवं उसके  संवैधानिक स्वरूप का आकलन एवं समुचित समीक्षा की सतत आवश्यकता है.....





Sunday, 18 May 2014

----- ॥ उत्तर-काण्ड १५॥ -----

बृहस्पतिवार, २६ जून, २०१४                                                                                                   

रामचंद्र तब नगर अजोधा । लै सद सम्मति परम सुबोधा ॥
कहत मुने प्रभु पद अनुरागा । अवनि हेतु प्रभु परम सुभागा ॥ 
तब फिर श्री राम चन्द्र ने अयोध्या नगर में समस्त श्रेष्ठ ज्ञानवान के यथोचित विचार ग्रहण भी प्राप्त किए । प्रभु चरणों के अनुरागी ऋषि जनों ने कहा हे पभु आप इस विश्वम्भरा हेतु परम सौभाग्यशाली हैं ॥ 

सुर मुनि तव पद सीस नवाई । दसरथ नंदन मम गोसाईं ॥ 
कुल कीर्ति सुख चहत अनंता । अगनी चित अहबानु तुरंता ॥ 
हे दशरथ नंदन हे हमारे आदृत  स्वामी समस्त देव एवं मुनि गण आपके चरणों पर प्रणाम अर्पित करते हैं ॥ अब आप कुल के शौर्य की कीर्ति एवं धरा के सुख की कामना में तत्काल ही अग्निहोत्र  का आह्वान कीजिए ॥ 

सुनत  बचन प्रभु मुनि मनुहारी । सकल मनोहर साज सँभारी ॥ 
प्रभो पुनि दृढ़ संकलप धारे । महा जज्ञ के अयोजन कारे ॥
इस प्रकार मुनि मनीषियों के  मनुहार भरे वचनों को सुनकर भगवान ने फिर  मनोहर सामग्रियों की व्यवस्था कर अश्वमेध यज्ञ के महा अनुष्ठान का दृढ संकल्प किया  ।। 

तदनन्तर सँग लिए मुनि बृंदा । आगत सरजू सरित अलिंदा ।। 
हस्त कलित कल सुबरन लाँगल । होहिहि चहुँपुर सगुन सुमंगल ॥ 

तदनन्तर मुनि समुदाय को साथ लेकर भगवान सरयू नदी के तीर पर आए ॥ उनके युगल हस्त कांति से युक्त एक सुन्दर हल धारण कर फिर उहोने उस हल से चार योजन के माप की लम्बी-चौड़ी 

चारिन योजन चौखन खेही । बिदहन हल मारग बिय देही ॥ 

किए सजाउनि छाज अनेका । सब संभारी एक ते ऐका ॥ 
मुनि समादेसन जस दायो । जोनिहि मेखल कुण्ड रचायो ॥ 

मनोहारी मनि मंडप, सुछ्द सुछ्त्र छिति ढार । 

श्री सौभाग जहां करत, प्रगस सरूप बिहार ॥ 

शुक्रवार, २७ जून,२०१४                                                                                                               

राज भवन श्री जोहत जैसे । भवन भवन प्रति सोहत तैसे ॥ 
चित्रकारी कर भीत बहीरा । नयन बदन दिए पटल पटीरा ॥ 
राज भवन जिस प्रकार  सौंदर्य-साधन से युक्त था प्रत्येक भवन उसी प्रकार शोभायमान हो रहे थे । भवनों के बाहर भीतर चित्रकारियां की गई थी । मुख्या द्वार एवं गवाक्ष सुन्दर आवरण से सुसज्जित थे ॥ 

 रसन मंजरी रसरी गाँठे । घिरे हीर जस मरकत साँठे ॥ 
बँधे दुआरी बंदन बारे । धरे कंठ जैसे कल हारे ॥ 
वसंत द्रुम की मंजरियाँ रश्मियाँ से इस प्रकार अवगुंठित थी मानो हरिन्मणि से गूँथे होरे ही जड़े हों  ।  द्वार-द्वार  ऐसे वन्दनवारों से सुशोभित हो रहे थे  उनके कंठ ने जैसे हीरक माल्य ही कलित कर लिए हों ॥ 

गोपुर ध्वजा धरि बहु रंगे । पथ पथ प्रहरत पवन प्रसंगे ॥ 
चित्रिकृत चारू चौंक पुरायौ । भाँति भांति  के साज सजायौ ॥ 
बहुंत सी बहुरंगी ध्वज पताकाएं नगर द्वार से होते हुवे पथ पथ पर पवन का प्रसंग किए प्रहारित हो रही थी ॥  सुन्दर चित्रकृत चौंक पुराए गए थे साथ में बांटी भाँती के साज सजाये गए थे ॥ 

चौंक गली बट  बाट बाटिका । पहिरे जैसे हरित साटिका ॥ 
कमन क्यारी पात सँवारे । पुहुप काल के पंथ जुहारे ॥ 
गलियाँ चौंपथ , मुख्य मार्ग वन वाटिकाएं ने जैसे हरिद साटिकाएं धारण कर ली थी । उसपर सुन्दर क्यारियों में पत्र संवार कर वह वसंत काल की  प्रतीक्षा करने लगे ॥ 

परेहि नाहि चीन्ह, तौं दसरथ पुरी देखिअ  । 
नवनइ  दुलहि कीन्ह, जौं षोडसों सिंगार ।।  
 सभी दशरथ पुरी को ऐसे  देखते जैसे उनकी दृष्टि यह निश्चय करने में अक्षम है यह दशरतः पुरी है कि किसी नव दुल्हन ने षोडस श्रृंगार किए हैं ॥ 

