Friday, 19 June 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३५ ॥ -----


मंगलवार, १६ जून २०१५                                                                                             

दिए रघुबर सिय सिर सिंदूरी । भूर भुअन जिमि सस कर कूरी ॥ 
देख निहारिहि देखनहारे । निर्निमेष सुध बुधी बिसारे ॥ 

जेउनार बहु भाँति रचताए । जनक सादर जनेत बुलवाए ॥ 
जथाजोग पद पीढन दीन्हि । बिनै बत बहुँत सुश्रुता कीन्हि ॥ 

परुसनी बान चारि भाँति के । भरि भरि भजन बहुंत जाति के ॥ 
छरस बिंजन बहु रुचिरु रसोई । रस रसमस गन सकै न कोई ॥ 

सिअ सिअबर छब लखि तित छाहीं । मनियारिन मनि मन मन माहीं ॥ 
जसि रघुबर ब्याहु बिधि गाहा । सकल कुँअर तसि करनि बियाहा ॥ 

दयो अमित नाना उपहारे । हंस हिरन हरिमनि सिंगारे ॥ 
कंकन किंकनि नूपुर नौघर । कनक बसन आभूषन बर बर ॥ 

दायो जौतक जनक बहूँती  । दिए दान जिमि सकल भव भूती ॥ 
बहुरन की अब बेला आई । दसरथ सह बधु माँगि बिदाई ॥ 

जनक राज के दिए  दाए  को कर बरनि न जाए । 
छह मास लग अहोरि के, पुनि बरात बहुराए ॥ 

शुक्रवार,१९जून २०१५                                                                                           

भर हरिदै मातु उर लाई । जाट सुता गन चारि सिखाईं ॥ 
चारि अतिथि उर देउ सरूपा । लाखिहि लोचन भर भर भूपा ॥ 

प्रमुदित मानस निछाबरि करिहीं । सिआ पद बारहि बार बहरहीं ॥ 
मंँगै बिदा रघुबर नत सीसा । भ्रात सहित बहु पाएं असीसा ॥ 

कुँअरि  चढ़ाईं पलक पालकी । बहुरि बरात दसरथ लाल की ॥ 
करुनारन बिरहा भइ मेहा । बरसात भीजत सकल बिदेहा ।। 

दरसिहिं मग मग लोग लुगाईं । तासु नयन सुख कही न जाई ॥ 
जग लग सुखकर दिवस पुनीता । पहुँची अबध जनेत लिए सीता ॥ 

पथ जुहारत हारत जब आबत अकनि बरात । 
लगैं  सँवारन  निज सदन पुरजन पुलकित गात  ॥ 

रविवार, 21 जून 2015                                                                                                        

दरसन सिया राम के जोरी | पुरजन लोचन ललक न थोरी || 
सगुन केर सुभ साज सुगंधा | बरसिहि सुर कर सुरभित गंधा || 

सकुचत अच्छत फुर पत  रोरी | लखत तुलसि  मंजरि  कर जोरी || 
सुस्वागत के साज समाजे  | लवन  लाज एक संग बिराजे || 

सँजो सबन्हि कनक मय थारी  | खनकन रत कर धरी द्वारी || 
जोउनि दरस दसा अस होई | मनुज नयन  कहि सके न कोई || 

पुनि गुरुबर अग्या कह पारे | रघुकुल मनि पद पुर  पैसारे || 
राय जोहार किए नर नारी | देखि  दुलहिनि उहार उहारी || 

लोक बेद कहि  बिधि अनुहार | किए दुआर किछु मंगल चारे | 
सुवासिनि रिती रही  न कोई | नेग जोग जस रुचि तस जोईं || 

सोध सुदिन सुभ लगन में कर कंकन दिए छोर | 
होअहि सबहि मन मंगल मोदु बिनोदु न थोर  || 

मुनिबर जब तें राम बिबाही |  भे नित नव मङगल जग माही || 
सघन तोख घन  घर घर बरखे |   घन घनकर सुख संपत करखे || 

