Tuesday, 21 February 2017

----- ।। उत्तर-काण्ड ५६ ।। -----

अति बिनैबत  धरत महि माथा । लषन प्रनाम करत रघुनाथा ॥ 
लखि अपलक अरु पलक न ठाढ़े । अबिलम मरुत बेगि रथ चाढ़े ॥ 

कल कीरन कर भर करषाई । सियहि आश्रमु चले अतुराई ॥ 
तेजस बदनु भावते जी के । रघुनाथ तनय अतिसय नीके ॥ 

बहोरि भर अनुराग बिसेखे । बिहँसि महर्षि ताहि पुर देखे ॥ 
कहब बछरु धरु कण्ठ कूनिका । गाउ सुठि को सुर संगीतिका ॥ 

सिउ सारद नारदहि सुहाना । रघुबरहि कृत चरित कर गाना ॥ 
गुरु अग्या करतल बर बीना । गावहि हरिगुन गान प्रबीना ॥ 

प्रगसो दानव दैत निकंदन प्रगसो हे नयनाभिराम । 
प्रगसो हे महि भारु अपहरन प्रगसो हे ललित ललाम ॥ 
कुकर्म महु लीन अति मलीन मन करे सबु मति कर बाम । 
दीन हीन सुख गुन बिहीन भए भरे हम धरे धन धाम ॥ 

प्रगसो अनाथन केरे नाथ हे प्रगसो सिया बर राम । 
तरपत परबसु पियास मरत पसु बहत सुरसरि सबु ठाम । 
तुम बिनु खल दल बल गह भए भल पूर सब साधन साम ॥ 
भगति बिमुख जग कारन चरनहि भजहिं न करहिं प्रनाम ॥ 


खलदल दवन भुवन भय भंजन प्रगसो भानुकुल भाम । 
प्रगसो भगवन दुर्दोषु दहन अपहन मोह मद काम ॥ 
भ्रष्ट अचार अस भा संसार भए सबु अलस अलाम ॥ 
जहँ तहँ बाधि बिबिध ब्याधि जग करिअति अति छति छाम ॥ 

करि करि पाप कहैं  पाप नहि किछु गहैं मुए कठिन परिनाम । 
हे कमलारमन करो अवतरन करन बिस्व बिश्राम ॥   
तव मंगल करन लाए पथ नयन सब दिनु सब रितु सब जाम ॥  
हे अवतारी अवतार गहन बरो बपुष घन स्याम ॥  

 जग संताप देइ ताप करै घोर घन घाम । 
आरत भूमि पुकारती प्रगसु हे तरुवर राम ॥ 

शनिवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                       

कातर भूमि पाप भर भारी । धेनु रूप धरि करिअ गुहारी ॥ 
पुनि दोनहु बालक बड़भागे । हरि अवतरन कथा कहि लागे ॥ 

भाव भेद पद छंद घनेरे । पुन्यकृत चरित चितरित केरे ॥ 
धर्म धुरंधर बिधिकर साखी । भगवान भगति भाँति बहु भाखी ॥ 

भनत भनितिहि भदर भर भेसा । किए अबिरत पतिब्रत उपदेसा ॥ 
नेम बचन दृढ़ भ्रात स्नेहा । काल परे अनुहरि सब गेहा ॥ 

सुबिरति जति गुरु भगति बखाना । अनुगम अनुपम सबहि बिधाना ॥ 
दरसिहि जहँ साईँ समुहाना । सेबक नीति मूरतिमाना ॥ 

निबध निपुण नय नीति सुरीति । निगदिहि निर्मल प्रीति प्रतीति ॥ 

कलि कलुष बिभंजन जहां पापीजन निज हाथ । 
भू भय हरन पाप दमन दंड दिये रघुनाथ ॥ 

रविवार, २५ फरवरी, २०१७                                                                                       

गाएँ सुमधुर बाँध सुर दोई । मंत्र मुग्ध सब श्रुत सुखि होईं ॥ 
परे मूर्छि सिद्ध गंधर्बा । हतचित चकित सुराग सुर सर्बा ॥ 

सुनत सहित अनगन  महिपाला । होइहिं मोहित जगद कृपाला ॥ 
मोह मगन मन धीरे न धीरा । आनंद घन नयन बह नीरा ॥ 

पुनि पंचम सुर गान अधीना । प्रेम सरित  बहि होइहिं लीना ॥ 
रह अस्थमबित हिलहिं न डोलहिं । चित्र लिखित सम अबोल न बोलहिं ॥ 

पुनि महर्षि दोनहु सुत तेऊ । कृपा समेत इ बचन कहेऊ ॥ 
तुम्हरी मति अस बल सँजोई । कि नीति कुसल नहि तुअ सहुँ कोई ॥ 