शनिवार, २८ जून, २०१४                                                                                                     

बेद बिहित जस कारज लागे । मह रिषि बसिष्ठ परम सुभागे ॥ 
तेहि भाँति सब काज सँवारे । बिधि पूर्वक करत अनुहारे ॥ 
वेद शास्त्रों में निर्देश करते हुवे यज्ञ की जिस प्रकार विधि बताई गई परम शौभाग्यशाली महर्षि वशिष्ट उन्ही विहित विधान एवं निर्देशों का अनुकरण करते हुवे समस्त कार्य संपन्न करने में जुट गए ॥ 

सुदिनु सुनखतु सुघरी सोचाई ।  बेद बिहित अनुठान धराई ॥ 
बरन दीप मख बरनन  कीन्हि । दीवट पत्रिका सिस कर दीन्हि । 
शुभ दिवस, शुभ नक्षत्र, शुभ घडी शोध करते हुवे वेद में वर्णित विधि अनुसार यज्ञ का अनुष्ठान का संकल्प किया गया ॥ वर्ण रूपी दीप्तियों से यज्ञ के आयोजन का वर्णन  वर्ण दीप्ति के आधार दीवट पत्रिका को शिष्यों के करतल में आधारित कर : -- 

सकल दिसा सब कोत पठायो ।  एक एक बासि नेउता दायो ।।  
जब मुनिबर आश्रम पथ पायो ।  वादकरन निज बचन कहायो ॥ 
समस्त दिशाओं में सभी और उन्हें भेजा । एवं एक एक वासी को आतिथ्याशय युक्त निमंत्रण निवेदित किया । जब शिष्यों को मुनि समुदाय के आश्रमों का पंथ प्राप्त हुवा तब महर्षि विशिष्ठ ने वाद्यमान स्वरूप में अपने निमंत्रण सन्देश कहलवाया ॥ 

श्रीयुत रवन त्रिभुवनपत हरे  । महास्व मेध कृतन मन धरे ॥ 
हे राजभवन लोचन सोभा । तुहरे दरसन हरिदै लोभा ॥ 
क्या कहलवाया ? श्री एवं शोभा से युक्त त्रिभुवन के पति श्रीहरि ने महा अश्व मेध यज्ञ के अनुष्ठान करने हेतु उद्यत हुवे हैं ॥ हे राज भवन के लोचन की शोभा आपके दर्शन हेतु भवन के अंतर्जगत आपके  दर्शनों  का आकांक्षी है ॥ 

नैन दुआरी पलक पँवारे । अगौरएँ पदम चरन तुहारे ॥ 
कौसल नगरि पंथ कर जोहहि । आगत तुहरे सब सिध होहहि ॥ 
 नयनों की द्वारी और पलकों की  ड्योढ़ीयाँ आपके चरण कमल की प्रतीक्षा  कर रहे हैं ॥ कौसल नगरी क पंथ कर जुहारे कह रहे हैं 
आपके आगमन से ही इस मंगल कार्य की सिद्धि है । 

एहि बिधि पैहत मुनि नउताई । भए आतुर दरसन रघुराई ॥ 
उत्कंठित जग नाथ प्यारे । सोध दिवस सब आन पधारे ॥ 
इस प्रकार समस्त प्राणी-जगत मनुज दनुज सहित मुनिश्री आमंत्र ण प्राप्त कर  श्रीराम चन्द्र के दर्शन हेतु लालायित हो उठे ॥ जगत के नाथ को प्रिय वह आमंत्रित अतिथि अतिशय उत्साह के सह शोधित किए गए दिवस में अयोध्या नगरी  पधार गए ॥ 

नारद असित कपिल मुने, जातूकरन अङ्गीर । 
आर्ष्टिषेण महर्षि अत्रि  भयउ अतिथि रघुबीर ॥ 
राजर्षि नारद, मुनिवर असित एवं कपिलमुनि जातूकर्ण्य, अङ्गीरा, आर्ष्टीषेण  महर्षि अत्रि यह सब रघुवीर के अतिथि हुवे ॥ 

हारीत गौतम रिषिवर,जाग्यबलयक आप । 
आन पधारे संवर्त बर्धन विभो प्रताप ॥   
महर्षि हारीत, मुंवार गौतम ऋषिवर याज्ञवल्यक आप स्वयं संवर्त सहित विभो का पताप वर्द्धन हेतु आन पधारे ॥ 

रविवार, २९ जून, २०१४                                                                                                               


निरख सँभारी बहु हरषाईं । जनक पुरी प्रभु दूत पठाईं ॥ 

अचिर धुति गति दूत चलि आए । नगर वासिन अगुसार अगवाए ॥ 

अवध नगरी ते पत्री आईं । सुनत जनक सहसा उठ धाईं ॥ 

भरे ह्रदय भित द्रवनै भावा । ताप तपित लोचन जल छावा ॥ 

बढ़े प्रीति संग सिथिर अंग तबहि दूत मुख दरस दियो । 
दरस दूत बहु भाव अभिभूत दुअरिहि मिलि भेंटि कियो ॥ 
पूछे कुसलाती नृप सब भाँती मात भ्रात सिय पिय के । 
नया निर्झारा बहि अबिरल धारा पूछि कुसल जब सिय के ॥ 

