Monday, 1 June 2015

----- ॥ उत्तर-काण्ड ३२ ॥ -----

शुक्रवार ०१ मई, २०१५                                                                                                     

दरसै चहुँ दिसि काल सरुपा । उग्र सन अन गन दनुज कुरूपा ॥ 
बिगलित बसन बिगलितहि केसा । बिडालित नयन बदन कलेसा ॥ 
चारों दिशाओं में काल स्वरूप उग्र दंष्ट्र के सह अनगिनत भयंकर दैत्य दिखाई देने लगे । वे सभी चितरित केश लिए नग्न अवस्था में थे उनकी लोचन विडाल के सरिस थे उनका वादन पीड़ा देने वाला था ॥ 

को मुख हीं बिपुल मुख काहू । बिनु पद कर को बिनु पद बाहू ॥ 
बिपुल नयन को नयन बिहीना । रहेउ एकु एकु दरसिहि तीना ॥ 
कोई तो मुख हीन  कोई बहुमुखी था कोई चरण व् हस्त से रहित कोई चरण व् भुजाओं से रहित था ।  कोई नयन  से रहित कोई बहुंत से नयन लिए था,  वे  सभी एक के तीन दिखाई दे रहे थे ॥ 

तेहि समउ रघुबर के बाँकुर । ब्याकुल मनस  भयउ भयातुर ॥ 
छल छादन ऐसेउ भयाने । भरमत एकु सों एकु भय माने ॥ 
उस समय रघुवीर के रन बांकुर व्याकुल मनस से भयभीत हो उठे । चाल के आच्छादन ने ऐसा भय व्युत्पन्न किया कि भ्रमवश वे एक दूसरे को ही शत्रु मान परस्पर शत्रुता कर बैठते ॥ 

 बरषि धूरि कीन्हेसि अँधियारा ।सूझ न आपन  हाथ पसारा ॥ 
भट लोचन माया अस देखे । सब कर मरण बना एहि  लेखे ॥ 

समुझत भा उत्पात महाने । दीठ पीठ सब निज हित जाने ॥  
मुठिका मैं रथ रस्मी धारे । सत्रुहन जी तब आन पधारे ॥ 
यह संज्ञान करते हुवे कि कोई भयंकर उत्पात हुवा है दृष्ट पृष्ठ में ही सबने अपना हित जाना । तभी मुष्टिका में  रथ की रश्मी कसे  शत्रुध्न का आगमन हुवा ॥ 

प्रथम नाउ भगवान, प्रनत नयन सुमिरन करे । 
धनुर बन संधान, पुनि रन भू निरखत चरे ॥ 

सर्वप्रथम उन्होंने  प्रणमित नयन से भगवान श्रीराम का स्मरण किया  । तत्पश्चात  धनुष में बाण का संधान करते हुवे समस्त रण भूमि का निरिक्षण करते चले ॥ 

अमित तेज बर बिक्रम सँजोऊ । तिन तूल तेजस्बी न  कोऊ ।| 
कराल रूप राकसी माया ।  भवबत काँपत अनि अतिकाया  ॥ 

सत्रुहन  मोहनास्त्र चलाईं । महाभिमानि गई बिनसाई ॥ 
करक नयन पुनि गगन निहारे । लखत  असुर सर गन बौछारें ।| 

चरत चमक ऐसेउ चकासे । प्रभा हीन सब दिसा प्रभासे ॥ 
नभस केतन तमस लिए घेरी । हक्कारत हत हेर निबेरी ॥ 

हीर मणि मुख हिरनई  पाँखी ।लाकहि बन जन पर लाखीं ॥ 
काल सरप जनु चले सपच्छा । भीतर थित राकस कर लच्छा ॥ 

लगत जान पख काटि निबारे । किए खान खंडित महि महु डारे ॥ 
छितरित जान बिलोकत कैसे । पच्छ हीन मंदर गिर जैसे । 

बिमान नसेउ जान तब राकस भयउ रिसान । 
सत्रुहनिहि भाव प्रतिरूप  करे बान संधान ॥ 

शनिवार ०२ मई २०१५                                                                                           

कालरूप धर गहि कर राका । रहे बिकट सम सलक सलाका ॥
भरे मुठी धनु  गन अस राखिहि । सीध बँधे रामानुज लाखिहि ॥

भर बहु घमन गरज किए ऐसे । कल गहन घन गरजत जैसे ॥
सत्रुहन भुजहु बहुल बल जोगे । बाजजु बाजबास्त्र  प्रजोगे ॥
वाजयु = शक्तिशाली