अजहुँ पहिचानउ  तेहि ए पूजनिय पितु तुहार । 
जाइ करिहौ तनके प्रति, पुत्रोचित ब्यबहार ॥ 

सोमवार, २६ फरवरी, २०१७                                                                        

सुनि मुनि बचन आएँ दुहु आगे । बिनय भाउ ते चरनहि लागे ॥ 
मातु कर करि करि सेउकाई । भए निर्मल हरिदै दुहु भाई ॥ 

नए सिरु पद देखि रघुराई । प्रेम मुदित दुहु लिए उर लाई ॥ 
सुत सुरूप महुँ मूरतिमाना । प्रगसि धर्म मम किए अनुमाना ॥ 

सहज मनोहर मुख अति नीके । दोउ तनय श्री रघुबर जी के ॥ 
सभा बिराजित सकल समाजा । नगर नारि नर सुर मुनि राजा ॥ 

चितवहि सचकित तिन्हनि ओरा । चितए  चकित जिमि चंदू चकोरा ॥ 
मानेउ सत्य सरिस सती की । पति भगति श्री जानकी जी की ॥ 

कहत सेष मुनि लषन पुनि, गवन  रिषि तपोधाम । 

दीन्हि असीस सिय चरन सिरु धरि करत प्रनाम ॥  

शुक्रवार, १० मार्च, २०१७                                                                                     

निरख बिनयसील लछमन आए । सुनी पुनि जनि निज जान बोलाए ॥ 
जोरे हृदयँ लोचन कर पानी । कहहि ससनेह करुनित बानी ॥ 

रघुकुल कैरब मोहि त्यागे । दिए बियोग घन किए बन आगे ॥ 
एहि गुह गोचर घर घन घोरे । करिअहिं नाथ सुहरिदय मोरे ॥ 

त्यागु जोग बहुरि अपनाई । एहि जग केहि सुहाव न भाई ॥ 
चरनन्हि तृन पात फल फूला । परे भूमि न चढ़ेउ बहूला ॥ 

चलौं अजहुँ कस कहउ अतेवा । मोरे भाग न प्रभुपद सेबा ॥ 
रहिहउँ आश्रमु बाल्मिकी के । सुरति धरत नित रघुबर ही के ॥ 

सुनत लछमन सियहि बचन मातु कहत गोहारि । 
लेय उसाँस निरासु भरि कातरि डीठ निहारि ॥  

शनिवार, ११ मार्च, २०१७                                                                              

कहत लछमन सुनहु महतारी । लाए  नयन मग होइहि हारी ॥ 
बुला पठइँ प्रभु बारहि बारा । सेष रुचिरु जस होइ तिहारा ॥ 

मन क्रम बचन चरण रति होई । कहहु मातु परिहरहि कि सोई ॥ 
सुकुता गह बसि मनि सम रूपा । दीपक दिनकर किरन  सरूपा ॥ 

बसिहि देह जनि जिअ के नाई । नाथ तोहि तस हृदयँ बसाईं ॥ 
(तथापि ) पति अपराधु पति ब्रता नारी । धरिअ उरस न मनहि महुँ घारी ॥ 

करउँ बिनति पुनि पुनि जुग हाथा । चढ़ि स्यंदन चलहु मम साथा ॥ 
मानिहि पति सिय देउ समाना । अकनि सोइ सबु बचन बिहाना ॥ 

प्राति प्रतीति पुकारि उत मुनि तिय कहि  अनुहारि । 
प्रभु परिहरि गति न दूसरि चलि अस नीति बिचारि ॥  

बुधवार, २९ मार्च, २०१७                                                                                            

बेदिन मुनिगन करिअ प्रनामा । चढ़ि रथ सिरु नत तापसि बामा ॥ 
सुमिरि मनहि मन रघुबर नामा । परस पद लिए दरस मन कामा ॥ 

सील सनेहिल भूषन साजै । सहज सुहावन बसन बिराजै ॥ 
भाउ प्रबन मन बेषु बनावा । जिमि उदयित बिधु बदन सुहावा ॥ 

यहु मंगल मूरति ममता की । सदा सहाय सीम समता की ॥ 
होइ लगाउब केहि न काहू । रोकइँ  न चहत कहत न जाहू ॥ 

गहि गहि बहियाँ लपटहि डगरी । अजहुँ दूरि न पिय केरि नगरी ॥ 
चलहि स्यंदन चरन अतूरी । होइँ तपु बन नयन ते दूरी ॥ 

पारग घन गिरिगन मनियारी । अतुरै दरसिहि अवध दुआरी ॥ 
नाघि नगरि चलि जाति निहारी । भरिअ बिलोचन बरसिहि बारी ॥ 

प्रबसित सो पावन पुरी, पहुँचिहि सरजू तीर । 
रहें बिराजित आपहीं जहँ गुरु सन रघुबीर ॥ 

