Friday, 8 September 2017

----- || दोहा-एकादश 15 || -----

जीव-जंतुओं के जैसे मनुष्य का भी क्रमगत विकास कैसे होता है
"बाह्य स्वरूप में क्रमागत विकास  के पश्चात आतंरिक स्वरूप में क्रमबद्ध परिवर्तन से मानव में जाति का उद्भव हुवा....."

पाश्विकता से अधिकाधिक परिष्करण ने मनुष्य में उच्च जाति को उद्भिद किया.....'


जनम संगी मातु जनित एक पितु कर संतान |
बंसानुगत कौटुम के होत गयउ निर्मान || १ ||
भावार्थ : - वंशानुगत प्रक्रिया से  जीवन भर साथ रहने वाली माता द्वारा जन्मी एक पिता की संतान से परिवार का एवं इस प्रक्रिया के वंशगत अनुशरण से कौटुम्ब का निर्माण हुवा.....

गठत सील सद चारिता रचत नेम कछु रीत |
संस्कारित होत  बहुरि साकारित भए भीत || २ ||
भावार्थ : -  शील व् सदाचारी वृत्तियों का गठन करते हुवे कतिपय नियम-निर्बंधों एवं परम्परागत रीतियों की रचना के द्वारा वह कुटुंब संस्कारित होता गया, इस प्रकार मनुष्य के विकृत अंर्तजगत ने सुन्दर स्वरूप धारण कर लिया |

बंसानुगत सतत करत जीबिकार्जन काज |
समय वर्ति अस जूह सों निरमय जात समाज || ३ ||
भावार्थ : - प्रचलित धार्मिक पद्धति एवं रीतियों का अनुशरण करने वाले समूह के वंशानुगत जीविकार्जनित कार्य ने जाति का तथा उक्त जाति के समुच्चय ने समाज का निर्माण किया |

इस प्रकार मनुष्य का नाम उसके अंतर्जगत का व् जाति अथवा उपनाम उसके बहिर्जगत का द्योतन बना.....

जैसे : - 'श्रीराम चतुर्वेदी'

श्री राम का तो पता नहीं किन्तु  इसके पूर्वज वैदिक धर्म के अनुयायी थे 'चतुर्वेदी' का अर्थ है ये ब्राह्मण जाति के थे एवं चारों वेदों का ज्ञाता थे | चूँकि इस कौटुम्ब समूह द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी अहिंसा एवं सदाचरण का पालन होता था इसलिए यह समूह ब्राह्मण कहा गया | बहिर्जगत में इसके पूर्वज आजीविका हेतु वेदों के पठन-पाठन का कार्य करते थे.....

जैसे : - 'रामदास केवट '
रामदास : - पूर्वज वैदिक धर्म के अनुयायी
केवट : - नाव खेने का कार्य | चूँकि इस समूह की हिंसा में अनुरक्ति थी इसलिए यह एक निकृष्ट जाति थी |

बाहिर कर क्रिया कलाप भीत जगत कर भाउ | 
बंशानुगत सतत नियत गयउ करत बरताउ || ४ || 
भावार्थ : - बाह्य जगत के क्रिया कलाप तथा अन्तर्जगत के मनोभाव पीढ़ी-दर पीढ़ी स्थानांतरित होकर संतान के व्यवहार को नियंत्रित करते गए  |  बाह्य जगत के  क्रिया कलाप व् अंतर्जगत के मनोभाव उचित होते तब तत्संबंधित वंशज का व्यवहार भी उचित होता |

जैसे पाए अहार जो तैसे होत विचार | 
जैसे होत विचार सो तैसे करत ब्यौहार || ५ || 
भावार्थ : - यह कथन भी सर्वविदित है कि जिसका जैसा आहार होता है उसके विचार भी वैसे ही होते हैं और जैसे विचार होते हैं उसका व्यवहारिक जीवन भी वैसा ही होता है | यदि आहार में हिंसा है तब उसके विचार भी हिंसावादी होंगे यदि हिंसावादी विचार है तब उसका व्यवहारिक जीवन भी हिंसा पर आधारित होगा |

