Saturday, 20 July 2013

----- ॥ उत्तर- काण्ड 8॥ -----

पाहन कनी कि लोचन जोटे । झलक देत ना पलक पपोटे ॥ 
राजभवन कि सोक कुठियारा । पल पल गहनइ दुःख अँधियारा ॥ 
 जिनकी पलकें दर्शित ही नहीं हो रही यह दो लोचन हैं कि पाहन के दो कणिश है ॥ यह राजभवन है की शोक का सदन है ।  जहां  दुःख का अन्धेरा प्रतिपल गहराता जा रहा है ॥ 

अधर सुधा मुख सुधा अधारे । तिलछ धरा धनबन घन घारे ॥ 
जगत पियारी सिया पियारा । दसानन जिता जन सन हारा ॥ 
यह अमृत रस युक्त अधर हैं कि व्याकुल भूमि खंड है । यह वादन सुधा का आधार स्वरुप है कि किसी गगन न घन गहरा रखे हैं ॥ यह वाही जगत की प्यारी सीता क प्यारे श्री राम है ? जो दशानन को तो जीत गए किन्तु संसार से हार गए ॥ 

निलय भवन कि देबल रचाई । प्रान समा कि देइ बिठाई ॥ 
प्रभु मुख बचन कि कुलिस कठोरे । गिरे सीस गरजत घन घोरे ॥ 
उनका ह्रदय भवन हैं कि कोई देवालय रचाया है वहाँ प्राणसमा समाई हैं कि कोई देवी प्रतिष्ठित हैं ॥ प्रभु के श्री मुख के त्याग के ये वचन हैं कि कोई कठोर वज्र हैं । जो गहरी गरजना कर शीर्षोपर गिर रहे हैं ॥ 

बास बसतिहि कि दनुपत लंका । कलुखित काजर काल कलंका ॥ 
त्रासिन रैन रजक के निंदा । दारुनी दुःख द्वार अलिंदा ॥ 
यह दनुपति रावण की लंका की वास-वसति है कि काजर जैसी काली कलंक की कलुषता है ॥ यह रजक की निदा वाली भयदायक रयनी है । अथवा किसी निर्दयी दुःख के द्वार की प्रवेश स्थली है ॥ 

कातरि कासि  कर लखमन, प्रभो चरन लपटाए । 
अडिग बिटप कसकन बलइ, को बेलरि बलियाए ।  
कष्ट से व्याकुल होकर प्रभु के श्री चरणों से बल पूर्वक  लिपटे यह भ्राता लक्ष्मण हैं अथवा किसी दृढ विटप से दृढ़ता पूर्वक कोई वल्लरी वलयित है ॥ ( भगवान शेष ने कहा ) 

मंग/बुध १८/१९ मार्च २०१४                                                                                 

रे लखमन गवनउ तुर जाऊ । भासित भरु मुख भीनिन भाऊ ॥
हत भागिनि बन महुँ सुख पाही । न त बिगरहि  जिउन देहि नाही ॥ 
भावों से भीग कर फिर जगत-स्वामी के मुख से निकला । हे लक्ष्मण जाओ जाओ शीघ्रता करो । वह दुर्भागिनी वन मन ही सुख पाएगी । अन्यथा यहाँ तो उसे यह निंदा जीवित नहीं रहने देगी ॥ 

कहत कहत  कंठन अवरोधीं । जँह ऐतक प्रतिबाधि बिरोधी ॥ 
प्रनय बिहीन अरु पिया बियोगी । हंस गमनि बेहड़ बन जोगी ॥ 
और कहते कहते उनका कंठ अवरुद्ध हो गया । यहाँ तो इतने शत्रु हैं इतने विरोधी हैं ॥ प्रेम से विहीन एवं प्रियतम से वियोजित वह हंस गामिनी बीहड़ वन के योग्य ही है ॥ 

सीतल सयनी तिन हुँत दाहक । देहि सैन सुख साथरि कंटक ॥ 
कंप पुलक तन नयन सनीरा । कहत बचन प्रभु प्रेम अधीरा ॥ 
यह शीतल शयनी उसके लिए अग्नी के सरिस है । कुस-कांटे की साथरी ही उस एशियन का सुख देगी ॥ कम्पन करते रोमांचित शरीर एवं नीर युक्त नयन से प्रभु  प्रणय में अधीर होकर कहने लगे : -- 

लिखे लेख बिधि टरै न टारे । लिखी होतब सोइ होवनिहारे ॥ 
हरिअरि हरिपद लखमन छाँड़े । कहि न सकत कछु चितबत ठाढ़े ॥ 
विधि के लिखे लेख  को कोई मिटा नहीं सकता । जो लिखी हुई भवितव्यता है वह अवश्यमेव होती हैं ॥ फिर लक्ष्मण ने धीर धीर हरी के चरण को छोड़ा । और बिना कुछ कहे स्तब्ध स्वरुप में खड़े रहे ॥ 

किए बिरंचि कस बिधान लिखे कैसेउ लेख । 
भाग क्रम बल फेर करत, रचितै कस अवरेख ॥ 
विधाता ने यह कैसा विधान किया कैसे लेख लिख दिए भाग्य क्रम के बल को परिवर्तित कर ये कैसा विचित्र चित्र बना दिया ॥ 