जल बनु नाउ थल बिनु पौउ दाहिन बिनु जस बाम । 
दिरिस नयन बिनु दया मन सीया बिनु तस राम ॥ 

दूत गन बहु भाव प्रबन, करत दंड परनाम । 
कहे ऐसिहु पढ़त पत्री, बिदेह पति के नाम ॥ 

बुधवार,३० जुलाई,२०१४                                                                                                       

बाँचत उरस न प्रीत समाई ।  दिए न्योति तुमको हे राई ॥ 
होवै अवध मह मख के तियारी । छाए अनंद जनक हिय भारी ॥ 

मंगल द्रब्य सुभ साज सुभिता । साजित चतुरंगी सेन सहिता ॥ 

चले जनक कर मुनिगन साथा । दूर नगर अरु चारिन हाथा ॥ 

पैठि सकल जान सरजू तीरा । आए लेवनु तिन्ह रघुबीरा ॥ 

दिए आसन सादर बैठारे । सेवा सुश्रुता भरत सँभारे ॥ 

देत पत्री पुनि दूत पठावा । देस देस के नृप बोलावा ॥ 

आगंतु के करत अभिनन्दन । भए गद गद जब प्रभु किए वंदन ॥ 

हाट बाट के बानि बनावा । देख देख नृप मन हरषावा ॥ 

कहुँ रबि सस कहुँ उडुगन के खचना । द्वारि द्वारि रचि भलि रचना ॥ 

भरे भेस बर बासिहि धानी । मुख धरि मृदुल मनोहर बानी ॥ 

मनगाहक मंदिर सब के रे । चित्कृत किए रतिनाथ चितेरे ॥ 

ललित लता मंडप कहूँ  कंचन मंच बिसाल । 
आसन मंडल लसेजहँ बैठिहिं तहँ महिपाल ॥ 


पयादिक गोपुर गए लवाई । पुलकित मन प्रभु किए अगवाई ॥ 
भक्ति बीथी भीर भइ भारी ।  भरी भगत सों बछर  दुआरी ।। 
भगवान उन्हें पयादिक ही लेने गए और अत्यानयत ही पंकित स्वरूप में उन सभी की आगवानी की ।  भक्ति के पंथ में भारी भीड़ उमड़ पड़ी । भक्त वत्सल की द्वारि भक्तों से अट गई ॥ 

आनै भवन अभ्यागत अनेका । जल थल नभ चर मनु एक ऐका  ॥ 
अतिथि देव कह चरन पखारे ।  बरासन देइ निकट बैठारे ॥ 
भगवद भवन में अनेकानेक अभ्यागत का आगमन हुवा । जल थल नभ चर सहित एक एक मनुष्य आमंत्रित हुवे ॥ 

सब कछु सकुसल पूछ बुझावै । पैह अति नेह सब सकुचावै ॥ 
किन्ही सेबा प्रभु सब जन की । प्रिय जीव जगत पर परिजन की ॥ 
भगवान से सब की कुशलता पूछी । इतना स्नेह प्राप्त कर सभी संकोच होने लगा  । पभु श्रीरामचन्द्रजी ने प्रिय जीव -जगत पुरजन परिजन आदि सभी जनों की श्रद्धा पूर्वक सेवा की ॥ 

सर्वाप्रिय प्रभु  अंतरजामी । अजहुँ भए सेबक जग स्वामी ॥ 
पुनि भए आसन आसन दाईं । कहत निबेदत पाक पवाई ॥ 
जो सभी जान को प्रिय है सर्वेश्वर है अन्तर्यामी हैं जो सर्व स्वामी है आज वह सेवक स्वरूप हो गए ॥   तत्पश्चात आशन अर्थात परोसने वाला का स्वरूप ग्रहण कर सभी को आदर सहित बैठाया  एवं साग्रह सुमधुर पाक प्रसाद निवेदित कर कहा  : --    

तुहरे चरन रज सरोज, मम सिरु सरिरुह जागि । 
बरधै नगरानन ओज, अहो हमहि बड़ भागि ॥ 
हे अतिथि देव ! आपके चरणों के रज सरोज मेरे शीश के सरोवर में विकसित हुवे । इससे मेरे नगरानंन का ओज बढ़ गया, अहो !यह मेरा बड़ा सौभाग्य हुवा ॥ 

सोमवार, ३० जून,२०१४                                                                                                              

कहत सेष ब्रम्हन एहि भाँती । लगे भवन मनीषि के पाँती ॥ 
जुग दरसे अस सुधि समुदाई ।  सूर दरस जस पंकज फुराइ ॥ 
 भगवान शेष जी कहते है : -- हे भूमिदेव ! इस प्रकार प्रभु के भवन में मुनि मनीषियों का ताँता लग गया ॥ वहां विद्वान सत्कर्मी एकत्र हुवे   ऐसे दर्श रहे थे जैसे       ॥ 

बरनाश्रम बिषयक अनुकूला । कहि बत देस काल समकूला ॥ 
संत समाज सतसंग सोही । मुनि तहँ प्रतिमुख आपहु होहीं ।। 
स्वभाव धर्म एव व्युत्पत्ति मूलक विषयों के अनुकूल एवं देश काल के सम कूल वार्त्ता होने लगी ॥  हे विप्रवर !संत समाज की उस संगोष्ठी में  स्वयं भी तो उपस्थित थे ॥ 