द्युतिगति गत बियत ब्यापे । दनुज कटक  तन थर थर कांपे ॥
प्रपत तमकत तीख जब ताका ।  जहँ तहँ भागि चले सब राका ॥

सन्मुख होइ न सके ते अवसर । धावै सरपट चरन सीस धर ॥
लगे गात आजुध बिकराला । खात अघात  भूत बेताला ॥


नयन नासिका मुख करन सीस केस बिथुराए ।
वियतगत पतत बाय सम निपतत देइ दिखाए ॥ 


रविवार ०३ मई २०१५                                                                                                  

बिलोकत अजुध बिकट कराला । दुर्बादत सो दनुज ब्याला ॥
 पासुपत नाउ अस्त्र प्रजोगे । धनु  मुख  जीवा जोग बिजोगे ॥

नभ चढ़ि बरखि बिपुल अँगारी । रघुबर बीर बिधुंसन कारी ॥
चपर चरत  चहुँ कोत ब्यापे  । ताप दहत दिग कुंजर कांपे ॥

सत्रुहन तेहि ब्यापत लेखे ।निज दिग कुंजर काँपत देखे ॥
धार सत्र एक नाउ नरायन । छाँड़त तुरवत करे निवारन ॥

जारन जवान अगन कण जोई । सकल अजुध छन सीतल होई ॥
भयउ गगन अस बाण बिलीना । होत बिलीन मीर जस मीना ॥

भरे बदन अति रोष बिद्युन्माली निरख एहि ।
एकु त्रिसूल  कर कोष,हतन सत्रुहन ठान धरे ॥ 

मंगलवार, ०५ मई २०१५                                                                                                  

धरे हाथ एकु सूल बिसेखे । निसिचर जब नियरावत देखे ।|
लिए एक सर अध चंदू अकारे । काटि सूल सत्रुहन महि डारे ॥

कुण्डल कलित कल कारन सहिता । हरि कीर्तन सन श्रवन रहिता ॥
हरि दरसन बिनु लोचन संगे । देहि साथ किए सीस  विभंगे ।|

 देखि भ्रात अस भंजित गीवाँ । बढ़े करत उग्र छोभ अतीवा ॥
गरज घोर कर यहु कहि आवा । अस बांकुर मैं बहुंत खिलावा ॥

कास  धमूका धमक जब  धाए  । सत्रुहन खुरधारि बान चलाए ।।
लागिहि कंठ उरे नभ माथा । परे भुइ तन चरन  कर साथा ॥

बिलगित सिरु के साथ  दोउ देहि महि पर परे । 
राकस भयउ अनाथ दोनउ दल पत के मरे ॥ 

बुधवार, ०६ मई २०१५                                                                                        

 आए सम्मुख सबहि  जुग हाथा | डरपत धरि सत्रुहन पद माथा ॥
तासु बड़ेपन  बोले नहि नहि । कह अस पाँमर अरु अति डरपहि ॥

बाहु बली कहँ तुहरे नाईं । हत मति हमरे पति चढ़ि आईं ॥
भरे घमन सिरु मति नहि आहू  । करुना करत हमहि छम दाहू ॥

सरनारपक  पर कृपा कीजो  । अभय दान प्रस्तर कर दीजो ॥
अस दनुज हय किरन कर लीन्हि । सादर चरन समर्पन कीन्हि ॥

श्रुतत दनुज के करून पुकारी । सत्रुहन के हरिदै भय भारी ॥
करुनाकर रघुबर के नाईं । रामानुज सबहि छमा  दाईं ॥ 


मधुर मनोहर जय निनाद कर बिजित कलस अलंकृते ।
सबहि सेन दल बल बल मर्दल हनत कुनिका झंकृते ॥
 
मंद ताल  दय रे रतिमय मंजुल मजीर मुरज उठे । 
चहुँपुर श्रुतिसुख  भट मयूख मुख संख सुर भर बज उठे ।। 



सर चाप कर सूल भिटक बर बीर बपुर्धर सोहहीं ।
घन अलक अछादन तड़ित नयन बदन छबि मन मोहहीं ॥ 
पीत परिकर उपबीत कटि पर रन आभूषन सज उठे । 
लसत लहलहत सुबरन  रजत नभ रंजत रज रज उठे ॥ 

अह नय रवनय सब बीर बलय सुरमय जय घोष करे ।
 है गज राजे पादुक छाजे साजे चातुरंग रे ॥
 अगज जगज लग घन घन सम गरज उठे   
सहस किरन  निन्दत गरुअत गज गामिन के ध्वज उठे । 

