Tuesday, 18 June 2013

------ ॥ उत्तर-काण्ड १॥ -----

----- ॥ श्री रामाश्वमेध ॥ ----- 
कहे धराधार मुनि श्री वात्सायायन सौँह । 
रामाश्वमेध कहानि, कहत सारदा  तौह ॥ 
भगवान शेष नाग ने श्री रामाश्वमेध की जो कथा मुनि श्री वात्सायायन के सम्मुख कही थी , उस कथा को श्री शारदा उसी प्रकार से श्रद्धा पूर्वक प्रस्तुत कर रही हैं  ॥ 

बिनइत मधुरित बोले मुनिवर । हे महभाग हे सूत श्री कर ॥ 
तव श्री बदन सुरग खन ताईं । मनोहर कथा हमहि सुनाईं ॥ 
फिर विनम्रता पूर्वक और मधुरित स्वर में ऋषि बोले : -- महाभाग सूत जी ! हमने आप के श्री मुख से स्वर्ग-खंड की मनोहर कथा सुनी ;

हे आयुरमन अब हम लोगे । राम चरित श्रवनन पथ जोगें ॥ 
कहे सूत जी हे मह रिसि गन । एक समऊ मुनि वात्सायायन ॥ 
आयुष्मान् ! अब हम लोगों को श्री राम चन्द्र जी के गुण चरित्र  को श्रवण हेतु  प्रतीक्षारत  हैं ॥ सूट जी ने कहा : -- हे महर्षि गण एक समय मुनि वात्सायायन ने : -- 

सोइ निर्मल कथा के ताईं । प्रभु सेष सोंह पूछ बुझाईं ॥ 
कोमल कर जे बचन अमोले । मुनिबर वात्सयायन बोले ।। 
पृथ्वी को धारण करने वाले नागराज भगवान अनंत से इस परम निर्मल कथा के विषय में प्रश्न किया ॥ मुनिवर वात्सायायन ने अत्यंत कोमल स्वरुप में अनमोल वचनों से युक्त होकर कहा : -- 

प्रभु सुनि तव मुख जग इतिहासा। भंजन भवादि बिषय बिकासा॥ 
जग के सब ग्यान मैं जाना । अगजग लग तुम्हरे बखाना ॥ 
भगवन ! शेषनाग ! मैने आपके मुख से संसार का इतिहास, उत्पत्ति एवं प्रलय सहित उसके विकास आदि विषयों की बाते सुनी ॥ संसार के समस्त चराचर का ज्ञान  मैने आपके व्याख्यान से ही प्राप्त किया ॥ 

भूमि खगोलक, मनि स्तनी चक, नखत गति निर्नय तईं । 
महत्तम तत्व के , सृजन सत्व के , बिलग बिलग निरुपनई ॥ 
अहिकर बंसम, नृप के अनुपम, चरितहु मैं श्रवन कियो । 
एहि आगाने आपइ श्री माने, रघुबर कथा बरनन कियो ॥ 
भूगोल, खगोल, सूर्य, पृथ्वी के परिमंडल, गृह नक्षत्रादि की गति का निर्णय के विषय । महत्तत्त्व एवं सृष्टी के सत्व का पृथक पृथक निरूपण तथा सूर्यवंशी राजाओं के अद्वितीय चरित्र को भी मैने आपके मुख से सूना ॥ इसी प्रसंग में हे श्रीमान ! आपने भगवान श्रीरामचन्द्रजी की कथा का भी वर्णन किया ॥ 

प्रभु अस्व मेध कथा पर, सुनि संछेप सरूप । 
अब मैं श्रवनाभिलाखउँ, वाके बिस्तृत रूप ॥  
किन्तु उन भगवान श्रीरामचन्द्रजी के अश्वमेध की कथा मैने संक्षेप स्वरुप में ही सुनी । अत: अब मैं उसे आपके द्वारा उसके विस्तृत रूप में सुनना चाहता हूँ ॥ 

कथन श्रवन सुमिरन करत ,जोउ कथा जो कोइ । 
मुदित मनो काम पूरित , सह सो अघहिन होइ ॥ 
इस कथा को जो कोई भक्त, कथन, श्रवण अथवा स्मरण करता  है । वह प्रसन्न चित्त होकर सभी कामनाओं से पूर्ण हो जाता है अर्थात कामना रहित हो जाता है साथ ही वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ॥ 

सोमवार, २ ५ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                       

कही प्रभु सेष हे द्विज राए । सुभग जोग तुम बुद्धि अस पाए ॥
जो प्रभु के जग पदारविंदे । ललसे अस जस मधु मकरंदे ॥ 
फिर भगवान् शेष ने कहा : -- ब्रह्मण ! आप ब्राह्मण कुल में श्रेष्ठ एवं धन्यवाद के पात्र हैं; क्योंकि आपको ऐसी बुद्धि प्राप्त हुई है जो प्रभु श्रीरामचंद्रजी के युगल-चरणारविन्दों का मकरंद पान करने को मधुकर के जैसे लौलुप रहते हैं ॥ 

सब मह रिसि कहत एकंगा । होत महत सज्जन सत संगा ॥ 
कारन तिन सौंह एहि कर सुहाए । जेइ कथा तँह श्रवन सुख पाए ॥ 
सभी ऋषि-महर्षि साधू पुरुषों के सत्संग श्रेष्ठ बताते हैं । इसका कारण यह है चूँकि वहाँ इस पावन कथा ( जो समस्त पातकों का नाश करने वाली है ) के श्रवण का सुख प्राप्त होता है अत: उनका साथ सुहावना होता है ॥ 

देवासुर जिनके चरन रती । निज मुकुट मनि सन किए आरती ॥ 
तेहि राम के सुमरन सुधित  कर । तुहरे अनुग्रह भयउ मम उपर ॥ 
देवता और असुर जिनके चरणों में अनुराग रखते हुवे अपने मुकुट की मणियों से उनकी आरती उतारते हैं ।। उन्हीं भगवान श्रीराम का स्मरण कराकर आपने मुझ पर अतिशय उपकार किया है ॥ 