नाइ सीस पद भर अनुरागा । जावनु बन पुनि आयसु मागा ॥ 
तरलित नयन ब्याकुल निलयन । चलत लखमन बहु सिथिराए चरन ॥ 
अनुराग से परिपूर्ण होकर प्रभु के चरणारविन्द में शीश नवा कर लक्ष्मण ने वन में प्रस्थान करने की आज्ञा मांगी । द्रवित नेत्रों एवं व्याकुल ह्रदय से वे बहुंत ही शिथिल चरणों से चले । 

कसकत सारथि आयसु दाने । मात जानकी भवन पयानें ॥ 
अंतह पुर रथ चरन पैठाए । जगत मात पिय अगोरत पाए ॥ 
और व्यथित होकर सारथी को आदेश किया कि माता जानकी के भवन की और गमन करो ॥ रथ के चक्र ने  अंत:पुर में प्रवेश किया वहाँ जगज्जननी को अपने प्रियतम की प्रतीक्षा करते पाया ॥ 

जगती जोत सन जनी जागे । दोनउ दीपित बर्तिक लागै ॥ 
एक दीपक जर जर अनुरागी । दुज रघुबर कर भई त्यागी ॥ 
जगती हुई ज्योति के साथ जननी भी जागरण कर रही थीं । दोनों ही दीपिकावार्तिक के सदृश्य प्रतीत हो रही थी ॥ एक जल जल कर दीपक के अनुराग में दूसरी रघुवर के हाथों त्याग कर विलीन होने को तैयार थी ॥ 

अभिराम रूप अस निभ नीके । भयौ पयस मयूख मुख फीके ॥ 
दृग दरपन सजन छबि दरसाए । पूछे लखन पिय काहु न आए ॥ 
उनका अभिराम स्वरुप ऐसा सुन्दर आभा दे रहा था कि उअनके सम्मुख चंद्रमा का मुख भी कांतिहीन हो गया ॥ दृष्टि का दर्पण प्रियतम की छवि दर्शा रहा था । माता ने लक्ष्मण से पूछा प्रभु अब तक क्यों नहीं आए ॥ 

दरसत छबि भगवन, सिय दृग दरपन हिया भर भर आयो ॥ 
जोरे दोई कर  सिय प्रिय नागर  सौमुख सीस नवायो । 
पद पदुम पँवारी पलक बुहारी भए बिहबल बुहरायो ।  
अवरोधित कण्ठन कठिनइ लखमन चितबन धीर धरायो ॥ 
जब माता सीता के प्रिय देवर ने उनके दृग-दर्पण में प्रभु की छवि देखी तब उनका हृदय भर आया दोनों हाथों को जोड़े उनके सम्मुख अपना शीश नवाया उनके पद्म चरण की ड्योढ़ी को अपने पलकों की बुहारी विव्हावल होकर बुहारने लगे । फिर अवरुद्ध कंठ एवं अतिशय कठिनता से लक्ष्मण ने चित्त को धीरज धराया ॥ 

पूछ उतरु देइ लोचन, द्वारी पलक ढकाए । 
बन लेइ गवनै आपन, रघुबर मोहि पठाए ॥ 
और नेत्र द्वारी पर पलकों का आवरण किये उनके प्रश्न का उत्तर दिया आप को वन में ले जाने हेतु भगवान श्री राम जी ने मुझे भेजा है ॥ 

बृहस्पतिवार, २० मार्च २ ० १ ४                                                                                           


पिय चारु चरन  चिंतनहारी । बोलि बड़ भागि निज बलिहारी ॥ 
अजु जह महरानी साकेता । भइ धन्य मई केतन केता ॥ 
अपने प्रियतम श्री रघुनाथ के चरणों का चिंतन करने वाली वह सौभाग्यशील स्वयं पर न्यौछावर होकर बोली  आज यह साकेत की महारानी मिथिला कुमारी बहुंत ही धन्यमयी हो गई ॥ 

अजहुँ त रयनिहि बितेहि नाही ॥  नाथ मनोरथ कृत पूरेनाही ॥ 
मम सम कोउ सुभागिन नाही । पठए पिया तुअँ मोरे पाहीं ॥
अभी तो रायनी भी व्यतीत नहीं हुई है । और नाथ ने मेरे किए मनोरथ को संतुष्ट कर दिया । हे वत्स !मेरे सदृश्य कोई सौभग्यशाली नहीं है कि मेरी कामनाओं  को पूर्ण करने हेतु प्रियवर ने तुम्हें मेंरे पास भेजा ॥ 

मोर मनोरथ कोरिन तूले । पिय पूरन सिच पत फुर फूले ॥ 
प्रफुरित नयन जब बन झौरिहि । तपासबिनी भामरि बन भौरिहि ॥ 
मेरा यह अभिलाषा किसी अंकुर के  जैसा था । जिसे प्रियतम ने पूर्णता की सिक्ता से उसमें प्रसूत उद्भिद हो ग । ये प्रसन्न लोचन से जब अरण्य में झूमेंगे । तब तपस्विनी भ्रमरियां बनकर इनपर भ्रमण करेंगी ॥ 

