Monday, 11 March 2013

-----।। दांपत्य सम्बन्ध - एक दृष्टिकोण ।। -----


स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारत में नव निर्मित संविधान लागू हुवा, संविधान में निहित
अधिनियम के उपबंधों में 'एकल विवाह पद्धति' का विधान किया गया..,


'एकल विवाह पद्धति' का अर्थ है अपने सम्पूर्ण जीवन काल में विवाह के पश्चात, एक स्त्री
एक ही पुरुष से एवं एक  पुरुष  एक  ही स्त्री  से शारीरिक सम्बन्ध स्थापित कर सकता है
केवल मृत्यु की दशा में ही अथवा सम्बन्ध-विच्छेद हो जाने पर ही वह स्त्री अथवा पुरुष
अन्य पुरुष अथवा स्त्री से (एक से अधिक नहीं)सम्बन्ध स्थापित कर सकता है..,


'एकल विवाह पद्धति' को अपनाने के बहुंत से कारणों में प्रमुख कारण यह था यह पद्धति
सामाजिक व्यभिचारिता पर अंकुश लगाने के साथ ही जनसंख्या पर नियंत्रण करने  की
सिद्ध साधन थी..,

विवाह, वास्तव में यौवन अवस्था को प्राप्त एक युवक एवं युवती को; परिवार, समाज एवं
उस राष्ट्र जहां के वह नागरिक है के द्वारा स्थापित संविधान के अतर्गत परस्पर शारीरिक
संबंध स्थापित करने का अनुज्ञान(अनुमति) है..,

इस कामना के सह कि यह सम्बन्ध चिर स्थायी रहे वैवाह्यित युगल, स्वधर्म शास्त्र में
निहित विचारों का अनुसरण एवं सामाजिक संस्कारों व प्रथाओं को अंगीकृत करते हुवे
दाम्पत्य सूत्र में आबद्ध होने हेतु प्रस्तुत होते हैं..,

विवाहित दंपत्ती के परस्पर शारीरिक सम्बन्ध से चूँकि उत्पादन संभव है अत: यह एक उत्पाद
इकाई होते हुवे 'पारिवारिक इकाई' की संज्ञा धारण किये हुवे है..,

विवाह से अन्यथा एक स्त्री-परुष द्वारा स्थापित शारीरिक सम्बन्ध से भी उत्पादन की संभावना
है अत: यह भी एक उत्पादन इकाई ही है किन्तु है संज्ञाहीन । अत: इसे 'भागीदार इकाई' कह
सकते हैं..,

यदि कहीं उत्पादन हो रहा है तो लागत भी अवश्य ही होगी जिसके सह अधिकार एवं दायित्व
भी होंगे..,

पारिवारिक इकाई भी चूँकि एक भागीदार या साझा इकाई है अत: भागीदारों के सम्बन्ध- विच्छेद
की दशा में उत्पाद की गुणवत्ता एवं उसके स्वरूप को यथावत रखने हेतु संविधान वेधानिक आचरण
का पालन करते हुवे विधि सम्मत होकर उत्पाद से सम्बद्ध अधिकारों एवं दायित्वों का निर्धारण कर
सम्बन्ध- विच्छेद का देता है..,

अब यदि विवाह से अन्यथा स्थापित परस्पर शारीरिक सम्बन्ध द्वारा सृजित 'भागीदारी इकाई' के
भागीदारों प्रथमत: क्या वह अवयस्क हो सकते हैं द्वितीय इस इकाई के द्वारा जनित उत्पाद से
सम्बद्ध अधिकारों एवं दायित्वों का निर्धारण किस प्रकार से होगा..,

यदि विवाह परिवार, समाज एवं राष्ट्र के संविधान द्वारा एक युवक एवं युवती को परस्पर
शारीरिक सम्बन्ध स्थापित करने हेतु दिया गया अनुज्ञान ( अनुमति) है तो फिर विवाह
से अन्यथा स्थापित ऐसे शारीरिक संबंधों का क्या औचित्य है?? और क्या उद्धेश्य है ??

यह हो सकता है की किसी स्त्री अथवा पुरुष को विवाह जैसी संस्था पर विश्वास न हो
ऐसी  अवस्था  में  शारीरिक  सम्बन्ध  स्थापित  करने की अनुज्ञा तो दी जा सकती है
किन्तु  एक  से  अधिक  स्त्री  अथवा  पुरुष  से  नहीं । अर्थात  ऐसे किसी सम्बन्ध को
वैधानिक मान्यता तभी दी जानी चाहिए जबकि ऐसे सम्बन्ध के स्थापक भी उन सभी
विधि- विधानों का पालन करें जो कि संविधान ने एक विवाहित दम्पत्ति हेतु निर्धारित
किये हैं अन्यथा ऐसे संबध, वैवाहिक अधिनियमों की प्रासंगिकता समाप्त कर बहुंत सी
वेधानिक विषमताओं को जन्म देंगें.....


6 comments:

  1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  2. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

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  3. आधुनिक सन्दर्भ में विचारनीय विषय है !
    latest postअहम् का गुलाम (भाग तीन )
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  4. बहुत सुंदर भावनायें और शब्द भी.बेह्तरीन अभिव्यक्ति !शुभकामनायें.

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