जिन्ह ब्रम्हादि देव ग्यानी । मोह बल के बस कछु न जानी ॥ 
सोइ संवाद सिंधु अपारा । मम सोंह मसक जाननहारा ॥ 
जिनको ब्रह्मादि ज्ञानी देवता भी मोह शक्ति के वश में होकर कुछ भान नहीं पाते ।। उन्ही श्री राम की कथा रूपी महासागर के श्रेष्ठ संवाद को मेरे जैसा-मशक समान तुच्छ जीव भानने वाला हो गया ॥ 

प्रभु चरित ऐसे बिस्तारै । जस पटाम्बर अंत अपारै ॥ 
बंस बेलि कुल कीर्ति कैसी । मंडल मनि मुख मूरति जैसी ॥ 
प्रभु श्रीराम के चरित्र का विस्तार तो ऐसा है जैसे अम्बर पट अपरम्पार है ॥ रघु कुल के वंश वेलि का यश कैसा है जैसे की सौर्य मंडल के मणि सूर्य की मुख मूर्ति का यश हो ॥ 

तथापि मैं आपनि सोंह, बरनउँ निज अनुहार । 
नभग गमन निजबल जदपि, गगन बिपुल बिस्तार ॥ 
तथापि मैं अपनी शक्ति के अनुसार आप से श्री राम कथा का वनं करूंगा ।  यद्यपि गगन तो विपुल विस्तार लिए हुवे है, नभचर फिर भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार गमन करते हैं ॥ 

जाकी जितो बुद्धि होत, तितो ग्यान बखानि । 
जितो कुंभ कोषागार , तितो सँजोई पानि ॥ 
भावार्थ : - जिसकी जितनी बुद्धि होती है उसका ज्ञानाख्यान भी उतना ही होता है । कुम्भज के कोष में जितना स्थान  होगा वह उतना ही जल संचित करेगा ॥ 

मंगलवार, २६ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                 

राम चरित कहि कोटि स्लोके । कोउ कथन कँह लग अवलोके । 
सकल भाख जग दिए जो सानी । बरनातीत तिनकी बखानी ॥ 
श्रीरामचन्द्रजी के चरित्र को करोड़ों श्लोको ने कहा है । यदि कोई उसका कथन करे तो वह कहाँ तक देखे, अर्थात उनका कथन दर्शनातीत है ॥ यदि विश्व की सारी भाषाओं में भी प्रभु को अनुरक्त किये जाने पर भी उनका व्याख्या वर्णनातीत होगा ॥ 

भानुमान जो जगत प्रकासे । सकेर सकै को तिनके कासे ॥ 
प्रभु माया पत सत के मूला । मैं तिन दास तृन तुहिन तूला ॥ 
जैसे भानुमान है उसका कार्य जग को प्रकाशित करना है किन्तु क्या कोई उन्की कांति को संकलित करने में समर्थ है प्रभु का चरित्र भी वैसा ही है ॥ प्रभु तो माया के स्वामी एवं सत्य के मूल हैं और मैं, मैं तो माया का दास हूँ  तथा तुच्छ तृण के सदृश्य उनके सम्मुख नतमस्तक हूँ ॥ 

राम नाम जो बदन उचारे । जो हरि के गुन कीर्ति कारे ।। 
तासु मतिहि अस पावन होही । तापन तप जस निर्मल सोहीं ॥ 
जो कोई भक्त प्रभु श्रीराम के नाम का अपने मुख से उच्चारण करता है । जो कोई भगवान के गुणों की कीर्ति करता है ॥ उसकी मति पवित्र होकर ऐसे शोभित होती है जैसे तपस्वी एवं स्वर्ण तप से शुद्ध होकर सुशोभित होते हैं ॥ 

पुनि सूत कहीं हे मह रिसि गन । अस कह मुनि वात्सायायन सन ।। 
फनिस नाथ भए मगन धिआने । दिए निज पदुम पटल ओहाने ॥ 
तदोपरांत सूत जी ने कहा  : -- हे महर्षिगण ! मुनिवर वात्सायायन से ऐसा कह कर भगवान शेष नाग फिर ध्यान मग्न हो गए और पद्म सदृश्य अपने पोटल का आवरण देकर : -- 

अंतर नयन बिलोक , पुनि लोकानुग्रहोत्तर, । 
कथा कारि अवलोक, लोकाभ्युदय करन किए, ॥ 
फिर उन्होंने अंतर दृष्टि से देखते हुवे लोगों के कल्याण एवं संसार का उद्धार करने हेतु इस असाधारण कथा का अवलोकन किया ॥ 

बुधवार, २ ७ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                      

लिए निज मति भगवन धरनी धर । अवतर प्रभु के चरिता सागर ॥ 
भगवन लघु जान जलधि महिमन । राम कृपा के पर पाए पवन ॥ 
अपनी मति से धरणी को धारण करने वाले भगवान शेष, फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी के कथा चरित्र रूपी सागर में उतर गए ॥ भगवान लघु जलयान के सदृश्य थे और चरित्र महा सागर के सदृश्य था किन्तु श्रीरामजी की कृपा से पवन का प्रसंग प्राप्त हुवा ॥ 

नयन करन चितबन करनीकर । पोटल पटल पट पोत पटतर ॥ 
रंग तरंग जब दिए दरसन । रोम रोम लागे अति हर्षन ॥ 
नयन  पतवार हुवे चित्त कर्णधार हो गया । एवं पलक -पटल के पट पोत के समतुल्य हो गए ॥ जब अनुभूतियों की तरंगों के दर्शन होने लगे तब उनके रोम रोम अतिशय हर्षित हो उठे ॥ 