अजहुँ मैं तपोबन तपसबिनी । मानि देउ निज पत जो पतिनी ॥ 
बसनाभूषन आसन दए बर । तिनके चरनिन्ह समर्पन कर  ॥ 
आज मैं तपोवन की उन निष्ठावती स्त्रियों को जो अपने पति को देव के समतुल्य मान देती हैं उन्हें मैं  उत्तम आसन देकर ये वस्त्राभूषण आदि वस्तुएं उनके चरणों में सपर्पित करूँगी ॥ 

करत तिन्ह पतिब्रता भिनन्दन ।  चरन पखारि करहुँ अति वंदन ॥ 
जीवन धन सिरु तिनके हाथा । मिलए सुभागे तिनके साथा ॥ 
और उन पतिप्राणाओं का अभिनन्दन करते हुवे चरण प्रक्षालित कर उनकी अतिशय वंदना करूंगी । जिनका आशीर्वाद सर्वस्वरूप है उनका सत्संग सौभाग्य से ही प्राप्त होता है ॥  

मैं तिलछ धरा कन कन  तरसी । सोइ घन बदरा घनाकर सी ॥ 
मैं  सिथिर पथिक तप पथचर सी । सो छाइ सुखद घन तरुबर सी ॥ 
मैं एक व्याकुल धरा हूँ जो बूँद बूँद की प्यासी है । वे वर्षाऋतु कि घनी घटा सी हैं । मैं ग्रीष्मऋतु में पथ पर चलते हुवे किसी शिथिल पथिक के सदृश्य हूँ । वह घने वृक्ष की छाया जैसी हैं ॥ 

अस कह सयन भवन भीत, चारू  चरन फिरोए । 
मनिगन बसन बर दुहु कर, नाना साज सँजोए ॥ 
ऐसा कहकर सीता ने शयन-कक्ष के भीतर अपने कुमकुम चरणों ले गई ।और दोनों हाथों से  मणि समूहों से युक्त वस्त्र आदि विभिन्न प्रकार की सामग्रीयाँ संजोने लगी ॥ 

शुक्रवार २१ मार्च, २ ० १ ४                                                                                             

पुनीत काल घरी सुधियाई । प्रात क्रिया करि धोइ न्हाई ॥ 
दिब्य बपुरधर बासन अर्पन । बंदि पितु देउ पिय मन ही मन ॥  
सूर्योदय के पूर्व ब्रह्म मुहूर्त में निमज्जन स्नान आदि प्रात क्रियाएं संपन्न कर दिव्या देहमूर्ति को वस्त्रार्पित कर सांध्य-पूजन में मन ही मन अपने प्राणाधार श्रीराम चन्द्र सहित अधिष्ठाता पूर्वजों का वंदन किया ॥ 

 चारु चरन रवनत रमझोरे । किंकिनि कंकन किए कर कोरे ।। 
हंस हिरन हरिमनि सिंगारे ।  लगि सकलन नाना उपहारे ॥ 
कुमकुम से युक्त चरणों में ध्वनिमय घुंघरू अर्पित कर  क्षुद्र घंटियों से युक्त कंगनों के अपने हाथी के कगारे को समर्पित किये । इस प्रकार चांदी-सोना हीरा-पन्ना आदि से श्रृंगारित होकर माता सीता तपस्विनियों हेतु विभिन्न प्रकार के उपहार संकलित करने में व्यस्त हो गईं ॥ 

सिअरे सियरे सिचइ सकोरे। तपसि चरन तन सीकर छोरे ॥ 
सुमन सुरभीमन सार सँचाए। चोट चपेट उभरन सुख दाए ॥ 
तप के आचरण गरहन करने वाली तपस्विनियों के तन को जो जल-बिंदुओं से सिक्त करें ऐसे शीतल शीतल वस्त्र एकत्र किये ॥ ऐसे सुमन एवं सुगंधमयी पदार्थ संचित किये जो उनके  ठेस, क्लेश आदि से उत्पन्न घावों की पीड़ा को सुख दे ॥ 

कंगनी बिंदु मनि मनियारी । सिंदूरी सुहाग पेटारी ॥ 
जोइ सँजोइनि थारिनि थारी । तापर सुन्दर दिए ओहारी ॥ 
कंगन मन को हरण वाली मणिमयी बिंदिया एवं चीन-पिष्ट को सुहाग पिटारी में संजोकर फिर उन साज सामग्रियों को  थालियों में संकलित की और उनपर सुन्दर आच्छदन पट दिया ॥ 

धर कर चलत सखी सुठि भामिनि । सन चले तिनके हंसगामिनि ॥ 
घर के देहरि लांघ न पाई । दोलत डगमग पग उरझाई ॥ 
सुन्दर स्त्रियां एवं सखी-सहेली उन थालियों को हाथों में लेकर चलीं । हंसगामिनी माता सीता भी उनके साथ हो ली ॥ अभी घर की ड्योढ़ी लांघ भी न पाईं थीं कि गडगमग डोलते हुवे कहीं पाँव उलझ गया ॥ 

मुखरित हो मुनि पथ संकेते । गवनन उत्कट सिया न चेते ॥ 
हरिहरि प्रिय नागर नियराई । प्रियंकर धुनी पूछ बुझाई ॥ 
मननशील मार्ग मुखरित हो गया उसने भवितव्य को संकेत किया । किन्तु उस संकेत पर मुनि स्त्रियों के दर्शन हेतु उत्साहित माता सीता का ध्यान नहीं गया ॥ वे शनै: शनै: पदचाप करते प्रिय देवर लक्ष्मण के निकट आईं और हर्ष जनित ध्वनि में उनसे पूछने लगीं ॥ 

