Monday, 1 June 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३३ ॥ -----


शनिवार,१६ मई २०१५                                                                                     

एकु साधन उपदेसौ ऐसा । मिटे तासोंहि सबहि कलेसा । 
राम सरिस अरु देउ न कोई । राम सरिस अरु ब्रत नहि होई ॥ 

तासों बढ़के  जोग न दूजा । राम जाग जप रामहि पूजा ॥ 
 राम नाम मुख जो जपधारी । होत  परम पद के अधिकारी ॥ 

तासु नाम जिन हरिदै  आवै । तीन लोक के संपत पावै ॥ 
दीन दुखित जन के दुखनासी । राम नाम एक सुख के रासी ॥ 

जोमन सुमिरत राम ध्याने ।  भजनान्द भगति फल दाने ॥ 
सकल  देउ मैं एक रघु नायक । मनस्कान्त मनोरथ दायक ॥ 

सुरत  राम उर नाम मुख लाए । चण्डालहि परम गति को पाए ॥ 

धाम परायन बेदु बिद, मुनिबर तुहरे सोहि । 
पार गमन भाव परम पद बहोरि काहु न जोहि ॥

रविवार, १७ मई, २०१५                                                                                                    

गूढ़ रहस  एहि प्रगस बखाना । तव सम्मुख मैं निज अनुमाना । 
अजहुँ भए जस तुहरे बिचारा । करिहौ तेसेउ ब्योहारा ॥ 

रघुकुल मैं एक नाम  प्रबेका । तिनके पूजन बिधि जग  ऐका ॥ 
राम देउ एक अबरु  न दूजा  । एकही  ब्रत तिनकी पद पूजा ॥ 

एकही मंतर रघुबर नामा । एकहि धर्म तिनके गुन गामा ॥ 
भजनन जब तुम सब बिधि  बरिहौ । राम नाम  कीर्ति मुख धरिहौ ॥ 

तब तव हुँत भव सिंधु महाना । होही तुहिन गउ खूर समाना ॥ 
अस कह लोमस  मुख उरगावा । बहुरि प्रसन मैं पूछ बुझावा ॥ 

भव तरन जस तुम बरने एकै राम भगवान । 
भगवदीय तिन्हनि मुने  पूजिहि केहि बिधान ॥ 

सोम/मंगल ,१८/१९  मई २०१५                                                                                      

 सुनि  मोर बचन सुबुध सुजाना ।क्रत आपही राम ध्याना ॥ 
प्रभु पद पदुम लीन लय  लायो । बहुरि मोहि सब बात बतायो ॥ 

करे ध्यान साधक एहि भाँति । धरे हरिदै धीरज  बहु  साँति ॥ 
अबध पुरी मन सुरत बिचारेँ । बैठिहि बैठिहि पैठ दुआरे ॥ 

गिर बन कानन जहँ  भरपूरी । परम बिचित्र मंडप रचि रूरी ॥ 
कनक कलस कंकनि खंकारै । संख पुरत मुख राम पुकारे  ॥ 

भीत कलप तरु दरसित होइहि । मँगे जोइ सो सो देवइ सोइहि ॥ 
मूल भाग सिंहासन राजे । तापर श्री रघुनाथ बिराजे ॥ 

ललित लालरी  मनि हरी हरी रसरी के भंबर परे । 
धबल धौरहर बसन सरोबर नीलरत्नांग तरे ॥ 
तीर तीरजोपर रजि रबिकर छबि के हीर घरे । 
कलित कियारी कौसुम कलिबर हरबत पत पत प्रहरे ॥ 

दुइ पुर हाथा चौपद साथा अलिप्रिय आसन बंध्यो । 
सिखर सिरोघर तमस काँड हर सिखाधर मिहिर मण्ड्यो ॥ 
मनसकामद सबहि बिधि सम्पद् सुखद अतिसय सुन्दरम् । 
तापर राजित दसकंधर जित करुणासील रघुवरम् । 

कंबु-कर्पूर-वपुधर धवलम्  दुर्वादलम् सम स्यामलम् ॥ 
शेष-शंकर मुनिवर मनोरम सुरेन्द्र कर वन्दितम् ॥
मनोजवि वदन पूर्णेंद कमन कांत निंदये |
ललाट चित्तचोरकम्  दिव्यार्द्ध चन्द्रये ॥