शुक्रवार , ३१ मार्च, २०१७                                                                            

 लखनु सहित सो परम सुभागी । उतरि जाइ तहँ प्रभु पग लागी ॥ 
परसत पिय पद पदुम परागा । बिरागिनि मन भरीं अनुरागा ॥ 

सुर तरंगिनि बहीं चलि आईं । होत सतीरथ सिंधु समाई ॥ 
भर आँचरहि नयन जर मोती । मिलहि मिलहि जिमि दीपक जोती ॥ 

जानकी साथ जानकि नाथा । दुनहु निज मरजाद के साथ ॥ 
दरसत बदन मनोहर पिय के । ससि सरि सीतर भए हिय सिय के ॥ 

मिलइ बिभो सहुँ जगद बिभूती॥ मेलिहि मुकुता मनि सहुँ सूतीं || 

नूपुरामुखर पद अवध पधरयो प्रनता जन नत माथ रे । 
जगन्निवास वरदवास भए जग नाथ जानकी साथ रे ॥ 
 हे हंस धुनी कल वादिनी केहि कृति कुसल करतल गहौ । 
गाउ सुमधुर साध सबहि सुर वद को सुखप्रद श्रुति कहौ ॥ 

साधक गन सुरसाधहीं करुनाहू करुनाइ । 
करुनाधीन करुनानिधि रामु सिया समुहाइ ॥ 
सोमवार,०३ अप्रेल,२०१७                                                           


बनहि बिपति बिबरन नहि पूछहिं । आरत बदन बयन सबु बरनहि ॥ 
बीतै दिवस न जामिनि बीती । दीप धुजा बस रस रस रीती ॥ 

अगजग लग जोतिर जस जागे । जागिहि जोति पलक न लागे ॥ 
कहिय दहिय हिय पियहि बिहीना । सियहि जियहि जिमि जल बिनु मीना ॥ 

तलफत भए छन कल्प समाना । घनबर अल्प न लाइ मलाना ॥ 
नैन निराजन आँज अँजोरे । घोरिहि घेर निसा घन घोरे ॥ 

जियति धरि जियँ पियहि जिय जानी । मन तनि सोच न हानि ग्लानी ॥ 
प्रभु छबि हरिदै दरपन लाखे  । पूजि चरन मन मंदिर राखे ॥ 

फिरिहि बिकल बन धरिअ छिलावा । परिअहि निज चरनन तल घावा ॥ 
बारहि बार आपु बोलाईं | धरिअ देही रहि प्रान पठाई || 

जाइ जहँ तहँ तुम्हहिं अहेरे । बिहुरन दए दुख दुसह घनेरे ॥ 

बूड़हि नाहि तीरहि अह बिरहा उदधि अपारु । 
करनधार करु धार नहि को बिधि पाए न पारु ॥ 
शनिवार, ०८ अप्रेल,२०१७                                                                     

गहइ बनहि घन सूल सलाका | कहइ बिनहि सबु देइ भलाका || 
दीन दसा दृग दरसि न जाई | बरसि कहसि हे नाथ दुहाई || 

देइ द्वारि पलक पट ढारे | राम राम हाँ राम गुहारे || 
दुइ छन होर हरुअ हिलोले | सूझ परइ न कहइ का बोलेँ || 

आवत रसन बरन अवरूझे | बिनबत कुसल छेम पुनि बूझे || 
होइ कुसल कस जोइ अनाथा | सबहि मंगल नाथ तव साथा || 

रघुकुल दिनकर नयन अगासे | उदइ गहन बिरहन निसि नासे || 
कृत कृपा केतु भा भोर अलस | पयस पयस भा हरिदय मानस || 

 परम पेम मय हृदय ते कल कर कलस सँजोइ | 
धरि सीस महि गहि चरनहि अरपिहि सरसिज दोइ || 

पेम पूरित नैन जल जोरे । नाथ छमिबो दोषु जो मोरे ॥ 
बोलिअ बिकल बैन बैदेही । बिधि बध्यो सबु दोषु न केही ॥ 

एहु सुअवसरु कहिअ रघुनाथा । करिहउँ पूरन मख तव साथा ॥ 
नाइ माथ सहुँ बाल्मीकि के । आसिर बचन  लहे प्रिय जी के ॥ 

नत मस्तक सहुँ ब्रम्ह रिसिहिं के । सुभगासीस गहीं सबही के ॥ 
कौसल्या कि मातु कैकेई । गईं प्रनमन सबु साधु देईं ॥ 
साधु -देवी 
पगु परसत उर हर्ष न थोरे । देइ असीसहिं लेइ अँकोरे ॥ 
देखीं जब पगपरि बैदेही । भेंटि कैकेइ भईं सनेही ॥ 