अरु गद गद बानी सन जोगत । कथा कलस के तिर तिर टेरत ॥ 
बारम बार कहत अभिनन्दन । कारत प्रभु के चरना बंदन ॥ 
और वे गदगद वाणी से युक्त होकर कथा के उस मंदिर के  पर पतवार खींचते , वारंवार प्रभु श्रीराम का अभिनन्दन कर उनके चरणों में अपनी भक्ति वंदना प्रस्तुत की ॥ 

सब्द सब्द सीप रूपांतर । अंतर आखर आखर हिमबर ॥ 
कोष कोठार कर कासि कृपन । दिए रघुनन्दन बहु उदार मन ॥ 
वहाँ शब्द शब्द सूक्ति स्वरुप थे और अंतर में अक्षर अक्षर मुक्ति रूप में थे ॥ मोतियों का  भंडार  था किन्तु प्रभु शेष की मुष्टिका छोटी थी प्र रघुनन्दन उदारता पूर्वक उन मोतियों का दान कर प्रभु शेष को अनुग्रहित किया 

हस्त मुकुल धरकर एक एक कन । गिन गिन घारे सुर ग्राम किरन ॥ 
अवगुंफित कही भए संपन्न । अरु किए निज  कंठालंकरन ॥ 
अपने अंजुली में अक्षरों के उन अक्षर मोतियों को  सम्भालते हुवे फिर उन्हें गिन गिन कर सप्तक स्वर के सूत्र में पिरो दिया  फिर उन्हें गूँथ कर यह कहते हुवे कि भगवन बस संपन्न हो गए, अपने कंठ को अलंकृत का लिया ॥ 

सुनौ कहत चित लाइ, प्रभु कथा चरित मैं गाउँ । 
अश्व मेध के ताइ, अस बोले सेष भगवन  ॥   
फिर भगवान शेष मुनिवर वात्सायायन से सम्मुख होकर बोले : -- वात्सायायन जी ! अब आप प्रभु की पावन कथा के इस चरित्र को जो कि  अश्वमेध से सम्बंधित है, चित्त लगाकर श्रवण करो  ॥ 

गुरूवार, २ ८ नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                         

देव दनुज को जो दुखदाई । सोई रावन लंका राई ॥ 
दसम दस सीस भरे हँकारे । राम कमल कर भए उद्धारे ॥ 
( फिर भगवन बोले हे मुनिवर ) देवों एवं दानवों को जो दुःख देने वाला था उसी लंकापति रावण के अहंकार से भरे दस के दस सिरों का श्रीरामचन्द्रजी के कम कर द्वारा उद्धरण हो गया ॥ 

नाथ सहित तब सकल देव गन । पाए सांति धरत गत रावन ।। 
बहुरि सोइ भए मगन अनंदे । दास रूप प्रभु चरनन बंदे ॥ 
तब इंद्रा सहित सभी देवतागण रावण की मृत्यु कारित होने पर सुख प्राप्त हुवा ॥ फिर वे आनंद में मग्न होकर दास की भाँति भगवान के चरणों की वंदना  करने लगे : - ॥ 

बरस कलस कर सुमनस सोहे । कंठ कलित कल सुर सरसौंहे ॥ 
हरष एहि भाँति स्तुती गाईं । प्रभु के भाउ भगति उर लाईं ॥ 
उनकी अंजुली से बरसते पुष्प सुहावने प्रतीत हो रहे थे । कंठ में सुमधुर स्वर स्वॉप में स्व्यं माँ सरस्वती  विभूषित हुईं ॥ हर्षित  होकर प्रभु की श्रद्धा एवं भक्ति को हृदय में धारण कर इस प्रकार उनकी स्तुति गाने लगे ॥ 

रघु कैरव हे दसरथ नंदन । कुल गरुबर मनि वर तपस चरन ।। 
हे जग कारन रूप परायन । कोटि जयति जय तव नाथ जगन ॥ 
रघुकुल के कौमुद , हे दशरथ नंदन, कुल के गौरव, मणि , हे कुल श्रेष्ठ, हे तपस्वी ॥ हे परमेश्वर !,हे विष्णु स्वरुप, हे जगत के नाथ तुम्हारी करोडो जय जय कार हो ॥ 

 रघुउद्वह द्वंद हरन, हे जग कलिमल हारु  ।  
भव काइ के तुम भूषन, भग नंदन अवतारु ॥   
रघुवंशियों मन प्रधान, हे ( राग-द्वेष, हर्ष-शोक,जन्म-मृत्यु आदि ) द्वंदों को हारने वाले हे जग से पापों को दूर करने वाले । हे विष्णु के अवतार यह संसार काया है, आप उसके भूषण स्वरुप हैं ॥ 

शुक्र /शनि , २९/३०  नवम्बर, २ ० १ ३                                                                                          

हे जानकीशं वल्ल्भम् । जीवन रमण जनार्दनम् ॥ 
हे जगदाधार नन्दनम् । धातृ विश्वविश्रुत वन्दनम् ॥ 
हे माता जानकी के ईश्वर हे माता जानकी के प्रियतम हे रामचन्द्र । हे जगत के आधार स्वरुप हे जगत को धारक, सर्व प्रसिद्ध सर्वत्र पूज्यनीय परमेश्वर ॥ 

मुख ओज मनोज अगणित ।श्रवण सहस्रम् बहु विदश्रुत ॥ 
शीश कलश कुंतल कलितम् । मुनि रूप शालिन सम्पदम् ॥ 
अनगिनत काम देव के ओज मुखी, सहस्त्र कारणों से वेद श्रुति आदि श्रवण करने वाले महाकोविद॥ शीर्ष कलश पर कुंतल सुशोभित किये हुवे हे रूपवान मुनि स्वरुप ॥ 

कर्पूर गौरं चन्द्रो वर्णम् ।  जनक धिय निलय निवासितम् ॥ 
पीताम्बरं नवम्बु धरम् । कल कंत काय कलेवरम् ॥
कर्पूर एवं चंद्रमा के सदृश्य गौर वर्ण जनक पुत्री श्री जानकी के हृदय में निवासित प्रभो ॥ पीले वस्त्र  से युक्त आपकी कायाकृति की कांति नवल घन को धरान किये है ॥ 