भीतर केरे भाव सों सब करतब संजूत | 
बंशानुगत करतन रत गहत जात  गुनसूत || ६ || 
भावार्थ : - दया एक भाव है और दान एक क्रिया है  अंतर्जगत के भावों से सभी कर्त्तव्य संयुक्त हैं | जब कोई भावजनित कर्त्तव्य वंश से प्राप्त होकर संतान द्वारा निरंतर कार्यान्वित होता है तब वह गुणधर्म का रूप लेकर गुणसूत्रों में संगृहीत होता जाता है जो उसके मूल स्वभाव का निर्धारण करते हैं |

जनम दात बँसानुगत, जनिमन रचे सुभाव । 
तैसी भावै भावना जैसे अंतर भाउ ।१८३७। || ७|| 
भावार्थ : -- संतान को उसका मूल स्वभाव यद्यपि उसके वंश द्वारा प्राप्त होता है । तथापि उसके अंतकरण में जैसे भाव व्युत्पन्न होते हैं उसकी भावनाएं वैसी ही होती है ॥

दानि घर अदानि जनमें, पहरी  के घर चोर। 
अँधियारे घर चन्द्रमा, रयनी के घर भोर ।१८३८। || ८ || 
भावार्थ : -- दानी के घर अदानी भी जन्म लेता है । प्रहरी के घर चोर भी हो जाते हैं ॥ जैसे अँधेरे घर में चन्द्रमा होता है और रयनी  के घर में भोर होती है ॥

चोरीचकारि कलाकारि यह नहि मूल सुभाउ | 
बाताबरन जनित येह  सामाजिक परभाव || ९ || 
तात्पर्य है कि : --  चोरी, दान, भिक्षावृत्ति , नेता गिरी,  कवि,  कलाकारी,  यह वंश द्वारा प्रदत्त मूल स्वभाव नहीं है । यह वातावरण जनित एक सामाजिक प्रभाव है । मनुष्य जैसे वातावरण में रहता है उसकी वृत्तियाँ भी वैसी ही होती जाती हैं ॥

जहाँ इष्ट विशिष्ट संग मिले नेम सुभ रीत | 
कुलीनता संगत मिले तहँ मर्जादित भीत || १० || 
भावार्थ : - जहाँ भद्रता व् उत्तम संस्कारों के साथ उत्तम उत्तम नियम व् कल्याणकारी रीतियाँ मिलती हैं कुलीनता के संगत वहां मर्यादित अंतर्जगत का संयोग होता है |

उत्तम कुलाचार से कुलीनता अर्थात शुद्धता प्राप्त होती है, शुद्ध रक्त अधिकाधिक निरोगी होता है
एक वंशानुगत अहिंसावादी शुद्ध शाकाहारी व् सात्विक तथा अन्य रक्तदाता का ग्रहीता रोगी पर पड़ने वाला प्रभाव शोध का विषय है.....

मात पिता संगत जहाँ पुर्बज के पहचान | 
बंशानुगत लषन हेतु सोई बंस निधान || ११ || 
भावार्थ : -  किसी संतान की वंशानुगत लक्षणों के अध्ययन हेतु माता-पिता के संगत उसके पूर्वजों के गुण समूहों की पहचान प्राप्त होना आवश्यक है |

मानस धर्माचरनगत करतनरत सद करम | 
जीव जगत माझी बसत होत जात सो परम || ११ || 
भावार्थ : - सार यह है कि मनुष्य अंतर्जगत में धर्म आचरण करते हुवे बहिर्जगत में  उत्तम उत्तम कार्य करने में प्रवृत रहे तभी वह जीव-जगत के मध्य निवास करते हुवे सर्वश्रेष्ठ सिद्ध होता चला जाता है अन्यथा उत्तम वस्त्र धारण कर उत्तम भोजन प्राप्त करने व्  उत्तम स्थान में निवास रत होने के पश्चात भी वह पशु ही है |








9 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (10-09-2017) को "चमन का सिंगार करना चाहिए" (चर्चा अंक 2723) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  2. अति उत्तम सादर वंदे क्षेत्रपाल शर्मा 15.09.17

    ReplyDelete
  3. This comment has been removed by the author.