रे मम प्यारे बछुआ, कहँ तुहरे रथ बाहि । 
कहँ बाह कहँ बाहक जौ तपोभूमि लए जाहि ॥ 
अरे प्यार वत्स ! तुम्हारी रथ वाहिनी, उसके वाह, उसका वाहक, कहाँ है ?जो मुझे तपो-भूमि ले जाऐंगे ॥ 


शनिवार,२२ मार्च, २ ० १ ४                                                                                          

हिरनमई रथ सोंह निकेते । अवनत लखमन  किए संकेते ॥ 
लाँघि जोइ  देहरी दुआरी । प्रथम किरन चर चरनन धारी ॥ 
हिरण्यमयी रथ भवन के सम्मुख खड़ा था । अवनत लक्ष्मण न उसकी और संकेत किया ॥ माता ने जैसे ही द्वार की ड्योढ़ी पार की वाइस ही भोर कि प्रथम किरण ने उनके चरण पकड़ लिए ॥ 

अरस परस कर प्रभा गुहारे । निमग्न सिया कानन न घारे ॥ 
कनक कन उदत कहत न जाऊ । पिय पियारी चरन बहुराओ ॥ 
आलिंगन करती हुई प्रभा ने ने दोहाई दी किन्तु निगमन में निमग्न माता सीता ने उसपर ध्यान नहीं दिया ॥ स्वर्णिम धूलि उद्यमित होकर कहने लगी हे माता ना जाओ ! प्रियतम की प्यारी अपने चरण वापस ले लो ॥ 

अरुन चूढ़ मुख करुन पुकारे ।  होर निहोरए करि करि  हारे ॥ 
आकर आकर पदम् प्रफूरे । लवन नयन जल कनिका कूरे ॥ 
मुर्गों के मुख करुण पुकार करने लगे ।  उनकी पुकार माता को रुकने की प्रार्थना कर कर हार गई । पद्माकरों में पदम-पुष्प विकसित  हुवे और उनके सुन्दर लोचन में अश्रु - कणिकाएँ एकत्र हो गई ॥ 

 भरे कंठ कह पलक भिजोई । रे सिय होरन कहु तो कोई ॥ 
कह कह भै सिथिरी अँधियारी । मात सिया भै तव परिहारी ॥ 
वे पलकें भिगो कर भरे कंठ से कहने लगे माता सीता को जाने से रे कोई तो रोको ॥ जब अंधियारी कहते कहते जब थक गई हार गई कि हे माता आपका त्याग हो रहा है ॥ 

सुनी न सिया निज चरन पछौंहे । होरि नहि त पिय प्रात अगौहैं ॥ 
बैस घुटुरु दुहु कर जोरी के । धर पद मुकुल जानकिहि जी के ॥ 
इसपर भी माता ने जब अंधियारी के वचनों को नहीं सूना और वह नहीं रुकी तब उसने अपने प्रियतम प्रभात को आगे किया ॥ घुटने के ऊपर विराजित होकर माता जानकी जी के चरण अपने हस्त मुकुल में धारण कर : -- 
 
प्रथम असंदी  मातु बिराजी । रथिक रछक बन आपन राजी ॥ 
चलउ कहत सूत क्लिन्न लखमन । चले सुमंत्रु करत अभिवादन ॥ 
प्रथम आसंदी पर माता को विराजित किया रथिक एवं रक्षक बनकर तत्पश्चात  स्वयं राजित होकर लक्ष्मण ने क्लिन्न ह्रदय से सारथि सुमंत्र को प्रस्थान करने के लिए कहा । तब महामात्य सुमंत्र अभिवादन करते हुवे चल पड़े ॥ 

हिनांसु धरे अंसुमन, अंसु  नयन कर जोर । 
कहत हे री नीक नियति, बिबस करन मैं भोर ॥ 
चंद्रमा धारण किये अन्धकार ने अश्रुपूरित लोचन से युक्त होकर हाथ जोड़ कर कहा हे प्यारी प्रकृति मैं भोर करने हेतु विवश हूँ ॥ 

रविवार, २३ मार्च, २ ० १ ४                                                                                        

कारज करतब जे जन हीते । तेहि करन रहेँ  कटि बधीते ॥
लखमन आयसु पा बर भ्राता । परिहरन करन सीता माता ॥ 
"जो कार्य एवं कर्त्तव्य समाज और जनता के हीत में हो उन्हें करने हेतु सदैव कटिबद्ध रहना चाहिए" ॥एतदर्थ बड़े भ्राता की आज्ञा  प्राप्त कर लक्ष्मण, माता सीता का त्याग कार्य संपन्न करने हेतु : --  

चले लख बीथि बेहड़ घन बन । परजल्पत पवन बाहि स्यंदन ॥ 
उरत सिय केस उरत सियालू । करत सैन भबि परसत गालू ॥ 
सघन एवं विकट वन की लक्ष्य-वीथि पर रथ वाहिनी द्रुत गति से वायु से वार्तालाप करती चली ।  माता सीता के उड़ाते हुवे केश एवं आँचल उनके कपोलों को स्पर्श कर भवितव्य की सूचना दे रहे थे ॥ 