मोर अंतर सुरति भइ छूछा । कह मुनि एहि कर सादर पूछा ॥ 
कवन ग्यान ग्यानदँ दाईं  । धरम जुगत को कथन कहाई ॥ 
मेरी अंतर स्मृतियाँ समय के साथ विस्मृत हो गई हैं यह कहकर विप्रवर ने भगवान शेष जी से आदर सहित प्रश्न किया : -- भगवन ! ज्ञान विदों ने वहां कौन-सा  अद्भुत ज्ञान दिया धर्म के विषय में  क्या  कथोपकथन हुवे ॥ 

महात्मन जब किए सत्संगा ।  कह  बचन केहि बिषय प्रसंगा ॥ 
किए बखान को कथा मुनिंदा । मोहि लेखु निज मुखारविंदा ॥ 
जब महा आत्माओं ने सत्संग किया तब उन्होंने किस विषय के समंध में चर्चा की ॥ हे प्रभु ! वहां मुनि गण ने कौन सी कथाएँ कहीं ? फिरउनका किस प्रकार समाख्यान किया ? यह सब मुझे आप अपने मुखारविंदसे समझाएं ॥ 

अहिबर पुनि अस प्रतिमुख दाई । मुने पुरुषोत्तम रघुराई ॥ 
सब साधौ जब संजुग देखे । बर्नाश्रम बिषय पूछ पेखे ॥ 
अहिराज ने तब भूमिदेव के प्रश्न का इस प्रकार उत्तर दिया हे मनीषी ! पुरुषों में सर्वतः उत्तम पुरुष रघकुल के राजा श्रीरामचन्द्र जी ! ने सभी विद्वान को अपने भवन में एकत्र हुवे देखा तब वर्ण एवं आश्रम के विषय में प्रश्न करते हुवे अपनी जिज्ञासा प्रकट की ॥ 

 कहौं अजहूँ सोइ जोइ  बूझ तईं रघुबीर । 
बरनि जे गुन कारि धर्म, सुनु ध्यान धर धीर ॥  
रघुवीर के द्वारा  किए गए प्रश्न के  प्रत्युत्तर में उन महर्षियों ने जिन-जिन गुणकारी धर्मों का वर्णन किया  अब मैं उन्हें ज्यों की त्यों प्रस्तुत करता हूँ आप उसे ध्यान एवं धैर्य पूर्वक सुनें ॥ 

 मंगलवार, ०१ जुलाई २०१४                                                                                                         

बिप्र धर्म  कर्मन जग्य बाहा । करत गायन बेद गुन गाहा ॥ 
ब्रह्म चर्य के आश्रम महही  । बैरमन होत जो को चहहीं ॥ 
होत बेरागि बिरति अपनाएँ । न तरु गेहस आश्रम महु जाएँ ॥ 
अधमीहि के टहल जिउताई  । द्विज हुँत  जे करम बरजाई ॥ 
द्विज का यह धर्म है कि यज्ञ कर्म में प्रवृत्त  होकर  निगमागम की गुण गाथा का गायन  करते रहे ॥ वह ब्रह्मचर्य-आश्रम में वैरमण होने पर यदि उसकी अभिलाषा  हो तो वैराग्य-जीवन  अंगीकृत करते हुवे सांसारिक विषयों से उदासीन हो जाए । अन्यथा गृहस्थ -आश्रम में प्रवेश करे ।  निकृष्ट जनों की सुश्रुता द्वारा जीविकार्जन, द्विज हेतु यह कार्य सर्वथा निषिद्ध किया गया है ॥ 

वेदानुवचन  भगवद पूजा । करै सदा ते काज न दूजा ॥ 
दीन मलिन कि दारिद दुखारी । कबहु बिपदा आन भै भारी ॥ 
वह वेद वचन करे भगवद वंदना से ही जविकोपार्जन करे  इसके अतिरिक्त अन्य किसी सेवावृत्ति से जीवन निर्वाह न करे ॥ चाहे कितनी दुर्दशा से ग्रस्त हो जाए दारिद्रता से व्यथित हो,  चाहे कैसी भी गहन विपत्ति उसे घेर लेवे : -- 

धरम काज के परे दुकाला । चाहे सब कहुँ अन्न अकाला ॥ 
नीचक सेवा टहल निजोगे । तिन्हिनि बिप्र कहत न जग लोगे ॥ 
धार्मिक कार्यों का अकाल ही क्यों न पड़ जाए  चाहे सर्वतस अन्न का अकाल ही क्यों न हो जाए । ऐसी स्थिति में भी वह यदि अधमी की सेवा में नियुक्त होता है तब  देश-समाज में उसे ब्राह्मण नहीं कहा जाता॥

तजत तेहि प्रासन दाए पतित जन रसन साँच बास रहे ॥ 
ब्रह्म विवेचन बेदाध्ययन रत कामोदर तेज सहे ।। 
सत कृत सों मन, मन सो नयन नयन सों कर पद राख करे । 
नीर निमज्जन सांध्यतर्पन कर नित स्वाध्याय करे ॥ 
जो पतित जनों द्वारा दाय हो उसे उस का भी त्याग कर देना चाहिए उसकी जिह्वा पर सदा सत्य का निवास होना चाहिए । ब्रह्म तत्व की विवेचना करते हुवे वेदाध्ययन में प्रवृत्त होकर उसे काम एवं जठराग्नि के  तेज का सहिष्णु होना चाहिए । इस हेतु उसे सत्कृत के सह मन मन के सह नयन, नयनों के सह कर-चरण की रक्षा करनी चाहिए । वह नित्य नीर-निमज्जन कर सांध्य-तर्पण एवं  स्वाध्याय में रत रहे ॥  