नीलांगंजनोत्पलम् । सरिल सील नील सागरं ॥
भुजांतरम भृगु रेखितम् । ललाटूल ललाम ललितम् ॥ 
जिसके अंग चंचलानीली ज्योति, नीलम रत्न एवं सागर के शांत नीले वर्ण की आभे दे रहें हैं ॥ ह्रदय भवन पर भृगु के चरण रेखाएं और मस्तक पर का चिन्ह अति मनोहर है ॥ 

लोकावलोकालोकितम् | तव मन्दस्मित ज्योतिरम् || 
भव बन्धन् नयन भङ्जनम्  | पल्लव् पट यत् मुक्ति पत्रम् || 
संसार में जो आलोक अवलोकित है वह आपकी मंद स्मिति की ज्योति ही है ॥ नयन भाव बंधन के भंजनकारी हैं एवं पलक पट ऐसे हैं जैसे वे मोक्ष के पत्र हों ॥ 

हे इन्द्रादि सुरार्चिते ।  नारदादि मुने वन्दिते ॥ 
शार्ङ्ग् धन्वाति शोभितम् । कपिश यूहत्व सुयोगितम् ॥
हे इन्द्रादि देवताओं से अर्चनीय, नारदादि मुनियों द्वारा वन्दनीय देव ।  आप वानरों के समूह से सुंदरता पूर्वक युक्त हैं एवं आपके हाथ में सारँग  धनुष अत्यधिक शोभा दे रहा है ॥ 


हे सर्वान्तर्यामिनक्ष ।  हे सर्वान्तरस्थध्यक्ष ॥  
सर्व सार स्वरूप जन हितम् । हे कौशल्याप्रियतनयम् ॥ 
सब पर दृष्टी रखने वाले हे अन्तर्यामी ईश्वर । सब के अंतस में निवासित हे जगत नियंता ॥ जगत के सार स्वरुप सभी जनों का हित करने वाले माता कौशल्या के प्रिय पुत्र ॥ 

मर्यादित पुरूषोत्तम । नमामि शरणम् त्वामहम् ॥ 
रामाख्यमीशं हरिम । वन्देSहं नमत नतोSहं ॥
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र हम आपको नमस्कार कर आपके शरणागत हैं ॥ राम कहलाने वाले भगवान हैम नत  मस्तक होकर आपकी वंदना करते हुवे प्रणाम करते हैं ॥ 

हे राघवच्युतानंद, बोधित त्वं अनीह । 
हे निच्छल अकिंचन तव, सर्वार्थ पुजनीह ॥ 
हे राघव आपका आनंद नित्य और अक्षुण्य है आप परम बोधित एवं कामनाओं से मुक्त हैं । हे निश्छल हे सर्व त्यागी, आपके समस्त विषय वन्दनीय हैं ॥ 

रविवार, ०१ दिसंबर, २०१३                                                                                       

तासुहु पर रघुबर अधिठाई । भयउ बिभीषन लंका राई ॥ 
होवत कृत कृत कहि मृदु बानी । दया सील प्रभु सारँगपानी ॥ 
रावण वध के पश्चात रघुवर द्वारा प्रतिष्ठापित होकर विभीषण लंका के राजा हुवा ॥ इस प्रकार का सम्मान प्राप्त कर वह कृत कृत हो गया और मृदुल वाणी से कहने लगा सारंग नामक धनुष धारण करने वाले हे दयाशील प्रभु ॥ 

किरपा कारत जनम सुधायो । तव असीस मम सीस धरायो ॥ 
रहहि न मोरिहि किरपा कोई । अस कह प्रभु मुख समितम् लोई ॥ 
आपके कर आशीष मेरे शीश पर इस प्रकार रखा गया की वह कृपा करता गया और मेरा जन्म सुधरता गया ॥ मेरी कोई कृपा नहीं थी ऐसा कहकर प्रभु के मुख पर मंद स्मित सुशोभित हुई ॥ 

सब दृग तव सों एहि कर होंही । तुहरे प्रसंग सत सन सोही ॥ 
सुनत बिभीषन प्रभु  के बचना । भाव प्रबन हो लिए धरि चरना ॥ 
तुम्हारे पक्ष में सारी दिशाएं इस हेतु अनुकूल हुई कि तुम्हारा प्रसंग सत्य के साथ शोभित था ॥ ऐसे वचन सुनकर विभीषण भावुक हो गया और उसने प्रभु के चरण पकड़ लिए । 

तिन नय नीति देत अति गूढ़े । तेहिहि पुष्पक जानारूढ़े ॥ 
कपि पत हनुमत  राजित होहे। लखमन प्रभु सिय संगत सोहे ॥ 
मार्ग दर्शन स्वरुप में  उसे अतिशय गूढ़ नीतियां का ज्ञान देकर फिर प्रभु उसके पुष्पक विमान में आरूढ़ हुवे ॥ श्रीरामचन्द्रजी संग माता सीता के साथ सुग्रीव, हनुमान, लक्ष्मण आदि भी विराजित हुवे ॥ 

तासु परंत असोक बाटिके । डारत तरु दीठ पलक अलिके ॥ 
लंकापुर सौं पीठ फिराने । सँजोवइ अवध हूँत पयाने ॥ 

तों बिभीषन मनोभवन, बिरह डरत भरि कंठ । 
भगवन के सोंह जावन, भए अतिसय उत्कंठ ॥ 
उस समय विभीषण के मनो भवन में प्रभु से विरह का भय वासित हो गया उसका कंठ भर आया । भगवान के साथ जाने के लिए वह भी उत्कंठित हो गया ॥ 

बिभीषन के तिलक बदन, दरस बिरहनी रंग । 
अपनाए हरिदै लगाए, प्रभु तिन्ह लेइँ संग ॥  
विभीषण के तिलक युक्त मुखाकृति पर विरह के रंग देख फिर प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने विभीषण को अपना कर हृदय से लगाते हुवे अपने साथ ले लिया ॥ 

