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Monday, 26 August 2013

-----॥सुठि-सोरठे ॥ -----

कंकनि करधन धारि, मूर्धन धर मोर पाख /
बृंदा बन रास बिहारि, मोहित कर चितबन हरे ।। 

सुधाधर बदन धार, लावन लोचन लाह लाख /
सत सुर साध सँवार, कान्हा कर वेनु वरे //

घन घर घाघर घार, फल्गुनि हरिद हरी द्राख । 
उरमन उरस उहार, चुनर रंग तरंग तरे //

नयनन पलकन पार, भाल भ्रुकुटी बर बैसाख /
धनु धर सर सर सार, गिरिधर के हरिदे घरे ॥ 

स्याम मनि सर कार, पट पीतम पटल पराख । 
भूषन कर सिंगार, भूरि भूयस भेष भरे ॥  

रुर सुर करनन सार, एक भुज बल कंधन राख । 
एक भुज कंठन घार, राधिका संग हनु धरे  //

सुध बुध सकल बिसार, रोचित योगित सह साखि /
पद सथ संगति धार, रयनत छम छम नृत्य करे //

Monday, 15 July 2013

----- ॥ श्रृंगार-सोरठा॥ -----

चँवर   चुनरिया   लाल,  घर   घेर      घघरिया     घाल । 
धनब  दुअरिया  ढाल, बरखा  छम   छम   नृत्य  करि ।१ /

लौवन     यौवन   योग , तरसत  दृग   दरसत   लोग । 
रस   सिंगार   बियोग , थाई   रति   रस   भाउ   भरि ।२। 
                                  बरखा छम छम ..... 

पोइ    पदुम     पद    पोर,  नीर    नूपुर    पूर   नोर । 
कल चंचल चित चोर,थिरकत तिलकत धरनि तरि।३।  
                                 बरखा छम छम .....

घनकारे   घन   कोर, घन  काल   घटा    घन  घोर, 
घनक  दुंदुभी  ढोर, घनक घनक घन  धवनि धरि ।४।
                                 बरखा छम छम .....

धारा   बाहिक   धार, सत   सुर  सर  सागर सार । 
तरनि तरंगित तार, रय  लयधी गत बाँधि लरि ।५ /
                                 बरखा छम छम ..... 

Sunday, 23 June 2013

-----॥ सोरण सोरठे ॥ -----

कंठ कटि कनक केर  एक नारंगी सी नार ।
उद बहनु उदक हेर सिर बिंदु उदकाति चली ।१।



सर सौं हैं सरसाए सरसई  सर सिरु धराए । 
हरिद बरन अलकाए सुम सुरभि गंधाति चली ।२। 

कंज कलस कर भाल कूल कालिंदी निकार ।
नागिन से कलि काल अलकबलि लहलाति चली |३।

करी बँध रचित कार  सिर सुर सारंगी सार ।
गनपति भूषन धार किरनों को लजाति चली ।४।

धूरि पथ पदुम पाँव धुरिका भइ पलक पधार । 
बैसी हरि पत छाँव पुनि नैन मलियाति चली ।५। 

दिवा किरन के छाप असित लोहित लहरिदार । 
चाँद मुख चुनर ढाँप घर घघरन घुमाति चली ।६।  

फरे बिटप बट छोर, डारि झुकै लइ फर तोर । 
भरी जमुनिया झोर रसन रस लिपटाति चली ।७। 

कलित कल कंठ फाग रसन नील रंजन राग । 
रसिके रस मस लाग पिया के गुनगाति चली  । ८ । 

धवल धूरि धर पाँव पँवर परे पीपर छाँव । 
पहुँच पिया के गाँव  पुर पुरन खनकाति चली । ९ । 

भावार्थ : --
स्वर्ण आभूषण से सुसज्जित एक नारंगी रंग की नारी जलपात्र में
जल पात्र लिए जल ढूँडती, सिर ऊपर से स्वेद बूंदों को बिखराती हुई चल
रही है ।1।
अर्थात : -- "सुन्दरता तो सर्वत्र व्याप्त है, केवल दृष्टिकोण होना चाहिए"

हरीभरी सरसों है जिनकी सुन्दर माला सिर पर धारण कर, बालो में पीतम
राग भरे फूलों से सगुन्धित होकर चल पड़ी । 2 ।

यमुना के किनारे से अमृत कलश को  भर कर शीश पर धरे ।
काली नागिन के जैसे बालों की लटों को लहराती हुई चल रही है ।3।


जब बालों को बाँध कर सँवारा तो शीश पर बूंदों का राग बिखर गया । किरणों
सिंदूर( गणेश भूषण=सिंदूर) को आधार करे किरणों को भी वशीभूत करती हुई
चल रही है । 4  ।

धूल भरे पथ पर कमल जैसे पाँव हैं और धूलिका पलकों पर विराज गई ।
हर पत्तो की छाँव में थोड़ी देर बैठ कर पुन: आँखों को मलती हुई चल रही है ।5 ।


सूर्य मुखी छपा हुवा बैंगनी बेल बूटों वाली चुनरी से मुख ढांक  कर 
घाघरे को घुमाती घर की ओर चल पड़ी । 6  ।  

मार्ग के किनारे फलदार वृक्ष हैं, डाली झुकाई और फल तोड़ लिए ॥ 
भरी झोली के जामुन फल का स्वाद लेती चल पड़ी ।7। 

मधुर सुर-स्वर में फाल्गुनी गीत सजा कर जिव्हा को राग नील से रँगकर । 
 रसिकपन में आनंदित हॊकर पिया के गुण गाती चली  । ८ । 

उज्जवल रज से लिपटे चरण हैं और द्वार से हटकर पीपल की छाँव है । 
 पीया के गाँव पहुँच कर घर के अन्दर बिछिया खनकाती हुई चली ।९।  
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फिर किरण पाँव धरे निरख रही मुकुर मुख धो ।
निर्झरी नीर झरे  नाद कर नुपूर चमके ॥

फिर ग्रहे पट गहरे दमके रूप लावण लौ ।
पद कमल कर सँवरे भर मणि माणिक मनके ॥

फिर दिनकर दिन करे जाग उठा रात भर सो ।
कर वन्दन पद वरे जल ढलके अमृत बनके ॥

रमण किरण बाहु भरे लाज धरे नयन नत हो ॥
रथ रयनि कण उतरे पुष्प पत्र पर सुर झनके ॥

शंख करे रव हरे जयति जय राधेमाधौ ।
कलश कलश जल भरे खन खन खंखणा खनके ॥

फिर सर सजदा दरे मस्जिद में अल्लाह हो ।
गिरजा घर गुंजरे फुली शफ़क सबद सुनके ॥