करत परस्पर संगाति  संगत किए बिद्बान । 
तदनन्तर देइ गुरुजन , गेहस जीवन ज्ञान ॥ 
इस प्रकार सत्संग -साधन से विद्वान एवं मनीषी गण ज्ञान-गम्य वार्त्तालाप कर रहे थे । तानंतर गुरुजनों ने गृहस्थ -जीवन का ज्ञान दिया ॥ 

बुधवार, ०२ जुलाई, २०१४                                                                                              

जनक जननि जो जातक चाहीँ । सँग न उचित रज दरसन माही ॥ 
बैदक बयकृत हेतुक संगा । किए बर्जित एहि काल प्रसंगा ॥ 
संतान की आकांक्षा से  रजोदर्शन अवधि में जनक एवं जननी का समागम उचित नहीं होता ।  स्वास्थ्य गत दृष्टि से इस काल में स्त्री पुरुष का प्रसंग चिकित्सा शास्त्रों में भी वर्जित है ॥ 

दिवस समागम आयुर नासा । पितृ पख बरजै काज बिलासा ॥ 
परब दिवस मह द्विज मनु सिद्धे । पति पतिनी सँग हेतु निषिद्धें ॥ 
दिवस काल के संपर्क से पुरुषों की आयु क्षीण होती हैं ।  पितृपक्ष में विलास क्रीड़ाएं सर्वथा वर्जित होती हैं । हे द्विजवर सिद्ध मुनिगण सभी पर्व पति-पत्नी के प्रसंग हेतु निषिद्ध है ॥ 

कहे काल जो सँग को मोही । तासु धर्म सब दूषित होही ॥ 
कही गए बिरध साधौ संता । तजे तिन्हनि पुरुख मतिबंता ॥ 
कह गए उपरोक्त काल में भी जो महाशय मोहवश संपर्क करता है उसका धर्म दूषित हो जाता है ॥ बड़े बूढ़े एवं संत महात्मा कह गए हैं बुद्धिमान पुरुषों को इनका त्याग करना चाहिए ॥ 

एक नर एक नारी ब्रत नेमा । करत परस्पर अतिसय प्रेमा ॥ 
काम क्रोध मद लोभ बियोगे । गह बाल बिरध भल बिधि जोगे ॥ 
एक नर एवं एक नारी व्रत का नियम अंगीकृत कर परस्पर अतिशय अनुराग रखते हुवे काम क्रोध मद एवं लोभ से वियोजित होकर घर के बालकों एवं वृद्धों की भली प्रकार से देख-भाल करते हुवे : -- 

पतिनी सती पति परतिय, कुदीठ निपतत नाहि । 
सोइ गेहस ब्रह्म चरन, लेखि सदा जग माहि ॥ 
गेही एवं गेहिनी में यदि गेहिनी पतिव्रता हो एवं गेही परायी स्त्री की कुदृष्टि न रखता हो तब उस गृहस्थी को संसार में सदैव ब्रम्हचारी ही समझा जाता है ॥ 

बृहस्पति वार, ०३ जुलाई, २०१४                                                                               

रितु मुख लेई षोडस रैनी । ते अवधि रितु काल कह बैनी ॥ 
प्रथमहिं चारि तमि तासु माही । रजोदरसनी अवधि कहाही ॥ 
ऋतु मुख से लेकर षोडश यामिनी तक की अवधि को ऋतुकाल का कहा जाता है ॥ इनमें से प्रथम चार यामिनी को रजोदर्शन काल कहा जाता है ॥ 

सोइ काल बहु निन्दित होई ।  परसि न पतिनी  पति हो कोई ॥ 
सेष काल तिय गामिन जोगे । जातक जनमन अति संजोगे ॥ 
रजोदर्शन काल अत्यंत  निंदितकाल है । इस अवधि में पति को चाहिए की वह पत्नी के संसर्ग से दूर रहे ॥ शेष काल अर्थात शेष द्वादस दिवस स्त्री गामीण के योग्य हैं । इस का में संतान उत्पत्ति की अधिक संभावना होती है ॥ 

जोइ असम संख्यक धारी । होत  कन्या जनम कृतकारी ॥ 
सम संख्यक जामिनी माही । जननी जातक जात जनाही ।। 
सहष द्वादस अयानी में से सम संख्या वाली यामिनी  ( जैसे ऋतुमुख से छठवीं, आठवीं, दसवीं ) के संसर्ग के परिणाम स्वरूप जननी पुत्र जातक को जन्म देती है ॥ 

जब ससि निज हुँत दूषन लागे  । मघा मूल नखतु परित्यागे ॥ 
पुरुष बाचक श्रवन सम नावा ॥ करत समागम पावन भावा ॥ 
जिस दिन  चन्द्रमा  अपने लिए दूषित हो  और मेघा मूल आदि नक्षत्रों का भी परित्याग किया जाए अर्थात पुर्लिङ्ग नाम धारी नक्षत्र जैसे श्रवण आदि देखकर यदि अत्यंत पवित्र भाव से समागम किया जाए : -- 

तासु चतुर पुरुषार्थ धारी । होहि साधक सुत सदाचारी ॥ 
स्त्री बाचक नखतु रितु स्नाता । जन्मे सुबुद्ध सील सुजाता ॥ 
उससे चतुर पुरुषार्थ से युक्त साधक एवं शुद्ध सदाचारी पुत्र का जन्म होता है ॥  स्त्रीवाचक नक्षत्र में ऋतु स्नाता सुबुद्ध, सुशील, एवं चरित्रवान कुलीन कन्या को जन्म देती है ॥ 