एही बिधि किछु सुख दिवस बिहाने | पुनि  दसरथ  के मन महुँ आने || 
रघुबीर जुबराज पद दायउ | सुअवसर गुरहि जाइ सुनायउ || 

श्रवण समीप भए सित केसा | एहि  कृत मोहि करे उपदेसा ||  
राजतिलक के भयउ समाजा   |  भले लगन भल काल  बिराजा || 

सुर की प्रेरि गिरा की आगी | कैकेइ  के बचन जा लागी ||  
कोप भवनन बहु स्वाँग भरे |  दसरथ दिए बर के माँग  करे || 

मूढ़ मंदमति मंथरा, कैकइ की एक चेरि । 
कुबरी कुटिल कुचाल करि, कन खौरी मति फेरि ॥ 

सोमवार, २२ जून २०१५                                                                                            

पठबए भूप भरतु ननिअउरें । भरी कुबेष कोपु गृह पँउरें ॥ 
भरत हुँत जुबराजु पद चहती । दिए दुइ बर देन गई कहती ॥ 

दाएँ भूप भरतहि अभिषेका । कह कटु कटुक माँगए बर एका । 

दूजी माँग राम बनबासा । चौदह बरिस बिसेष उदासा ॥ 

रसन रसन धनु मन सर बानी । लच्छ राउ जिन जियँ नहि जानी ॥
नृप हिअ  राम तिलक अभिलासा  । श्री कांत मुख छाए हतासा ॥ 

भई  भीर  इत राज दुआरी  । राज तिलक के किए तैयारी ॥ 
नयन नयन रय रयन निहारे । चितबहि भोरु चौंक चौबारे ॥ 

उत केकइ बहु बिधि समुझायो । सूखित कंठु सिथिल भए रायो ॥ 
भाई भोर नृप राम बुलाईं । दिए  दुइ बार नृप मातु बताईं ॥ 

हतचेत चितबत सुत पितु रामहि राम पुकारि । 
राम जान निज बनबास सुस्मित बदन निहारि ॥ 

मंगलवार, २३ जून, २०१५                                                                                                    

करुनायन सुकोमल सुभाऊ । कहसि मातु सो सब मन भाऊ ॥ 
सुने अवनिप रामु पग धारे । निरखहिं  कातर पलक उघारे ॥ 

 लागि दुःख पाउ अति लघु बाता । कह अस कहि रघुबर निज ताता 
परे चरन पुनि माँग बिदाई । चले बसन घन बन रघुराई ॥ 

थंभ रहँ जहँ  सुनइ जो कोई । धुरज धूरि जस धीरजु खोई ॥ 
कहहि करक कैकइहि कुबाता । होइहि दुर्बाचस कस माता ॥ 

कौसल्या पहिं गए गोसाईं । देइ असीस उर भर ल्याई ॥ 
जानि नहि नृप केहि अपराधा । देन बास बन एहि दिन साधा ॥ 

बिधाता केरि गति रहि  सदा बाम सब काहु  । 
चारु चन्द्रमा चित्र लिखत  लखत लखत लिखि राहु ॥ 

बुधवार, २४ जून २०१५                                                                                                

सुनि सब चलन चहति सिय साथा । तनु  बिनु जिआ तिआ बिनु नाथा ॥ 
कराल ब्याल काल बन भूरि । कहँ बिष बटि कहँ सजीवन मूरि ॥ 

भय के दुःख सनेह के घेरे । कहै बचन जनि सिय बहुतेरे ॥ 
दीन दसा करि देखि न जाई । कहइ चलहु पुनि बन रघुराई ॥ 

गाहे चरन सासु उर लीन्ही । असीस सहित बहु सिख दीन्ही ॥ 
होउ अचल अहिबात  अभंगे । जब लगि जग जमुना जल गङगे ॥ 

उत लखमनहु चलन कहि पारा । दास दास मैं दास तिहारा ॥ 
मात पितु  गुर पद सेवकाई । तिन्ह सों गरुबर भए रघुराई 