देइ असीस उर उदधि उमगि पेमानुराग । 

दुहु सुत सहित चीर जियौ रहिहौ भरिअ सुहाग ॥ 

मंगलवार,११ अप्रेल,२०१७                                                                     
रामचंदु कर प्रिय परिनीता | सतवति सती साध्वी सीता || 
परिजन सहित सबहि पहिं जाई | कीन्हि प्रनाम अति हरषाई || 

कुंभज आइ देखि जूँ सीया | मुदित भयो सो नहीं कथनीया || 
रघुबरहि दिसि बाम बैठारे | अरु सुबरन मइ मूरति टारे || 

बैसिहि बेदि रामु बैदेही | सोभा सकै न  कहि मुख केही || 
बैसि बिभो जनु जगद बिभूति | प्रगसहि भू नव नव भव भूती || 

अपूरहि पौर पुर नर नारी | भए नभ थल कोलाहल भारी ||  
चहेउ  दीठि सबु एकहि बारा | रामसिया के मिलइ निहारा || 

गहि कमंडल मुनि मंडल पुनि किए समिदाधान | 
जुगे पानि निर्मल बानि करिहि अनल अह्वान || 

रविवार,१६ अप्रेल,२०१७                                                                                            

करसि बेदु धुनि अति मृदु बानी | बहसि मंद जिमि नदि के पानी || 
सरस वती मुनि कंठ बिराजिहि | करन लगे रघुबर मख काजहि || 

पुनि परम बुधि सुधि साधु  सुभाए | गुर बसिष्ठ सोंहि पूछ बुझाए || 
दरसिहि बेद सोइ सबु भयऊ | अबर कवन करतब रहि गयऊ || 

एहि मह मख हे गुर गोसाईँ | बोलिहि गहबरु घन के नाई || 
जाग जोग सब काजु अपूरे | राखिहि जौ भूसुर परिपूरे || 

अजहुँ बिधिबत करिहु सो पूजन  | श्रुतत रघुपत एहि श्रुति सुख बचन || 
कुंभज परम पूजनिअ जाने | पूजत ताहि प्रथम सनमाने || 

उदार रूप नाना बिधि तनु मनु भावनु चीर | 
गज रथ तुरग धेनु धरनि हिरन जड़ित मनि हीर || 

प्रीति दायक बस्तु गहित दीन्हि बहुतक भार | 
कृत कृत प्रभु मुनि तिय सहित कीन्हि अति सत्कार || 

तिया सहित च्यवन रिषिहि पूजत भले बिधान | 
समदत सबहि सम्पद ते दिए बहु आदर मान || 

मंगलवार,१८ अप्रेल,२०१७                                                                                         

एहि बिधि रहि रिषि महर्षि जेता | सकल तपसी ऋत्वजहि समेता || 
बस्तु अनेक सुभ मंगल करन | रूचिहि बिचार बहु पहिरावन || 

भूषन भरे भार दए भूरी | देइ मान लीन्हि पग धूरी || 
दीनहीन दुखि अंधहि लोचन | देत दान दुःख करत बिमोचन || 

सुख सुसंपद सहित गोसाईँ | मधुर मधुर भोजन बिरताईं || 
दिए दान अस बेदु अनुहारे  | सबहि तोषु परिपोषनहारे  || 

आदर मान पेम पद पूजा | करिहि अस कि करि सकै न दूजा || 
रघुनन्दन कर दायन देखे | कुंभज मुनि भय मुदित बिसेखे || 

अश्व नहावन सुभ घरि जानी | मँगावनु सुधा सरिबर पानी || 
रानिन्ह सहित चौसठु राईं | बहुरि अतुरै निकट बोलाईं || 

नव सप्त श्रृंगार सोंहि श्री सोहित सिय साथ | 
कनक कलसि कर धरे जल चले लेन रघुनाथ ||

बृहस्पतिवार, २० अप्रेल,२०१७                                                                          

हिरन मई गागरि गहि हाथा | आगे सिया सहित रघुनाथा || 
धूपापत छाँहीँ के नाई | पाछु चले तीनिउ लघु भाई || 

मांडवी भरत संग सुहावै | उरमिला लखनु मन अति भावै || 
श्रुतिकीरति रिपुदवनु प्रसंगा | कांतिमति पुष्कल कै संगा || 

लक्ष्मीनिधिहि कोमला साथा | मोहना के सोह कपि नाथा || 
सुरथहि संगत सुमनोहारी | उदधि धरे सबु भयउ कहारी || 

एहि बिधि रहि अरु जेतक रायो | बसिष्ठ रिषि जल लेन पठायो || 
सीत पुनीत पुण्य पयसु गही | सरजू तट गयउ सो आपहीं || 

बाँचत बंदि बेदु बचन बहु बिधिबत तहँ जाइँ | 
किए अभिमन्त्रित तासु जल भए सो अरु सुभ दाइ || 













 














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