 भगवन मुख तेजो रूप , बिकिरित चहुँ दृग कोर । 
राग धरत अस्तुति करत, बिधि पुल पुलकि बहोर ॥ 
तब भगवान के मुख का  तेजो रूप चारों दिशाओं में प्रस्तारित हो गया । ( भगवान के ऐसे दर्शन प्राप्त कर ) सृष्टि के रचेता ब्रह्म प्रसन्न एवं पुलकित होते हुवे एवं छ: रागों से युक्त होकर भगवन की स्तुति करने लगे ॥ 

सोम/मंगल , ०२/०३  दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                        

चले अवध सिय सों रघुराई । होंहि सगुन सुन्दर सुख दाई ॥ 
बैठे जुगवइ गगन बिहंगे । सिंहासन मनि रचि बहु रंगे ॥ 
फिर सभी को एकत्र कर, पुष्पक विमान स्वरुप उस नभोचर के माणिक्य रचित बहुरंगी सिंहासन पर विराज कर प्रभु माता सीता के साथ अवध को प्रस्थान किये ॥ 

ज्योतिर मंडल ज्योति जगाए । अर्धयार्च नीराजन गाए ॥ 
नखत नेमि नत पंथ दरसाए । उदइत उदरथि देइँ बधाई ॥ 
( उनके गमन से ) नक्षत्र मंडल में ज्योतियां जागृत रहीं । वे प्रभु की आराधना कर वन्दना एवं आरती गाने लगीं ॥ ध्रुव तारे ने नभ में प्रभु का पथ प्रदर्शन किया । उदधि एवं सूर्यदेव उदयित हुवे एवं उन्हें अवध लौटने की बधाइयाँ देने लगे ॥ 

संगत किए ब्रह्मादिहि देवा । वीना वाद वदन सुर सेवा ॥ 
ढोर पखावज दुंदुभि बजाए । बहु रित मधुरित  करन सुख दाइ ॥ 
ब्रह्मादि देव उअनके साथ थे । वे वीणा वादन करते सुरों से उनकी सेवा करते चल रहे थे ॥ ढोल पखावज दुंदुभि आदि वाया यन्त्र बहुंत रीतियों से बजते हुवे सुमधुरित होकर कानों को अति प्रिय लग रहे थे ॥ 

चलत बयारि त्रिबिध चहुँ फेरे । बारि बारि सुर पत आ घेरे ॥ 
कलरव कर जब सिंधु ढँकयाए  । परसन चरन तरंग उठ आइ ।। 
चारों और त्रिबिध (शीतल,मंद,सुगंध)वायु प्रवाहित हो रही थी । दर्शन के लोभ में इंद्र देव प्रभु को वारंवार घेर लेते ॥ कोलाहल करते हुवा विमान ने जब समुद्र को लांघा तब उअनके चरण सपर्श हेतु तरंगे उत्कंठित हो उठी ॥ 

देखु देखु इँह सेतु बँधायो । हरष प्रभु जानकिहि देखायो ।। 
जब रामेस्वर थरी दरसाए । नमत नयनन सिय जल भर लाइ ॥ 
देखो देखो यहाँ सेतु बंधा है फिर प्रभु श्रीराम चन्द्र ने माता सीता को अत्यंत ही हर्ष पूर्वक बंधा हुवा दस्तु दिखाया ॥जब अपने कर कमलों से स्थापि किये रामेश्वर धाम के दर्शन करवाए तब ( प्रिय के अपने प्रति प्रणय के दर्शन कर ) प्रणयित होते हुवे सीता की नयनों में जा भर आए ॥ 

सौह्रदय  निधि करुना निधाने  । बसइ भ्रात सन जिन अस्थाने ॥ 
चिंतत चिन्हत सिया दरसाए । चित्रनहार पलकन पहनाई ॥ 
सद्भाव संपन्न एवं करुणा के भण्डार श्रीरामचन्द्र ने हरण काण्ड के पश्चात लघु भ्राता लक्ष्मण के साथ जिन जिन स्थानों पर निवास किया  ॥उन स्थानों के स्मृति चिन्हों  को माता सीता के दृष्टिगत  कर उनका चित्रात्मक वर्णन का हार माता की पलकों में पहनाते चले ॥ 

तरत गगन बहु  बेगि बिमाना । पयोधि पारग जात न जाना ॥ 
दंडकारन आवत अचिराए । कुंभजादि मुनि सोंह मिलबाइ ॥ 
गगन में विमान अत्यधिक तीव्रता से तैर रहा था । उदधि कब पार हो गया यह ज्ञात न हुवा शीघ्र ही दंडकारण्य आ गया फिर भगवान ने अगस्त्य आदि मुनिवर से माता की भेंट करवाई ॥ 

चलि आगिन तिन कर परनामा । आए चित्रकूट के कल धामा ॥ 
दोइ पद पर कलि हर मलियाए । कल कल करत कालिंदि सुहाइ  ॥ 
उअनके चरणों में प्रणाम प्रणिधान  कर फिर प्रभु आगे बड़े तो चित्रकूट का सुहावना धाम आ गया  ।  दो ही चरणों की दूरी पर कल कल करती पापहरणी साँवली सलौनी कालिंदी के दर्शन मनोहर लगे ॥ 

छन सिय लोचन नाथ निहारी । कहि भए मम पिय गगन बिहारी ।। 
दूर नुपूर सुर सरि सरसाए । सिय सिरु नावत कंठ लगाई ॥ 
एक पलक को माता सीता के नयन प्रियतम को निहारे वह मन में कहने लगी हमरे प्रीतम गगन में विहार करने वाले हो गए ॥ दूर गंगा जी के नुपूर स्वरुप जल बिंदु सुहावने लगे तब माता सीता नत मस्तक होकर उन्हें कंठ से गा लिया ॥ 