गत जनि पहिं कहि माँगु बिदाई । चलो बेगि सब साज सजाई ॥ 
अपनी साध सिद्ध जब जानी । कैकइ मुनि भाजन लिए आनी ॥ 

बंदत बिप्रबर गुर गहे चरन रघुबर बनबास चले । 
सीस जटा किए बलकल तन  जग तें होत उदास चले ॥ 
बिरहाहु बिरहन रूप भरि कहि चौदह बरसि प्रबास चले । 
रामु बियोग सब लोग भाषि रे भानु कुल के  प्रकास  चले ॥ 

सीस जटाल बलकल तन मुनि के भेसु बनाए । 
राम बनिता बंधु सहित चले बिपिन रघुराए ॥ 

बृहस्पतिवार, २५ जून २०१५                                                                                           

सकल अवध बिरहागन दाहू । का पुरजन अरु का नर नाहू ॥ 
गुरबर बसिष्ट लगे द्वारे । बिरह बदन रअरु  अगन उभारे ॥ 

आरत मुख दुःख सोक बिषादू  । सकल विषादन वादन नादू ॥ 
पुरजन परिजन जिअहि न जाना । भयउ निबिड़ सब भवन मसाना ॥ 

हरिदै हरिदै होए अधीरे । सिआ सहित भए राम बहीरे ॥ 
 लए आयसु रथ बेगि बनाई । गए सुमन्त्र  रहँ जहँ रघुराई ॥ 

रखे सम्मुख बहोरि कर जोही । करि बिनति रथ रामावरोही ॥ 
प्रथम दिवस लगि जन भय साथा । बसत तमसा तीर रघुनाथा ॥ 

सोक  श्रम बस पलक पट झूरे । सोए लोग जब अगजग भूरे ॥ 
छाँड़ चले नहि आन उपाई  । शृंग बेर पुर पद पैठाईं ॥ 

नेकानेक प्रसंग कहि नाथ गंग अन्हाइ । 
सुधि गुँह निषाद भेंट भरि भगवन दरसन धाए ॥ 

शुक्रवार, २६ जून, २०१५                                                                                            

बसि बन कारण नाथ जनाईं । किसलयमय साँथरी रचाईं ॥ 
दोना  भरि जल दिए फल फूले । खाए रुचिर तहँ प्रभु सुत भूले ॥ 

भोर भाई जग जीवन जागे । सुमन्त्र फिरन प्रबोधन लागे ।। 
बिनहि राम सुमनतर बहुराईं।  बहुरि बनिक जिमि तजत कमाई ॥ 

पार गमनु गंगा तट आवा । मँगे नाउ केवटु न अनावा ॥ 
जासु परसत  सिला भै नारी । कहाँ कठिन यह नाउ हमारी ॥ 

पाउँ पखारिहुँ  चहौं न खेवा । कहए गमनु प्रभु देउ ए सेवा ॥ 
पखारि पयस पय सपरिवारा । राम लखन सिअ पार उतारा ॥ 

सकुचि नाथ कछु देवन नाही । सिय पिय कर मनि मुदरी दाहीं ॥
किए गुहार प्रभु पर नहि लेई । फिरत बार लहुँ कहत फिरेई  ॥ 

सिय लखनहि सखा गुह सहि पहुंचे तीरथ राज । 
किए निमज्जन सिउ बंदन जोग रहँ भरद्वाज ॥ 

शनिवार, २७ जून २०१५                                                                                            

गहे चरन प्रभु अवनत सीसा । दिए असीस बहु मुदित मुनीसा ॥ 
भाव भगति आनंद अघाने । माँग बिदा तहँ संग पयाने ॥ 

उतरि तट जमुना जी अन्हाएँ  । सकल लोचन दरसन सुख पाएँ ॥ 
बोधि फिरब प्रभु सखा निषादा । त्रान हीन चलि पाँउ पयादा ॥ 