जे श्रीमन श्रीमति हेतु, रजस काल  निर्देस । 
दोष अदोष गुन अवगुन  के पुनि दिए उपदेस ॥ 
यह श्रीमान एवं श्रीमती हेतु रजस का में दिए गए हितकारी निर्देश थे । तत्पश्चात मुनि मनीषीयों दोष-अदोष, गन-अवगुण के हितोपदेश दिए ॥  


शुक्रवार, ०४ जून, २०१४                                                                                                             

कनिआँ पानि दान के बिखिआ ।  माँग धरे तहुँ देइ न भिखिआ ॥ 
करे बिपनन कोउ बिपनाही । पापधी जगत  ते सम नाहीं ॥ 
कन्या का पाणि दान का विषय है, भिक्षा का नहीं है । यदि कोई कन्या का अभ्यर्थन करे तब ऐसे अभ्यर्थी को  कन्या  नहीं देनी चाहिए ॥ जो कोई विक्रेता कन्या का विक्रय करता है संसार में फिर उसके सदृश्य कोई पापाचारी नहीं है ॥ 

 द्विज राइ हेतु ब्यबहारा । नृपन्हि टहल जोग परिहारा ॥ 
बेदाभ्यास जेहि त्यागे । धिंग धरम धंधन मह लागे ॥ 
द्विज राज हेतु लेन -देन एवं राजाओं की सेवा सुश्रुता त्याज्य है । जिस द्विज  ने वेदाभ्यास का त्याग कर दिया हो जो द्विज धिंग धर्म के धंधे में लगे हैं ॥ 

 किए अस परिनय जो जग निंदा । कहि सुधि बुधि जन कह मुनि बृंदा ।।  
लुपुत नित करमि अस कुबिहाता । सकल बंस  दए नीच निपाता ॥ 
 जिसने ऐसा परिणय किया हो जो संसार में सर्वथा निंदनीय हो । मुनिगण एवं बुद्धिमान सुधितजन कह गए हैं ऐसे ब्राह्मण एवं कुविवाहित अपने नित्यकर्मों को विलुप्त कर  समस्त ब्रह्मवंश का पतन कर देते हैं ॥ 

गेहस आश्रम मेँ  बसि बासी । अतिथि देउ के आन निबासी ।\ 
सादर बर आसन बैठारें । फूल मूल फल सों सत्कारेँ ।। 
गृहस्थ आश्रम में वासित गृहवासी के निवास में जब अतिथि देव का आगमन हो तब वे उन्हें आदर सहित उत्तम आसन में विराजित कर फूल मूल फल दुग्ध आदि सात्विक पदार्थों से उनका सत्कार करें ॥ 

आगंतुक सत्कार के आसा ।  पवाए बिनु जो फिरैं निवासा ॥ 
सरनागत को सरन न पावे । छुधा तीस  अन्नजल न दावे ॥  जो कोई आगंतुक सत्कार की आशा  में हो और सत्कृत हुवे बिना ही गृहस्त के निवास से लौट जाए । जिस गृहस्थ के  निवास में शरणागत को शरण प्राप्त नहीं होता क्षुधित एवं क्षुधा तृष्णा को जो अन्न जल न देवे ॥ 

दान धरम पुन कृत करम, जीवन भर संजोइ  । 
अस गेहस छिनु मह तासु  , फल सों  बंचित होइ  ॥ 
ऐसे गृहस्थ  जीवन भर के संचित दान धर्म, पुण्य कर्म के फल से क्षण मात्र में ही वंचित हो जाते  है ॥ 

शनिवार, ०५ जुलाई, २०१४                                                                                            

 गेहस हेतुक नेम धराईं । बलिबिसदेउ करम के ताईं ॥ 
देत भाग सुर पीतर मनु जन ।  सेषासन तासु हुँत सुधासन ॥ 
गृहस्थ हेतु यह नियम निर्धारित कि वह बलिवैश्वदेव -कर्म के द्वारा सर्वप्रथम देवताओं, पतृजनों एवं अमनुष्यों को भाग दे तत्पश्चात शेष अन्न का भोजन करे तो वह भोजन उस हेतु अमृत हैं ॥ 

दान बिनु जोइ आपहि पावैं । आप पकावै आपहि खावै ॥ 
सो पोषक सम सोइ कलापा । आप श्रवन जो आप अलापा ॥ 
जो गृहस्थ दान न देता हो जो केवल अपने ही उदर के परायण होकर अपना पकाया हुवा आपही खाता हो वह पोषक उस कलाधर के सदृश्य है जो अपने आलाप को आपही सुनता है ॥ 

मिषाहार मह पाप निवासे । छठइ अठमी सार मह बासे ॥ 
चतुर्दसि छौर करम  त्यागे । तिय समागम अमावस लागे ॥ 
मांसाहार में सदैव पाप का निवास होता है अत: ऐसे आहार का परित्याग करना चाहिए किसी भी पक्ष की षष्टी एवं अष्टमी  को तेल में पाप का वास होता है अत: उक्त तिथि तेल निषिद्धवत है ॥ चतुर्दसी को क्षौर कर्म का त्याग करना चाहिए अमावस्या को समागम का परत्याग करना चाहिए ॥ 