देखु कहत प्रभु तीरथ राजा । तिनके दरसन भा बर काजा ।।  
पवित पौरि सुर पँवरपैठाए । अरु देखु बेनि अघ हरनाई ॥ 
फिर प्रभु ने खा देखो यह तीर्थों का भी तीर्थ प्रयागराज है इसके दर्शन प्राप्त कर बड़े से बड़े कार्य भी सिद्ध हो जाते हैं । इसकी पवित्र पथ -सोपान सीधे स्वर्ग पहुंचा देते हैं और पापों का हरण करने वाली यह त्रिवेणी ( गंगा, यमुना एवं सरस्वती नदी का संगम स्थल ) देखो ॥ 

पैठ अवध सिय (सों) रघुराइ,  प्रनत बेनि ( त्रिवेणी ) अन्हाइ । 
सकल स्वजन सहि बिप्रवर, दिए बहु बिधि अनुदाइ ॥ 
और अवध देश में पहुँच कर माता सीता एवं प्रभु श्रीराम ने त्रिवेणी को प्रणाम कर पुनीत स्नान किया । फिर समस्त स्वजनों  आकांक्षित जनों की बहुंत प्रकार से सहायता की ॥ 

मग मह नेकानेक, प्रभु मुनि सत भामिनि धाम । 
तिनके पुत परबेक, प्रिया दरसन  दात चले ॥ 
मार्ग में मुनियों की पतिव्रता स्त्रियों एवं उनके श्रेष्ठ पुत्रों से युक्त अनेकों आश्रम थे प्रभु ने अपनी प्रियतमा को उनके भी दर्शन करवाए ॥

बुध /गुरु ,०४ /०५ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                            

एहि बिधि पथ पथ प्रभु सिरु नावा । अवध पुरी के दरसन पावा ॥ 
भरत सुरति पुनि प्रभु चित राते ।  तिन नन्दि गाँउ दिरिस निपाते ॥ 
इस प्रकार पंथ पंथ पर शीश नवाते,प्रभु को अवध देश के दर्शन प्राप्त हुवे । फिर लघु भ्राता भारत के समान से चित्त को आसक्त करते हुवे उस नंदी गाँव में दृष्टिपात किये : --  

जहाँ भ्रात बर जनित बिजोगित । अतुल दुःख मई चिन्हन जोगित ॥ 
धर्म पाल प्रभु आवन आसे । कैकेई सुत करैं निबासे ॥ 
जहां अपने ज्येष्ठ भ्राता के वियोगजनित अनेकों दुखमय चिन्हों को योगित किये हुवे, प्रभु के आने की आशा में कैकेई पुत्र  धर्म पालक राजा भरत निवास कर रहे थे ॥ 

ब्रह्म चरन मुनि भेस रचाई । जटा  सीस बलकल तन लाईं ॥ 
करत गरक भुँइ तहहि सयनाए । अस बै भयउ सोइ कृष काए ॥ 
जो ब्रह्मचर्य होकर मुनियों का वेश रचाए हुवे थे । उनके शीश पर जटा विराजित थी और तन वल्कल वस्त्र धारण किये हुवे था ॥ वह भूमि में गर्क करके वहीँ सयन करते थे ऐसी विकल अवस्था में उनकी काया क्षीण हो गई थी ॥ 

गहहि न अनकन जोग जवारा । लहहि न पयसन बारहि बारा ॥ 
उदयित उदरथि धनबन जेई । सिरु नमनत सो कहतै तेई ॥ 
वे जौ के जितना भी अन्न ग्रहण नहीं करते और वारंवार जल भू मुख से नहीं लगाते ॥ आकाश में जैसे ही सूर्यदेव उदयित होते । तब वे उन्हें प्रणाम कर कहते : -- 

हे सहस किरन, ललामिन बदन , जगलग जगमग जारते । 
कर दान नयन, बरदान दयन, जोत जगत जगारते ॥ 
भूमि भास्वन, देव भानुमन, मम मह पातक हरयो । 
अस कहत भरत, प्रनमत प्रनिपत ,द्यु पत पुनि पद परयो ॥ 
हे सहस्त्रों कारणों वाले, लाल मुखी , समस्त संसार को जगमगाने वाले , जगत को नयन प्रदान कर ज्योत का वरदान देकर उसे नित्य प्रति जागृत करने वाले देव । हे भूमि के प्रकाशमान सूर्यदेव मेरे महान पातकों का हरण कीजिये ( हाय! मुझसे बड़ कर पापी कौन होगा ) ऐसा कहते हुवे फिर राजा भरत झुककर उन प्रभा पति सूर्य के चरण पकड़ कर उन्हें (पुन:)प्रणाम अर्पित किया ॥ 

अह मम कारन, जगती वंदन, राम चन्द्र बन गवने । 
बहु सुकुमारी, कोमल कारी, सिय सेबित तँह बसने ॥ 
धरनी जाता,  जिनके गाता, सुमनस सेज सइनई । 
परस कमलिनी, के मृनालिनी, जो ब्याकुल लहनई ॥ 
आह ! मेरे कारण  समस्त संसार में पूज्यनीय भगवान श्री रामचन्द्रजी वन में जाना पड़ा । सुकुमार काया वाली माता सीता से सेवित होकर उन्हें वहीं निवास करना पड़ा ॥ आह ! माता सीता, जिनका शरीर पुष्पों की शय्या में शयन करने पर भी कमलिनी के कोमल डंठल के स्पर्श मात्र से जो व्याकुलित हो उठती थीं ॥ 

पतिब्रत रूपा, जो रबि धूपा, सदन चरन न बाहिरी । 
जनक किसोरी, करनी मोरी, सो बिपिन भटकत फिरी ॥ 
पसु बन पेखे, चितरन लेखे, जो अति भयभीत भईं । 
तिन सों लाखे , सौमुख साखे, कवन नयन मिलावई ॥ 
 जिन पतिव्रता रूपिणी के चरण सूर्य की धूप में रनिवास से बहिर्गत न हुवे । वही जनक पुत्री आज मेरी करनी से विपिन में भटकती फिर रहीं हैं ॥ चित्र लेखाओं में भी  जो वन और उसके पशुओं को देखकर अत्यधिक भयभीत हो जाती थीं वही  जब  उनके सम्मुख साक्षात स्वरुप में प्रकट होते होंगे  तब वह  नयन कैसे मिलाती होंगीं ॥ 