गाँव निकट चहँ जहँ कहँ  जावैं । दरसन आस नारि  नर धावैं ॥ 
एक चितबन् चितबहि  अनुरागे । एक चितबत चित सँग मह लागे ॥ 

गाँउ न जाने नाउ न जाने । जग मह प्रभु कहँ गए पहचाने ॥ 
छुधा उदर भाँवर रहि काया । सीस धूप धर पदतल छाया ॥ 

गिर गहबरी पंथ पथरारी । तापर साथ सुकुअरी नारी ॥
लखन भ्रात पद प्रेम पियासे । सिया राम से राम सिया से ॥ 

गुंजहि मधुरित मधुप जहँ बन सर सेल सुहाए । 
श्रमित भ्रात सिय सहित प्रभु बालमीकि कुटि आए ॥ 

रविवार, २८ जून २०१५                                                                                                      

धन्य भए मुनि कीन्हि प्रनामा । पाए पहुना रूप श्री रामा ॥ 
जेहि भाँति बन रानी दीन्हि । सबहि कथा तस बरनन कीन्हि ॥ 

मुनिबर बिनीत बचन उचारे । धन्य भाग बन आप पधारे ॥ 
रहौं कहाँ  मैं पूछेउँ मोहि  । तुहरे निबास कहाँ नहि होंहि ॥ 

जिन्हनि हरि तुअ प्रान  पियारे । बसिहु जहाँ अभिलाष तिहारे ॥ 
चित्रकूट गिरि  कामना करहीं । जोहहि अत्रि  कबु हरि  पद धरहीं ।। 

कोलकिरात रचे दुइ साला । चित्रकूट अस बसेउ कृपाला ॥ 
प्रमुदित जल थल गगन बिहारी ।  धन्य मान् बेहड़ बन चारी ।। 

धन्य धन्य चित्रकूट भुइ बेलि बिटप बन जाति । 
परसि चरण राज रघुबरहि धन्य धन्य दिन राति ।। 

सोमवार, २९ जून २०१५                                                                                                 

बन मग पग पग बिधि सोधे । कॉल किरातिहि पंथ प्रबोधे ॥ 
 द्युति दिया सिय पिया प्रसंगा । सासु ससुर भए मुनि तिय संगा ॥ 

सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा । बैठे बटोहि दिवस गवाँवा ॥ 
झांकत रथ हरि दरसन तरसे । पाए हीन भरि लोचन बरसे ॥ 

पूँछहि जन जन पूँछहि रानी । कहहु कहाँ पर उतरु न आनी ॥ 
तरपत पितु निज मान अभागे  । परे धरा पुनि प्रान  त्यागे ॥ 

बिबिध भाँति सब करहि बिलापा । नगरी घर घर सोक ब्यापा ।। 
धावत दूत भारत पहिं आईं । संसइत मन चरन  बहुराई ॥ 

पूछ कुसल तहँ सबहि की अपनी कही बुझाइ  । 
कपट नीर भरि कैकई क्रमबत बोल बताइ ॥ 

मंगलवार, ३० जून २०१५                                                                                                 

सुनत भरत उर दुःख भर भारी । तात  तात चित्कार पुकारी ॥ 
तड़पत जल बिनु मीन जिअन मेँ । भ्रात भवन नहि तात मरन मेँ ॥ 

जान बेनु बन अगन अभागे ।  कलपत कौसल्या हिय लागे ॥ 
बीति  करुनामई जगराती । डाह क्रिया कीन्हि एहि भाँती ॥ 

मरन पूरब भूपति  सँदेसा । बुला भरत मुनि करि उपदेसा ॥ 
राज तिलक जब साज समाजे । चले देन बन रामहि राजे ॥ 

तमसा तट  भए  प्रथम निवासू । गोमती तीर दूसर बासू ॥ 
श्रृंग बेर पर पावनि गंंगा । करे पार लिए सब जन संगा ॥ 

प्रयाग राज सहित प्रभो जहँ जहँ  बस बसाए । 
भाव बिहबल हॉट भारत तहँ तहँ परनत जाएँ ॥ 















































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