हरि हरि मुँगिया मनहरि मुतिया भरि कीर्ति श्री राम की । 
गूंथ गहरी सब कंठ घरी सुर माला सुख धाम की ॥ 
दुर्जय दनु प्रमय होत अभय अरुनोदय सूरज उठे ।
प्रसन्नचित पयासय लीन लय पल्लबित पंकज उठे ॥


किसलय कौसुम कर भरे, चढ़े  जान सुर  जूथ ।
गह गह धरापर बरखिहि हरसिहि बीर बरूथ ॥ 

अतिसुरभित सुख बास सों  ओतप्रोत चहुँ कोत । 
कटक पल्लबाधार भए पल्लब पल्लब होत ॥ 
पल्लवाधार = शाखा 

बृहस्पति / शुक्र , ०७ /०८ मई २०१५                                                                                   

अपहर्ता दनुज तैँ हय जब पाए । पुष्कल सहित सत्रुहन हरषाए ॥ 
दुर्जय बिद्युन्माली मारे । परम प्रबल दानउ दल हारे ।। 

रामानुज सैम बीर न होई । जय जय रघुबर कहँ सब कोई ॥ 
यह समाचार बहु सुख दयऊ । सबहि मुनि निर्भय होइ गयऊ ।।

चले सत्रुहन सैन सह आगे । चलेउ भूपत रथ सन  लागे ॥
बहोरि जवन किरन  जब छाँड़े ।  उदकत पद उत्तरु दिसि बाढ़े ॥

मुकुट किरन  भए हर्श अपारा । चपर चरण चहुँ कोत  बिहारा ।
रहि रन भूषन जासु अधीना । रहे सबहि सो बीर प्रबीना ॥

सब पथ सजयो जब रथ रजयो गहे करष कर सारथी । 
लपटत परन चरनन्हि परयो रजत रजतंत रथी ॥ 
 वियद गत  भामरत आयो तहाँ 
क़हत अहि पत नर्बदा नद निरापद  बह आई जहाँ ।

कंकन जलके पदुम पत तल के तरंगित माल पुरयो  । 
हरिअर चलके सुर कल कल के कानन्हि कलित करयो ॥
भई बसतिमय बसि अतिसय रिसि महरिसि के समाज से ।
नील रतन रस दए अस दरस जलाजल के ब्याज से ॥

चहु कोत ब्याकुल कंठ पयस दरस के आस ।
पयसिनी सहुँ होत प्रगस  दय पय हरे प्यास ॥

चितबत चित्र सब  नयन उरेहे  । एकु पुरनइ कुटि दरसन देहे ॥ 
रहे पलासित परनाधारे ।उहरित लोचन  परन  उहारे ॥ 

सरन सरन सरसिज सरसौंहे । सरस मयूखि सरिन्मुख मोहैं ॥ 
सींकत जल सीकर जब परसे । हलबाट तपरत पत पत हरसे ॥ 

चातुर भद्रक परम ग्यानी । सत्रुहन दरस नील रस पानी ॥ 
जिग्या  ने पय  प्यास जगाए । नय कुसलय सुमति समुख जताए ॥ 

महानुभाव बिलोकत जोई । परन गह सो  केहि के होई ॥ 
सुमति कहए जो तट दरसायो । तहँ एकु मुनिबर ओक बसायो ।।

जप तप संजम  नेम रत सो सेअहिं परलोक । 
प्रभु पदानुरत जग बिरत, भूर सबहि सुख सोक ।। 

शनिवार, ०९ मई २०१५                                                                                          

बिरति बिबेक बिनय बिग्याना ।बोध जथारथ बेद  पुराना ॥ 
तापर मन मद मान न कोऊ । तेहि सम ग्यानद एकु दोऊ ॥ 

जे जी जो को पाप जनावा । तिनके दरस धुअत  दूरावा ॥ 
मुनि के अरण्यक सुभ नाऊ ।  तीरथ ए तासु तपस प्रभाऊ ॥

जे चितबन् दरपन मलियानी। मुनिबर के छबि मलिन  नसानी ।|
एहि हुँत प्रथम चरन सिरु नाहू । निज संसय तिन ताहि बुझाहू ।|

सोए मुनिस्वर रघुबर ही के । तुहरै सम अनुचर सिय पी के  ॥
कमल नयन के पदारबिंदा ।रसिक 
रूप रसत  मकरन्दा ॥

बौमित बपुरधर बन घर किए अस  तप घन  घोर । 
रयनि के रोर न जाने भोर न जाने भोर ॥


सोमवार, ११ मई,२०१५                                                                                                                    

सुमति रसन बर बरन सुहाने| धर्म जुगत एही बचन बखाने ॥
बहोरि सत्रुहन पालक न होरे । करे संग में  अनुचर थोरे ॥