एक बसन धार साथरी आसिन्हे । अन्न प्रासन बर्जित कीन्हे ॥ 
जो नर निज तेजस के  कामा । लखे न भोजन पावत भामा ॥ 
एक वस्त्र धारण कर तथा चटाई के आसन पर आसीत होकर भोजन करना वर्जित है ॥ स्वयं में तेज की कामना करने वाले पुरुष भोजन कराती हुई स्त्री पर दृष्टी न करें ॥ 

मुख सोंह कोउ अगन न फूँके । नगन तन दरसे न कोहू के ॥
पय पात बछर न छेड़ लगाए । दूजनहि हरि चाप न देखाएँ ॥ 
मुख से अग्नी नहीं फुँकनी चाहिए इस हेतु फूँकनी का उपयोग करना चाहिए । किसी भी वस्त्र हैं की और दृष्टी न करें । पायस पाते उवे बछड़े को न छेड़ें । दूसरों को इंद्रधनुष नहीं दिखाना चाहिए ॥ 

निसा काल दधी प्रासन, पूरन बर्जित होइ । 
न अगन पद तपै न हूँते को अपबित सँजोइ ॥ 
निशाकाल में दधि का प्रासन पूर्णतस वर्जित है । अग्नी को चरण नहीं दर्शाना चाहिए न ही उसमें अपवित्र वस्तु आहूत न करें ॥ 

शुक्रवार, २५ जुलाई, २०१४                                                                                                    

सबहि जीउ निज प्रान पियारे । एतदर्थ को हंत ना कारें ॥ 
निसा काल अल्पहि आहारहू । दुहु संधि समउ मह परिहारहू ॥ 
सभी जीवों को अपने प्राण प्यारे होते हैं । अत: किसी भी जीव की न तो हत्या करनी चाहिए न ही कष्ट देना चाहिए । निशा काल में अल्प आहार ग्रहण करना चाहिए एवं दोनों संधि काल के मध्य किसी भी भाँती खान-पान से वियोजित रहना चाहिए ॥ 

बिषइ संग सुख भोग बिलासा । करत सदकृत चरित के नासा ॥ 
काँस पात्र  मह चरन पखारन । झूठन भंजन भाजन प्रासन ॥ 
सयन  दसामह प्रास मनाया॥ प्रगसे नहीं कहुँ मर्म पराया ॥ 
आर्द्र चरन  दसा ना सयनै । झूठे मुख कर कहूँ न गवने ॥ 
विषयों का संग किए भोग विलास में संलिप्त  होने से सङ्कृत्य चरित्र नष्ट -भ्रष्ट हो जाते हैं॥ सोते हुवे भोजन ग्रहण करने की मनाही है । किसी के भेद को अन्यत्र प्रकट नहीं करना चाहिए ॥ आद्र चरण की अवस्था में शयन न करें झूठे मुख कहीं भी न जाएँ ॥ 

एहि बिधि गेहस धरम पूरनित ॥ सद्कर्मन कृत कारज जगहित ॥ 
मनीषि मन मनोभंग भेसे  । तीजक आश्रम माहि प्रबेसे ॥ 
सद्कर्म एवं जग हित के कार्य करते हुवे इस प्रकार गृहस्थ-धर्म का समय पूर्ण कर विचारशील मानस के सह जग से उदासीन होकर तीसरे आश्रम अर्थात वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करें ॥ 

चाहे त बिरति पूर्बक, रहे संगनी संग । 
न तरु  तिय कर सौपत गह , गवनु तपबन् एकंग ॥ 
चाहें तो विरक्ति पूर्वक स्त्री के संग रहे । अन्यथा स्त्री को घर-गृहस्थी सौंपकर एकाकी ही  तपोवन हेतु प्रस्थान करें ॥ 

शनिवार, २६ जुलाई, २०१४                                                                                                     

जगप्रति पूर्ण होत उदासा । ता परतस लए लै सन्यासा ॥ 
तेहि समउ सदोगत् सुजाने । किए धर्मं के अनेक बखाने ॥ 
संसार के प्रति पूर्ण रूप से उदासीन होकर वानप्रस्था आश्रम के पश्चात पूर्णत: संन्यास ले लेवें ॥ उस समय सभा में उपस्थित सुबुद्धिजनों ने धर्म के अनेक व्याख्यान किए ॥ 

 सर्ब हितकर सर्बोपकारी । हमरे हरिदै के अधिकारी ॥ 
सुने सबइ बहु देइ धिआना । ग्यान  पूरित धर्म अगाना ॥ 
सभी का कल्याण करने वाले सब पर उपकार करने वाले हमारे ह्रदय के अधिकारी जगत्पति  श्रीरामचन्द्रजी ने सभी सज्जनों के ज्ञान पूर्णित धर्माख्यान को ध्यान पूर्वक सुना ॥ 

कहत सेष हे वात्स्यायन । एहि बिधि तनिक काल लग भगवन ॥ 
ग्यानिन्हि मुख नीति बिबेका । सुनत रहे प्रभु बरन अनेका ॥ 
भगवान शेषजी कहते हैं : --  हे वात्स्यायन !इस प्रकार कुछ समय तक भगवान ज्ञानियों के मुखारविंद से विवेकशील नीतियाँ के अनेकोनेक वर्णन सुनते रहे ॥ 

