Friday, 1 March 2013

----- ॥ कण-कण में भगवान ॥ -----


जड़ व चेतन के संगठित स्वरूप का ही गुणधर्म धरा करते हुवे
सगुण अर्थात दृश्यमान होते  है, विघटन के पश्चात वह निर्गुण
अर्थात अदृश्य हो जाता है.....

" जीव, निर्जीव का संघटक है..,
  निर्जीव, जीव  का विघटक है.."



वेदानुसार : --
जीवन की संरचना  पंचतत्व के संयोजन से हुई है
" पृथ्वी + अग्नि + जल + वायु + आकाश (अर्थात शुन्य ) = देह..,


पञ्च तत्वों में  तीन तत्व दृश्यमान है वे है : -- पृथ्वी, अग्नि एवं जल
दो तत्व अदृश्य हैं वे है : -- वायु एवं आकाश

अदृश्य वायु से दृश्य जल की रचना हुई : -- H2O = जल
इसी प्रकार आकाश जो अदृश्य है उससे पिंड अथवा कण की रचना हुई
कैसे = ??

कण एवं जल से अग्नि की रचा हुई
H2O + कण = अग्नि ( ऊर्जा)

अदृश्य अर्थात वायु एवं आकाश को देखना असंभव है इनकी केवल गणना ही की जा सकती है

हमने वायु की गणना की वायु में आक्सीजन + हाइड्रोजन + नाइट्रोजन आदि गैसे हैं
आकाश की गणना क्या है =??

कोई भी कण चाहे वह कितना भी सूक्ष्म क्यों न हो यदि दृश्यमान है कण कहलाएगा आकाश या
वायु नहीं

अंनत अर्थात अदृश्य आकाश ही ईश्वर है दृश्यमान अनीश्वर
किसी भी कण को ईश्वरीय कण नहीं कहा जा सकता क्योंकि कण सदैव दृश्यमान होते हैं
अदृश्य से सदृश्य तत्पश्चात सदृश्य से ही जीवन की रचना हुई

यदि जल + कण के संयोजन से अग्नि उत्पन्न हो तो संभवत: सूर्य में सौ प्रतिशत जल है
जो विशेष घूर्णन अवस्था के कारण ऊर्जा उत्पन कर रहा है पृथ्वी भी एक वृहत कण है जो
लगभग ७०% जल से आच्छादित है कि घूर्णन गति कदाचित संतुलित है जिसके कारण
 ऊर्जा का उत्पादन भी संतुलित है.....  
 












3 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (02-03-2013) के चर्चा मंच 1172 पर भी होगी. सूचनार्थ

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  2. वैज्ञानिक दृष्टिकोण से ब्रह्माण्ड के सृजन का आकलन एक सुंदर प्रयास है और नेहा इसके लिये तुम बधाई की पात्र हो.

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