कहत बहुराए भोरिन भौरे । भौरिन बरनन भँवरत छोरे ॥ 
भँवरत  पथ रथ चरन चकोरे । किए कोलाहल चहुँ ओरे ॥ 
भोर, सीस के भँवर स्वरुप में जो कि शुभाशुभ के सूचक माने जाते हैं कह कह कर एवं भ्रमरों की सी अपनी श्यामल वर्णता को छोड़ कर लौट चला। रथ के चार चरण पथ पर भ्रमरते हुवे चारों और कोलाहा कर रहे थे ॥ 

तबहि लोचन फरकत कुंचिते । होनिहार दुःख बिरह सूचिते ॥ 
निरख नभोचर दिग बिपरीते । सम्बोधत प्रिय नागर सीते ॥ 
तभी माता के लोचन स्फुरित होकर संकुचित हो गए जो आने वाले समय में होनेवाले दुःख की सुचना दे रह थे । नभ मन पक्षीयों को विपरीत दिशा में विचरण करते देख माता सीता अपने प्रिय देवर से सम्बोधित हुई ॥ 

कारे लेख हरिदै तुर द्रवन । तीब्र गति नारि करत स्पंदन ॥ 
सकल दिरिस कहि दरसत बामा । अहै लखन सकुसल सन रामा ॥ 
उनका चिंतन ह्रदय के धड़कन को तीव्र कर रहा था और यह तीव्र गति नाड़ियों को भी तेजी से स्पंदित कर रही थीं । समस्त दृश्यों को विपरीत देख कर माता बोली हे रे लक्षमण प्रभु श्री राम कुशल से तो हैं ॥ 

कर अर्पन परसन चरन, लोचन दरसन पान । 
जगत उदासिन मुनि प्रिया हेतु मोरे प्रयान ॥ 
मेरी यह यात्रा तो संसार से विरक्त मुनियों की स्त्रियों का अपने लोचन से दर्शन पान करने हेतु एवं अपने हाथों से उनके चरण स्पर्श करने हेतु से है ॥ 

सोमवार २४ मार्च, २ ० १ ४                                                                                    

प्रियबर प्रनइन प्रानाधारे । सह दुहु देउर भ्रात तुहारे ।। 
आपद बिपदा लहे न कोई । हे भगवन सब मंगल होई ॥ 
प्रेमी, प्रियवर, प्राणों क आधार स्वरुप श्रीराम सहित दोनों देवर जो तुम्हारे भ्राता हैं  वे कोई आपदा किसी विपदा न घेरी हों । हे प्रभु! सब सकुसल हों ॥ 

हो धरनिहि मह सरबस साँती । त्रसे न प्रिय परजा को भाँती ।। 
बैर न बिग्रह न दुःख संत्रासे । रहे सदा सब आस सुपासे ॥ 
धरती में सर्वत्र शान्ति हो प्रिय प्रजा किसी प्रकार से भी कष्ट न हो । कहीं न हो कहीं वैमनस्य न हो कोई दुखी एवं भयभीत न हो । सभी दिशाओं में सदैव सुखदाई रहें ॥ 

हो ना कोइ कहुँ को उपाधी । दूरै रहे बिपलौ बियाधी ॥ 
हो सब कारज जनहित कारी । सुख पूर्वक रहै नर नारी ॥ 
कहीं भी कोई उपद्रव न होए । कष्ट,संकट,शत्रु-भय, अस्थिरता, अपहरण, अत्याचार, दुष्टता रोगादि दूर ही रहें । समस्त कार्य जन समूह के कल्याण करने वाले हों । सभी नर-नारी सुखपूर्वक रहें ॥ 

कहुँ को दावानल ना जागए । बयरु करत को काहु न लागए ॥ 
पाए सब जीउ जिउन धिकारे । नियति दिरिस  रह सदा उदारे ॥ 
कहीं कोई दावाग्नि न जागे । वैर करता हुवा कोई किसी से झगड़ा न करे । सभी जीवों को जीवन का अधिकार प्राप्त हो । प्रकृति की दृष्टी मन सदैव उदारता हो ॥ 

सब कहुँ सुभ ताति चिंतत सुख मानत हिय माहि । 
करत पूछ लखन सों सिय, एहि  बिधि संसइ लाहि ॥ 
सर्वत्र अभ्युदय का चिंतन कर सबकी शुभाकांक्षा कर मनो-मस्तिष्क संसय कर इस प्रकार माता ने भ्राता लक्ष्मण से सब की कुशलता पूछी  

मंगलवार, २५ मार्च, २ ० १ ४                                                                                     

लखमन हिय घर दुःख घन घारे । थिर नयन पथ पलक पट  ढारे ॥ 
द्युति सरिस प्रभु बचन दमंके । बहुत कठिन कर बाँधे अंके ॥ 
लक्ष्मण के ह्रदय-भवन को दुःख के बादलों ने घेर लिया । पथ पर स्थिर नयन पर पलक-पट ढुलक आए ॥ प्रभु के वचन किसी बिजली के सरिस कौंधने लगे । उस दुःख के बादल ने अंक को  अत्यधिक कठिनता पूर्वक बांधा ॥ 