बिनीत भाव उर नयन निहोरे । चले पयादहि दुहु कर जोरे ॥
सकल जन  प्रबिसत  तपो धामा । बिनत नयन तिन करे प्रनामा ॥

रघुबर अनि निज सम्मुख पाईं । मुनि हतप्रभ मुख पूछ बुझाईं ॥
भयऊ कहाँ सँजोग तिहारे । कहौ इहाँ  कैसेउ पधारे ॥ 

मुनिबर  नयन प्रसन जब देखे ।  भरे मुख बचन  भाउ बिसेखे ॥ 
बागबिदग्ध सुमति नत सीसा । होत बिनय बत कहे  मुनीसा ।। 

अधुना सकलित जोउ सब प्रभु मख बीड उठाए । 
हय  रच्छनरत यहां हम आपनि दरसन आए ॥ 
इस समय भगवान श्रीराम चन्द्र जी ने अश्वमेधीय यज्ञ के अनुष्ठान का संकल्प लिया है । एतेव त्यागे गए मेधीय अश्व की रक्षा करते हम यहाँ आपके दर्शन हेतु उपस्थित हुवे हैं ॥

बुधवार, १३ मई,२०१५                                                                                            

सकल बिबिधसुभ  साज सँजोई । स मख करि किछु लाह न होई ॥ 
अस सत्कृत अल्पहि पुन दावैं ।  करता छनु भंगुर फल पावैं ॥ 

रमानाथ रघुबीर हमारे । वैभव पद के देवनहारे ।। 
तिन्ह तजत अन्यानै पूजे । ता समतूल मूरख न दूजे ॥ 

एकु रघुबर के सुमिरन सोही  । परबत पाप  राइ सैम होंही ॥ 
जो भगवन के चरन  त्यागे ।  जागादि प्रपंच माहि लागे ॥ 

जे ब्रत बिरथा धरत कलेसा । प्रभु अद्वैत अगुन हृदयेसा ॥ 
सकाम  पुरुख हो कि निहकामा । चिंतहि चितहि सदा श्री रामा ॥ 

सीस चरन धरि  मन नुरति मुख प्रभु नाउ  धराए । 
हरिदै बसति बसाए के  सकल पाप दूराए ॥ 

 बृहस्पतिवार, १४ मई, २०१५                                                                                          
एकु समय मैं ग्यान  पिपासू । महा तत्त्व पयस अभिलासू  ।। 
तीरथ तीरथ डेरा डेरा । सद ग्यानदा भरमत हेरा । 

ते अवसर पुनि मोहि एकु दिवस । मुनिबर लोमस मिलिहि भागबस ।। 
 तीरथ सेवन हेतु मुनिराए । सुरग लोक तर भँवर तहँ आए ।। 

तासु चरन मैं करत प्रनामा । परच देत कहेउँ निज नामा ॥ 
रहे आसु मोरे मन माहीं । पूछा तिन तैं कह गोसाईं ॥ 

यह अद्भुद मनस तन धारे । होइहि कस भव सागर पारे ॥ 
मन मानस यहु जगी पिपासा । ग्यान पायस तुहरे पासा ॥ 

तुम उदक बाह मैं उद बाही ।तुम ग्यानदा अरु मैं गाही ॥ 
मोरे कहे बचन दए काना । बहोरि बोले मुनि  बिद्बाना ॥ 

मोर कहि बत भाव सहित सुनिहौ धरे ध्यान । 
जोग  जाग जम ब्रत नियम,अरु एक साधन दान ।। 

शुक्रवार, १५ मई, २०१५                                                                                    

पार गण भव साधन नाना  । मैं संछेप सरूप बखाना ॥ 
साधन साधकता जो जाने । चढ़त जान सो सुरग पयाने ॥ 

एकु अबरु रहस्य जानत अहिहउँ ।तुहरे सम्मुख प्रगसत कहिहउँ ॥ 
सबहि पाप जो देइ  नसावै  । भव सिंधु सो पार लए जावै । 

भगवन पद रति भगति न जानिहु  । तिन्हनि ते उपदेस न दानिहु ॥ 
दंभि सदा मद मूरख लोगे  । कहु त कहँ उपदेस के जोगे ।। 

करे जो भगति संग द्वेसा । अस  साटक हुँत नहि उपदेसा ॥ 
तन पट सुचित कपट  मन माही । तिन्ह सहुँ  ए उपदेओ नाही ॥ 

चारारि के वसति रहित बेस जोइ उर साँति ।
अस भगत एहि  गूढ़ रहस बरन कहौ सब भाँति ।।

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