जो मधु धूरी, पूरन पूरी, सों पाक पर्क पुरिते  । 
फर खर्जूरी, भूरिहि भूरी, जिनके रसन बिसरिते ॥ 
तिन्ह के हुँते सोइ बहूँते, याचन कर बनभँवरी । 
बसि ते देसा, तपसी भेसा, बसइ जोइ बनसँवरी॥  
जो खांड  से मधु-पर्क युक्त भरे पुरे पकवानों को एवं फल खजूरों की अधिकता से जिनकी जिह्वा अनुरक्त होकर विरक्त हो गई थीं, अब वह उन्हीं वस्तुओं के लिए अतिशय याचना करती वन वन फिर रही हैं । जो बन संवर कर अयोध्या देश में बसी थीं अब वह तपस्वनी का वेश धारण कर वन में जा बसी ॥ 

एहि बिधि प्रभु पद प्रीति धर, उदयित उदरथि प्रात । 
प्रणमत तिन्ह निसदिन कहत, भरत राउ अस बात ॥ 
इस प्रकार प्रभु श्रीराम के चरणों में अनुराग रखते राजा भरत, प्रतिदिन सूर्योपस्थान के पश्चात प्रणाम कर सूर्यदेव के सम्मुख उपर्युक्त बातें कहा करते थे ॥ 

शुक्रवार, ०६ दिसंबर, २०१ ३                                                                                           

तिनके सुख दुःख भाजनहारे । सुधि सचिव नय बिद चतुरारे ॥ 
हारे हिय जब धीरजु देईं । कछु कहतहि दिए उतरू तेई ॥ 
 उनका सुख-दुःख बांटने वाले,शास्त्र कुशल,नीति-निपुण ,राजनीति के ज्ञाता सचिव जब हारे ह्रदय को सांत्वना देते हुवे कुछ कहते तब भारत उन्हें इस प्रकार उत्तर देते : -- 

मैं हत भाग हे मह अमाता । करौ न मम सन तुम को बाता ॥ 
सबहि सोंह मैं अधम अहाहूँ । मम करनी प्रभु ताप लहाहू ॥ 
हे अमात्यगण ! मैं भाग्यहीन हूँ अत: आप मुझसे कोई वार्तालाप न करो । मैं सभी जनों से अधम हूँ, कारण कि मेरी करनी से ही आज मेरे भ्राता वन में कष्ट उठा रहे हैं ॥ 

तिन पातक कारन पछतावा । मैं हत भागी औसर पावा ॥ 
एतदर्थ मैं प्रभु पद निरंतर । कारहुँ दूषन सुधि सुमिरन कर ॥ 
मुझ हतभागी को उनको  कष्ट देने के पाप का प्रायश्चित करने का यह अवसर प्राप्त हुवा है । अत: मैं प्रभु के चरणों का निरंतर स्मरण कर अपने दोषों को शुद्ध का रहा हूँ ॥ 

एहि बिधि भरत भ्रात अनुरागे । बसि जँह निसदिन बिलपन लागें ॥ 
निरखत प्रभु तेइँ नन्दि गाँवा । पैठत पौर पँवर सिरु नावा ॥ 
इस प्रकार भरत अपने ज्येष्ठ भ्राता के प्रति अनुराग रखते हुवे जिस स्थान पर वास कर प्रतिदिन विलाप करते थे उसी नन्दि ग्राम के दर्शन कर और वहाँ के पुर में प्रवेश कर उसकी पौड़ी पर प्रभु नतमस्तक हो गए ॥ 

प्रभु के चित भरत दरसन, भइ अतिसय उत्कंठ ॥ 
नंदि गाँव भीतर गमन, कहत सेष कल कंठ ॥ 
भगवान शेषजी ने मधुरित,मंद  स्वर में कहा, मुने ! नन्दि ग्राम के अंतर प्रेवश करते ही फिर प्रभु का चित्त भरत के दर्शन हेतु अतिशय उत्कंठित हो उठा ॥ 

शनिवार,०७ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                                    

बहुरि धरमात्मन अगुताई ।  लघुत भ्रात फिरि फिरि सुरताई ।। 
भए सों हनुमत कहि प्रभु ताही । गवनु तुम मम भ्रात के पाही ॥ 
फिर प्रभु धर्मात्माओं में अग्रगण्य अपने लघु भ्राता  को वारंवार स्मरण करने लगे । और वीरबली हनुमान के सम्मुख होकर प्रभु ने उनसे कहा हे वायुनंदन तुम मेरे भ्राता भरत के पास जाओ ॥ 

धार बिरह सो मोरी माया । तप का कृष भइ तिनकी काया ॥ 
सिरु मुकुट जटा बलकल भेसे । पर तिय मात जिनके निमेसे ॥ 
वह मेरे मोह के वियोग तप में क्षीण होकर दुर्बल  हो गया है ॥ वह वल्कल वेश धरन किये हुवे है उसके शीश पर जटाओं का मुकुट विराजित है । जिसके लिए पराई स्त्री माता के सदृश्य है ॥ 

सुबरन जिन हुँत धूरि अटाला । नेह दिरिस जोई जनपाला ॥ 
सोइ धर्मी भ्रात दुखियाई। तनमन बिरहन अगन जराईं ॥ 
स्वर्णादि बहुमूल्य धातु जिसके लिए धूल की ढेरियां है । स्नेह दृष्टि धारी वह राजा जन जन का पालक है अर्थात जनता जिसके लिए संतान के सदृश्य है ॥ वह पुण्यात्मा मेरा भ्राता अभी मेरे वियोग में दुखित है । उसका तन और मन इस विरह की अग्नि में जल -जल उठा है ॥ 