कुंडलित केश काल शुभाकृत भाल विभूषित लोलिते  ।
मकराकारम् कर्णपूर मौलि मुकुट-अलंकृते ॥
वदन सभा सद दंष्ट्रासित रद वेद वाचस्पतये ।
जपा:कौसुम प्रभासभास काशि कास प्रकाशिते ॥
रसन मृणालय रसालयाधरालि वल्लभ विलासितम् ।
शंखाकृत कंठ कलित  नय निगमागम निवासितम् ॥ 
पर्णावास वर्णानुप्रास सुभाष पाश सुषोभिते  । 
पर्ण पर्ण  वर्णोद्दष्ट कर्ण वर्ण वर्ण सुमंत्रिते ॥

ऊर्जस्वान् ऊर्ध्वमान केसरी भुज शेखरौ ।
कल केयूरौ कटकाङ्कितौ विशाल बाहु धारणौ ॥
उर्मिकाभिर्भूषितौ उषपकर ऊरू लम्बने ।
विस्तीर्ण वक्षो लक्ष्याधिप लक्ष्मीश: शुभ शंसिनौ ।।

श्रीवत्साद्य लक्ष्माद्वमन मनोहरम् शोभाकरम् ।
सुवक्षणावर उदरोपर वलग्न नाभ् विराजितम् ॥
मणि काञ्चनाय मणींद्राय मध्य-स्थली मण्डले ।
सौंदर्य वर्च् वर्द्धनाय् ऊरु सन्धिन् निर्मले ।।
 कोमालाङ्कुशेनाङ्गुले सुलेखायवरेखया ।
ध्येयध्यानिनौ युतान्वित पद प्रतलोति मृदुलया ॥

जय जय जय करुनानिधे रघुबर दीन दयाल ।
जयति जग -वंद्याग्रणी जय जय भगत कृपाल ॥

राम रूप कर्ण अधार राम नाम करतार ।
अस साधन सों होइहउ तुअ भव सागर पार ॥ 

रविवार, २४ मई, २०१५                                                                                                     

प्रभु अस्तुति  रस सरस सुहावा । सीकस मन रसमस सुख पावा  ॥ 
रसातले रोमाबलि ठाढ़ी । पुनर पयस के लालस बाढ़ी ॥ 

कहत  अरण्यक हे मुनिराया । रघुपति कथा कहहु करि दाया ॥ 
सतगुरु  अपने सेबक ताईं  । पूछिहु सो सब कहत बुझाईं ॥ 

मुनिबर जदपि बहु भाँति प्रबोधिहि  । कहौ बहुरि सीस समझ अबोधिहि ॥
जहँ कछु संसउ मन मोरे । करौ कृपा  बिनवउँ कर जोरे ॥ 
सो कारन  मो कहौ बिचारा ।  निर्गुनि ब्रम्ह सगुन बपु धारा ॥ 
राम अवतार होइहि काहू । लघु विरदावलि मोहि बुझाहू ॥ 

कहौ मुने सो चरित अपारा ।बसे बिपिन किमि रावन  मारा ॥ 
रजे रजासन जस सुख सीला ।कहौ मो सहुँ सबहि  सो लीला ॥ 

राम रहस रस अबर अनेका । कहौ सकल अति  बिमलबिबेका ॥ 
जो सेबक आरत अधिकारी । साधु सुजन जन  देइ निबारी ॥ 

जो बचन मैं पूछा नहि राखिहु मुने न गोइ । 
कृपा करत कहिहहु तिन्ह होहि अबरु जो कोई ॥ 

सोमवार,२५ मई २०१५                                                                                        

 जो भगवन भाव भूषन रूपा । हितकर बिमल बिधौ सरूपा ॥
पत्र पुष्प गंध  फल जल चन्दन ।  लेइ तिन करत प्रभु पद वंदन ॥

रसनासन श्री राम विराजे । होइहि सरल सहज सब काजे ॥
भक्ति सिंधु जो नित अवगाहें । तीन लोक के सम्पद लाहैं ॥

जाना परम भगत जब तोही । मोरे मन मानस  रस रोही ॥
हंस नाद किए उठे तरंगे । किए संगत श्री राम  प्रसंगे ॥

 संभु सनक सुक सेष मनीषा । बंदउ जासु चरन बागीसा ॥
सकल जगत आरत  जब जाने  । अवतरत निज कीरति बिताने ॥

जो जग मोहन जो जग दीसा । तपोधन जोगीस के ईसा ॥
सगुन रूप ए हेतु अवतरिहीं । जब मनु तिनकी कीरति करिहीं ॥

यह भव सागर गहन अपारा । श्री राम रूप करणाधारा ॥
होत दुखारत करिए पुकारिहि । करनधार तिन पार उतारिहि ॥ 