बचन बध  बिबस भयउ असहाए । कहन चाह कछु  कह नहीं पाए ॥ 
कण्ठन तालउ भावक गाढ़े । लख पथ रथ तनि आगिन बाढ़े ॥ 
वे प्रभु के वचनों से बंधे हुवे थे अतएव असहाय स्वरुप में कहना चाहे भी तो कुछ कह नहीं पा रहे थे ॥ कंठ तालव्य में भाव प्रगाढ़ हो गए और अपने लक्ष्य पथ पर रथ क्वचित अग्रसर हुवा ॥ 

दरसे  सिया लोचन अभिरामा । बहुतक मृग गमनए पुर बामा ॥ 
जे दरसन दारुण दुःख सैनी । जेहिं लेखत बोलि मृगनैनी ।। 
फिर माता सीता के अभिराम नयनों ने देखा कि बहुंत-से मृग बायीं ओर से घुमाकर निकल रहे हैं । यह दर्शन भयंकर दुःख की सुचना देनेवाला था । जिसे भानकर  उस मृगनयनी ने ( मनमें )बोलीं  : -- 

फेर फिरत मृग पग बिपरीते । निकस रहे सो अहै सुधीते ॥ 
श्रीराम रमन के जो रमनी । छाँड़सि चरन अवर पुर गमनी ।।
मृगों के चरण विपरीत फेर फिर कर निकल रहे हैं सो उचित ही है जो श्री राम जैसे रमण की रमणी है । और वह उनके चरणों का त्याग कर अन्यत्र प्रस्थान कर रही है ॥ 

पतिब्रता नार धर्म न दूजा । पति पद वंदन पति पद पूजा ॥ 
एतदर्थ मम दूषन कृत हुँते । मिलै दंड सो न होहि बहुंते ॥ 
पतिव्रता नारी का कोई दुसरा धर्म नहीं है उसका यही धर्म है कि वह पति क चरणों की ही वंदना करे उनके पदों का ही पूजन करे ॥इस लिए मेरा यह प्रस्थान पापकृत्य है इसका मुझे जो भी दंड मिले वह अधिक नहीं होगा ॥ 

सिय मन सरनिहि संचरै, परमारथी बिचार । 
रथ चक चोख चिलक चिलक, लख लख संचर चार ।।  
माता सीता के चित्त की सरणी में ये परमार्थी विचार विचरण कर रह थे । और रथ के चक्र तीव्र स्वरुप में टसकते हुवे,चकाचौध दृष्टि से अपनी लक्ष्य वीथि में संचालित थे ॥ 

बृहस्पतिवार, २७ मार्च, २०१४                                                                                     

तात मात प्रियवर प्रिय नागर । देवल मंदिर अजोधा नगर ॥ 
निर्झरनी सर सरयू सरिता । हलबल तलहट तीरत तरिता ॥ 
तात-मात प्रियवर प्रिय देवर सहित अयोध्या नगरी क घर-द्वार निर्झरनियां, ताल-सरोवर, सरयू सरिता, तलहट पर तैरती चंचल तरणि : --  हाट बाट कल कानन सुन्दर । श्रृंग सिखर दृढ़ चेतस भूधर ॥ 
नगर नागरी गौवनु गाछे । एक एक कर सब छूटत पाछे ॥ 
हाट-हटियार, मार्ग सुहावने सुन्दर उपवन । श्रृंग से शिखर धारण किये रीड चित्त पर्वत । नगर के नागरिकजन गौवन तरुवृंद एक एक कर सभी पीछ छूटत चले गए ॥ 

भर निहार गवनै अँधियारी । करत रुदन सन अरु अरुनारी ॥ 
धाए धूरबह दूरहि  दूरै । भर धुर ऊपर धूरहि धूरे ॥ 
अंधियारी नयनों को रक्तिम कियेरुदन करती निहार भर कर लौट गई । रथ के अश्व दौड़ते हुवे अक्ष को धूल धूसरित कर आँखों से ओझल हो गए ॥ 

 तंटक तरु घनवर अस लागे । जोगि सिय जस रैन के जागे ॥ 
लख बिजोग बिकल सब ठाढ़े । जहँ तहँ मनहु चित्र लिखि काढ़े ॥ 
 मार्ग के के ततक परके तरुवरों का मुख मंडल ऐसा प्रतीत होता जैसे वे रात के जागे हों और माता सीता की प्रतीक्षारत हों ॥ 

उत राम सोक मगन कहि, सिय सिय सुध बुध भूर । 
अवने तुअँ तेतक निकट, गवनै जेतक दूर ॥ 
उधर भगवान श्रीराम शोक में निमग्न होकर कहते हैं सीता हे सीता तुम मुझसे जितनी दूर होती जा रही हो मेरे ह्रदय के उतना ही निकट आ रही हो ॥ 

शुक्रवार, २८ मार्च, २ ० १ ४                                                                                  

आह सिया भै अस परिहाई । मम सों  जग को निठूर नाही ॥ 
प्रीत प्रतीत अस मैं त्यागा । हारे हरि कँह आपनि अभागा ॥ 
वैदेही इस प्रकार त्यागी गई आह ! संसार में मुझसा कोई निष्ठूर न होगा ॥ प्रभू हार के अपने को अभागा मानकर कहते हैं आह!  मैने प्रीति को प्रतीति को किस प्रकार  त्याग दिया ॥ 