आइ पुहुप रितु ऐतक माही । फरे फूर सुभ कर्मन बाही ॥ 
 वसंत काल को जब आगत देखे । बसिष्ठ मुनिहि सुभ महूरत लेखे ॥ 
इतने में ही पुष्प ऋतु का आगमन हुवा  पुष्प पुष्पित हो उठे, मुनिवर वशिष्ट ने जब कर्म काण्ड के संचालक वसंत काल को आते हुवे देखा । तब यज्ञ काण्ड हेतु शुभ मुहूर्त लिखा ॥ 

करे  बिदा निर्गत सरद, बसिष्ठ मुनि मतिबंत । 
कमन कियारि भरत कुसुम, बिथि बिथि छाए बसंत ।। 
 फिर विधिदर्शी बुद्धिवंत मुनिवर वशिष्ट ने जाते हुवे शरद को ससम्मान विदा किया । हरिद साटिकाओं की सुन्दर क्यारियाँ पुष्पमयी हो गईं, गली गली में फिर वसंत छा गया ॥ 

रविवार, २७ जुलाई, २०१४                                                                                                     


जहँ जहँ पुहुप रथ चरन धराए । पुहुप प्रफुरित फर फरित सुहाए ॥ 
होत समुख तब जानकी जानी । गहत मुनि बर जथोचित बानी ॥ 
पुष्य रथ के चक्र जहां जहां जाते ।  पुष्प प्रफुलित हो जाते, फल फलित हो जाते । तब भगवान श्री रामचन्द्रजी के सम्मुख प्रस्तुत  होकर विधिदर्शी वशिष्ट ने  यथोचित वाणी ग्रहण  की  : --

  पुलकित निलय संग सिरु नाई ॥ कहत प्रभु हे जगत गोंसाई ॥ 
जिन हेतु  पलक पंथ जुहारे  । सो अबसरु अब आन पधारे ॥ 
शीश नमन कर हर्षयुक्त ह्रदय से वे बोले  : -- हे प्रभु ! हे जगत्पति ! जिसके लिए यह  युगल पलक  पंथ पर लगी  हैं
। वह अवसर अब आ गया है ॥  


जेहिं मेधीय अस्व चयनिते  । तासु भल भाँति करत सदकृते ॥ 
कलित राजोपकरण कल केतु । परिहरउ महि मह भरमन हेतु ॥ 
जिस योग्य अश्व का मेध हेतु चयन किया गया है । उसका भली भांति सत्कार करते हुवे उसे राज्य के समस्त चिन्हों एवं ध्वज पताकाओं से सुसज्जित करें जिससे वह पृथ्वी भ्रमण हेतु त्याग जाए ॥ 

मेध हुँत सुभ जोइन संजोएँ । जग द्विज राउन्हि बोलि पठोएँ । 
आगंतु के करत सत्कारे । आपही अगुसर चरन पखारें ॥ 
यज्ञ  हेतु सभी मंगल पदार्थों का संकलन करें । एवं जगत भर के ब्राह्मणों एवं नरेशों को निमंत्रित करें । आगंतुक का स्वागत सत्कार करते हुवे अग्रसर होकर आप स्वयं उनके चरण धोएं ॥ 

करत सेबाभृत बिधिबत जाचक गन दएँ मान । 
तासु मन जो लहन चहए, सोई करें प्रदान ॥ 
विधिवत सेवासुश्रुता  कर याचक गण को यथोचित सम्मान देवें उन्हें उनकी मनचाही वस्तुएं प्रदान करें ॥ 

सोमवार, २८ जुलाई,२०१४                                                                                          

ससि रबि  हर बिरंचि सनकादी । आगत सुर जे परम अनादी ॥ 
आवहि मुनिगन जूथ घनेरे । देत कृपानिधि सुन्दर डेरे ॥ 

उमा सरूप जानकिहि संगे ।  लए मख दीखा हे श्री रंगे ।।  
करत पालन तासु ब्रत नेमा । बढ़ा चरन चर रह सह प्रेमा ।। 

सयनहु महि तल तृण पल डासी । भीषय भोग प्रति रहत उदासी ॥ 
आपनि कमनिअ कल कटि भागा । करत कलित कटि सूत सुभागा ॥ 

धारन कर हिरन श्रृंग चामा । धरे दंड पुनि करतल बामा ॥ 
सबहि भाँति के जोइनु सँजोएँ । मंगल द्रब्य सन सोभित होए ॥ 

सुनत रिसिहि के सद बचन, बुद्धि बंत  रघु राए । 
हर्षित होत मन ही मन, लघु भ्रातिन्ह बुलाए ॥ 

मंगलवार, २९ जुलाई,२०१४                                                                                                      

आए भ्रात सौमुख सिरु नवाइ । जथारथ बचन जुगत अभिप्राइ ॥ 
 भाउ थीत कहि राम सुजाना । सुनौ बचन मम देइ धिआना ॥ 

सुनत तासु तुर् पालन कारौ । अस्वमेध हुँत साज सँभारौ ॥ 
सत्रुहन लखमन देखो भालौ । अतिथिगन सहित सैन सँभालौ ॥ 

उठहु भरत अब तुरतै गवनै । मेधीय है संग लय लवनै ॥ 
बुला सेबक सचिवन्हि कहहीं । रचे बितान बान निरखहहीं ॥ 

भरत सत्रुहन तुरतै गवन के । करे सुश्रुता आगतगन के ॥ 
दोउ भ्रात सन लखन पयाना । होत  समुख कहि सेन प्रधाना ।\ 

अविजित सेना के बाहि  समर सूर हे वीर । 
पुनि लखन प्रियअगान किए, बरत बानि गंभीर ॥