सक्ति सरूप दयामयी अल्हादिनि श्री  संग ।
चारि श्री बिग्रह धरे अस, प्रगसे भुइ श्री रंग ॥ 
बृहस्पतिवार, २८ मई २०१५                                                                                                    

हरि गन अगणित अमित अपारा ।कहउँ तदपि निज मति अनुहारा ॥ 
राम जनम के हेतु अनेका । परम बिचित्र सब एक ते ऐका ॥ 

तसु जनम के अगध  कहानी । सावधान सुनु सुबुध सुजानी ॥ 
द्रवउ दसरथ अजिर बिहारी  । राम नाम जग जस बिस्तारी ॥ 

पुरइन  काल त्रेता जुग मही  । दिनकर बंस धारक जन्मही  ॥ 
 जब बपुधारे । मुनिबर मंगल मंत्र उचारे ॥ 

जनम लियो जय जय रघुबीरा कामनई घन स्याम सरीरा ॥ 
मनुज रूप प्रगसे श्री कंता । दरस नयन हरषे सब संता ॥ 

करुना सुख सागर सहित दरस चारि सिसु भ्रात ।
अवध पुर पुरंजनी सन,गद गद भए पितु मात ॥  

सुने  जनम बन कानन कानन । फूर पात भए प्रफूरित नयन ॥ 
चली सरजु बहु सरस सुहावा । चारिहि पुर नुपूर सुर छावा ॥ 

मधुर रुदन जब देइ सुनाईं । बहती कहती जहँ तहँ धाई ॥ 
गफर घर मनहर बाजि बधावा । दिए भूप जो जेहि मन भावा ॥ 

चले बाल हरी पायहि पाया । मयन बदन ओदन लपटाया ॥ 
हरि हरि हरि जब भयउ किसोरा । मनस्कान्त रूप चित चोरा ॥ 

बाहु सिखर धनु कंधर भाथा । रहे सदा लखमन तिन साथा ॥ 
तदनन्तर पितु आयसु दाने । पढ़ें सबहि गुरु गेह पयाने ॥ 

गुरुबर के अनुहार किए ऐसेउ ब्यबसाए  । 
बहोरि अल्पहि काल मैं बिद्यानिधि कहलाए  ॥ 

 शुक्रवार,२९ मई २०१५                                                                                                   

लखन सहित पुनि अंतरजामी । गाधि तान्या के भए अनुगामी ॥ 
असुर हनन मख राखन रायो । दोनउ सुत महर्षि कर दायो ॥ 

स्याम गौर भ्रात अति सुन्दर । जितबारु रहे दुनहु धनुर्धर ॥ 
पीत पट  कटि भाथ कसि लस्यो  । जेहि दरसिहि तेहि मन बस्यो॥ 

निसा घोर घन तम गम्भीरा । चले जात मुनिबर रघुबीरा  ॥ 
बहुरि भयंकर बन भित पेले । तहँ ताड़का राकसी मेले ॥ 

हँस हँस करकस करक हँकारै । बारहि बार बिघन मग डारै ॥ 
प्रभो मुनिबर  के आयसु पाए । मार तेहि परलोक पैठाए ॥ 

लगे मुनि घर हवन करन राम लखन रखबारि । 
धाए मारीच बिघन किए गर्जन कर अति भारि ॥ 

शनिवार,३० मई २०१५                                                                                                 

फरहीन सर ऐसेउ मारा । गिरे  सत जोजन जलधि  पारा ॥ 
सुबाहु निसिचर के लघु भ्राता । चढ़े अगन सर करे अघाता ॥ 

मरे असुर सब निर्भय होईं ।  अजहुँ  मुनिरु न सतावहिं कोई ।| 
आगिल भेँटिहि  गौतम नारी । श्राप बिबस पाहन तन धारी ॥ 

सचिपति संग कीन्हि प्रसंगा । श्रापत् मुनि भए पाहन अंगा ॥ 
रघुबर चरनन जब परसाई । बहुरि जथारथ रूप लहाई ॥ 

दरसत रघुनायक कर जोरी । गई पति लोक नाथ बहोरी ॥ 
जहाँ निवासिहि जनक तनीआ ।चले सोई पुरी रमनीआ ॥ 

किए सांगत मुनि संत समाजे । भँवरत भूपत भवन बिराजे ॥ 
धरे सभा तहँ पंथ निहारे । संभु धनुष निज खंडनहारे ॥ 

 चितबहि चकितहि जनक जिमि,चितबत चंद चकोर । 
पूछत परिचय दीठवत दसरथ राज किसोर ॥ 


































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