गवनि  सिया बन बचन प्रमाने । तिलछ  राम मन मान गलाने ॥ 
जान त्याजन का कहि भोरी । भइ कठोर कास प्रीतिहि मोरी ॥ 
माता सीता प्रभु के वचनों को सिद्ध करने हेतु वन में चली गईं । और तासापते हुवे भगवान श्रीराम का मन ग्लानी से भरा है ॥ जब वह अबोध अपने त्याग की बात जान जाएंगी तब वह मुझे क्या कहेंगी । 

बिरहा जुगित रैन के जागे । एकहू घरी पलक न लागे ॥ 
प्रान प्रिया भा सुधा मयूखा । हरि आनन भय चातक मूखा ॥ 
प्रभु बिरह से योगित होकर रात्र से जागृत हैं उनकी पलकें एक घड़ी भी नहीं लगी ॥ प्राण प्रिया माता सीता जैसे चंद्रमा हो गईं । और हरि का श्रीमुख चातक का मुख हो गया ॥ 

पेम पयस जस चातक चाहे । हरि रसना तस तिस्ना लाहे ॥ 
कभु मन कभु बन भवन टटोरे  । मौनी मुद्रा भाउ सब बोले ॥ 
जिस प्रकार चातक प्रेम पीयूष को पाने की कामना करता है। प्रभु श्रीराम कि जिह्वा वैसे ही तृष्णा को प्राप्त है । वह माता सीता को कभी अपने मन को कभी उपवन को कभी भवन में ढूंडते हैं उनकी मुख-मुद्रा मौन धारण किये है किन्तु अंतर-भाव मुखरित हैं ॥ 

नलिन नयन पुर पलक पँवारी । ठाढ़ि पीर सिय सियहि पुकारे ॥ 
नहीं जग को तुअँ सों दुखदाइ । हे  री बिरहा दुहाइ दुहाइ ॥ 
नलिन के जैसे नयन के नगर में पलकों के गोपुर पर पीर खडी है और सीता-सीता ही पुकार रही है । हे विरहा दुहाई है तुम्हारे जैसा दुःख देने वाला संसार में कोई दुसरा न होगा ॥ 

धीर सांत के धुरंधर  , ताछन भयौ अधीर । 
छाइ नयन घटा घन घन, बरसे छन छन नीर ॥ 
जो धीरता एवं शांति के प्रतीक स्वरुप हैं वही उस समय आधी हो उठे । उनके नयन-पटल में घनघोर घटा छा गई । उससे प्रतिक्षण अश्रु की वर्षा होने लगी ॥ 

नीर पीर के क्षीर दुइ , दोनहु हिया समाए । 
बिरह ऐसेउ बिदारे, नीर बिलग बह आए ॥ 
नीर और पीड़ा रूपी क्षीर दो,  दोनों  सम्मिलित होकर ह्रदय में समाए हैं । विरह ने उन्हें ऐसा विदीर्ण किया कि दोनों पृथक हो गए, पीड़ा ह्रदय में रही और नीर नयनों से उतर आया ॥ 

शनिवार, २९  मार्च, २ ० १ ४                                                                                    

होत अपसगुन बहु चहु पासा । घारि धनब घनमल चहुँ आसा ॥  
इत धूरबह चलेउ अति आतुर । पार करत बहु गाउँ नगर पुर ॥ 
चारों और बहुंत से अपसगुन हो रहे हैं जी होवनिहार दुःख के दूतक हैं । आकाश ने  चारों दिशाओं को घन से मलिन कर दिया  ॥ इधर माता सीता को ल जाने वाई रथवाहिनी के वाहि बहुंत से ग्राम, पुर,नगर पार करते हुवे अत्यंत तीव्रता पूर्वक अग्रसर हैं । 

तबहि कहि सों सुर धुनिहि आई । कानन कल कल नाद सुहाई ॥ 
देखि सम्मुख सुरसरि पुनीता । सिरोवनत प्रनाम करि सीता ॥ 
कि तभी कहीं से स्वर धारण किये हुई ध्वनियाँ प्रकट हुईं । कानों में उनका का-कल निह्नाद सुहावना प्रतीत हो रहा था ॥ और माता सीता ने परम पावनी सुर-करींद्रदर्पापहा को सम्मुख देख शीश प्रणयित कर उन्हें प्रणाम अर्पण किया ॥  

जिनके पवित दुआरि अलिंदा । निबास रत बिप्रगन मुनि बृंदा ॥ 
बूंद बूंद जो जीवन घारे । कहत जिन्ह मुकुतिहि के द्वारे ॥ 
जिनके पवित्र द्वारायण में सुर मुनिजन एवं विप्रगण निवास करते हैं ॥ जिसकी प्रत्येक बिंदु में जीवन समाहित हैं । जिन्हे मोक्ष का द्वार भी कहा जाता है ॥ 