    ReplyDelete
  4. KPIS Pvt. Ltd. is a Jaipur-based company has been established since last 2.5 years. We are a team of enthusiastic programmers, & always ready to accept new challenges, grasping new technologies. We are expert in website & app designing, development and SEO Services in dubai. We have a sound experience in the Artificial Intelligence as well. Our way of working has made us a unique entity in Jaipur.
    https://www.kpis.in/services

    ReplyDelete
  5. आपने वेद का उल्लेख करा है ~~कम से कम वेद , जिसका उच्चारण सदैव ब्रह्मा जी के मुख से होता रहता है, उसको जनसाधारण के लिए एक साधारण भाषा में परिभाषित तो कर देती ...!
    बड़ी कृपा होगी~~`हिन्दू समाज का शोषण कुछ कम होगा !

    ReplyDelete
    Replies
    1. बेद बिधि बिधानतस एक सनातन संविधान |
      नेम नीति निरधार जौ दए जथारथ ग्यान ||
      भावार्थ : - वेद वस्तुत: एक वैधानिक सिद्धांतों का प्रबंधन स्वरूप एक सनातन संविधान है जो नियम व् नीतियों का निर्धारण कर यथार्थ ज्ञान का प्रबोधन करते हैं |

      टिप्पणी : - संविधान मनुष्य के लिए हैं मनुष्य संविधान के लिए नहीं एतएव यह परिवर्तनशील है | किसी संविधान को कोई कितने समय तक मानता है यह देखने वाली बात है.....

      Delete
    2. बेद बिधि बिधानतस एक सनातन संविधान |
      नेम नीति निरधार जौ दए जथारथ ग्यान ||
      भावार्थ : - वेद वस्तुत: वैधानिक सिद्धांतों का प्रबंधन स्वरूप एक सनातन संविधान है जो नियम व् नीतियों का निर्धारण कर यथार्थ ज्ञान का प्रबोधन करते हैं |

      टिप्पणी : - संविधान मनुष्य के लिए हैं मनुष्य संविधान के लिए नहीं एतएव यह परिवर्तनशील है | किसी संविधान को कोई कितने समय तक मानता है यह देखने वाली बात है.....

      Delete
    3. बेद बिधि बिधानतस एक सनातन संविधान |
      नेम नीति निरधार जौ दए जथारथ ग्यान ||
      भावार्थ : - वेद वस्तुत: वैधानिक सिद्धांतों का प्रबंधन स्वरूप एक सनातन संविधान है जो नियम व् नीतियों का निर्धारण कर यथार्थ ज्ञान का प्रबोधन करते हैं |

      टिप्पणी : - संविधान मनुष्य के लिए हैं मनुष्य संविधान के लिए नहीं एतएव यह परिवर्तनशील है | किसी संविधान को कोई कितने समय तक मानता है यह देखने वाली बात है.....

      Delete
    4. बेद बिधि बिधानतस एक सनातन संविधान |
      नेम नीति निरधार जौ दए जथारथ ग्यान ||
      भावार्थ : - वेद वस्तुत: एक वैधानिक सिद्धांतों का प्रबंधन स्वरूप एक सनातन संविधान है जो नियम व् नीतियों का निर्धारण कर यथार्थ ज्ञान का प्रबोधन करते हैं |

      टिप्पणी : - संविधान मनुष्य के लिए हैं मनुष्य संविधान के लिए नहीं एतएव यह परिवर्तनशील है | किसी संविधान को कोई कितने समय तक मानता है यह देखने वाली बात है.....

      Delete