जिनकी पौरि सुरग सोपाना । सुधि बुधि बिरधा करत बखाना ॥ 
छाँड़ेसि भू भुवन स्वयम्भु के । उतर धरी पुनि सीस संभु के ॥ 
जिसकी पौड़ी स्वर्ग ( एक कल्पना-लोक जहां समस्त भवभूति धारण किये सुख निवास करता है) सोपानपथ है । बुद्ध प्रबुद्ध एवं बृद्धजन जिसका व्याख्यान करते हैं ॥ ब्रह्मा का भूमि उनका ओके त्याग कर जो पृथ्वी-लोक पर उतरी और फिर भगवान शिव शम्भू के शीश पर धारण की गई ॥ 

हे सुर तरंगिनी गगनांगिनी हे अति पवित पावनी । 
कलिमल दुरावनी अघ नसावनी महा दोष पलावनी ॥ 
तुहरे निर्मल जल , रवकल निष्छल, प्रतिपल निहनाद करे । 
मुख परबतेस्वर गुंजत हर हर जस कल कूनिका धरे ॥ 
हे सुर तरंगिणी, हे कलयुग की कलुषता को दूर करने वाली, पापों का नाश करने वाली दोषों का पलायन करवाने वाली, गगन से उतरने वाली अत्यधिक पवित्र पावन अप्सरा।। तुम्हार इस निर्मा जल की निश्छल सुमधुर ध्वनि पर्पल अस निनाद करती है जैसे पर्वतेश्वर हिमालय कलवीणा धारण किये है और उनके मुख से हर हर का स्वर गुंजयमान हो ॥ 

मेलन आपन पत भूतल थिरकत रुर नुपूर चरन धरे । 
सुरग श्री बिधाने, दिए बरदानें खन खन हिरनई करे ॥  
नदी कल नंदिनी कूल कुलीनी, सुरग सोपान बरे । 
जिन्ह के अलिंदा, सुर मुनि बृंदा, सुख सहित निबास करें ॥   
और आप अपने प्रियतम के मिलन हेतु भूमि के ताल पर चरणों में सुन्दर नुपूर धारण किये हुवे नृत्य कर रही हो । हे स्वर्ग का वैभव आपको विधाता न हमें वरदान स्वरुप दिया है आपने ( भारतवर्ष के )खंड खंड को हिरण्यमय कर दिया ॥ हे पवित्र भानुमति आपने अपने तट के स्थान पर स्वर्ग का सोपान पथ वरण किया है ( ऐसा बुध प्रबुद्ध जन कहते हैं ) जिस के द्वारालिंद एव एवं मुनिगण क्या दाण्डीजनिक भी सुख सहित निवास करते हैं ॥ 

गवनु बन बासे जग सों उदासे चौदसि बरसि बितायो । 
पूरित भए काला, सन जनपाला, अवध धाम बहुरायो ॥ 
पथ दरसन धारत, तीर उतारत , प्रभु पौरी परनायो । 
हरषित गंगा अहिबात अभंगा तब सुभा सीस दायो ॥ 

                                           सुन्दरा सागर बरे । 
रूप की रासि, जगत सुपासी, माला बन कंठन उतरे ।।  

जाके रज रज निर्मला, कन कन जीवन दाइ । 
जहँ मलिनहु भए बिमला, वाके सिय जस गाइ ॥  

रविवार, ३० मार्च, २ ० १ ४                                                                                               

एहि बिधि गंगा के तट पैठी । अस्तुति करत सिया रथ बैठी ॥
हो भाव प्रबन जल नयन भरे । कठिनई लखन मुख बचन बरे ॥  

कसकत हरिदै हहरत गाता । हरुवर बोलै हे मम माता ॥ 
हे जननी अब बिलम न कारू । गमन हमहि तिन्हिनि के पारू ॥ 

सुनि नागर सिय नयन नवाई । उतरत रथ तट चरन बढ़ाई ॥ 
 जीवन दाइनि भरी तरंगे । दोइ तीर अरु ठाढ़ एकंगे ॥ 

निर्मल नीरज कन सिरुधारी । दोइ बिंदु का कंठ उतारी ॥ 
जै सुरसरि जै नीर अपारए। भइ पवितित मैं सरन तुहारए ॥ 

गंगोदक धारी धरा, उदक धर पदालिन्द । 
धरा सुता उद सिरौधार, धरे चरनारविन्द ॥ 

सोमवार, ३१ मार्च, २ ० १ ४                                                                                         

प्रभु संगिनि देखत अति हरषी । देउ सरि कर मोह मति करषी ॥ 
नदी नंदिनी नन्द निनादे । उमगत जल निहनन निहनादे ॥ 

तरंग नबीन पौरि पुरानी । पुरान बखान नित नउ पानी ॥ 
करुबारहि कर करनइ धारे । चारत हरिअरि कारत पारे ॥ 

कंठ पुकारत हर हर गंगे । बरन भजन हरि रंजन रंगे ॥ 
सुनी रघुबी प्रिया बैदेही । दरस दीठ बहु सीट सनेही ॥ 

सुर संगति कर धुनी सुहाई । नदन बादन बृंद की नाई ॥ 
चरए करुबारि धीरहि धीरे । तीरत तरनिहि तारत तीरे ॥ 

जाह्नबी कन तन लावन, निलयन निमल नीर । 
पर्बतेस्वर पितु नगर, पियघर सागर तीर ॥ 












3 comments:

  1. अती सुन्दर ...
    जय श्री राम ... जय हनुमान ...

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति है
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें
    http://saxenamadanmohan.blogspot.in/

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