कहि प्रभु याचत हे हनुमंते ।  एतदर्थ तौं गवनउ तुरंते ॥ 
बिरह तपन  दुःख तपन ज्वाला । वरनार्नव बर बारि माला ॥ 
प्रभु श्री रामचंद्र ने फिर याचना पूर्वक कहा  हे वायुनंदन अत: इस समय तुम शीघ्रता पूर्वक जाओ । वह विरह सुरु स्वरुप है उस विरह का दुःख उसकी  ज्वाला है । वर्ण-समुद्र से वाणी की जल माला का वरन कर : -- 

तुम घन बन आवन संदेसे । गहनत घनघन बिरहन देसे ॥ 
झर झर तिनके जरन बुझाहू । नेह सहि जे उदंत सुनाहू ॥ 
तुम मेरे आगमन-सन्देश के बादल का रूप धरकर उस विरह के प्रदेश में गहन गम्भीर होते हुवे झर-झर कर उसकी विरह ज्वाला को शांत करना, तथा सनेह सहित उन्हें यह समाचार सुनाना ॥ 

कहहु लखमन कपीसादि, जानकी संग जानि । 
राजत जान नभ पथ चर, तुम्हरे पाहि  आनि ॥ 
कहना लक्ष्मण, सुग्रीव आदि कपीश्वरों सहित माता सीता को साथ लेकर तुम्हारे भ्राता श्रीराम विमान में विराजित होकर गगन पथ से चलते हुवे तुम्हारे पास आ पहुंचे हैं ॥ 

रविवार, ०८ दिसंबर,२०१ ३                                                                                               

परम सुबधित रघुबर कहिन्हे । पवन तनय सिरौधर लहिन्हें ॥ 
चिन्हत भरत गाँव प्रभु लेखे । पैठत तँह जे दरसन देखे ॥ 
परम बुद्धिमान श्रीरघुवीर के कथन को पवन पुत्र हनुमान ने शिरोधार किया और मन की गति से प्रभु के समझाए चिन्हों के आधार पर भरत के निवास स्थान नन्दिग्राम को गये वहाँ उन्होंने यह दृश्य देखा ।। 

तिनके हिय प्रभु पदारविंदे । भयउ गहन निमग्न मकरंदे ॥ 
नयज्ञ सचिव निज कछु कह कारत । कातर दिरिस  ऐसेउ भासत ॥ 
उनका हृदय प्रभु के चरण कमलों के मकरंद में गहरे डूबा हुवा है और वह अपने नीति-कुशल सचिवों से कुछ वार्तालाप कर रहे हैं उनकी कातर दृष्टी ऐसी आभास दे रही थी ।। 

जनु बिधि सकल सदगुन सकेरे । तिन्ह धर्म मूरति कृति केरे ।। 
दरस भरत सरूप अभिरामा । हनुमत तिन्ह सों किए प्रनामा ॥ 
मानो विधाता ने समस्त सद्गुणों के संकलित कर उन धर्म -मूर्ति भरत की रचना की हो । उनका ऐसा अभिराम स्वरुप देखकर महाबली हनुमान फिर उनके सम्मुख प्रणाम अर्पित किये ॥ 

दरसटी अतिथि ठारि निज ठौरे । उलसित उरस कलस कर जोरे ॥ 
कौन तुम अगंतुक पूछेईं । तब हनुमत निज परचइ देईं ॥ 
भरत ने देखा जब उस अतिथि सारूप को देखा तब वह अपन स्थान पर खड़े हो गए और उल्लसित ह्रदय से हस्त मुकुल योगित कर पूछा हे आगंतुक तुम कौन हो ? तब वीर हनुमंत ने अपना परिचय दिया ॥ 

जान तिन लखि अस भरतांबे । डूबतइ मनहु तृन अवलम्बे ॥ 
बोलेइ पुनि  त्वं स्वागतम । अहहि कुसलई कहौ भात मम ॥ 
उनका परिचय प्राप्त कर राजा भरत के लोचन ऐसे दर्श रहे थे मानो में डूबते को तिनके का सहारा था ॥ फिर वे बोले हे हनुमंत आइये आपका स्वागत है कहो मेरे भ्राता कुशल से तो हैं ? 

नयन घन आलबाल ,भरे ह्रदय भरत जनेस । 
घारत नीरज माल, बलीमुख कंठ कलित किए ॥  
 नयनों में गहन मेघ लिए फिर राजा भरत करुणार्द्र हो कर  बलीमुख श्री हनुमंत के कंठ को अश्रु बिंदुओं की मुक्तिक मालाओं से विभूषित किया  ॥ 

सोमवार, ०९ दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                                   


भाव प्रबन कपि भरत निहारे । बोलेइ अस बरे अश्रु हारे ॥ 
लखमन सहि तव राम पधारे  । बिरह जरन जिमि सुधा फुहारे  ।। 
वानरराज भावुक होते हुवे भारत को निहारने लगे । उस अश्रु  के हार का वरन कर फिर विरह जलन में अमृत सींचते हुवे उन्होंने ऐसे वचन कहे : - हे भरत तुम्हारे राम, लक्ष्मण सहित पधार रहे हैं ॥ 

सुनत भ्रात आवन संदेसे । भए हर्षित कुल दीप दिनेसे ॥ 
कहि प्रभु उदंत लावनहारे । का प्रनिधानउँ कर तुम्हारे ॥ 
भ्राता के आगमन का सन्देश सुनकर सूर्यवंश के दीपक राजा भरत हर्षित होकर कहने लगे : -- श्री राम के आगमन का सन्देश लानेवाले हे हनुमंत ! मैं तुम्हें क्या अर्पण करूँ ॥ 

अस न सँजोउ को मम पाहीं । जे प्रिय उदंत के प्रति दाहीं ॥ 
तुम मम पर जो किरपा कारे । जिउ लग रहहुँ किंकर तुहारे ।
मेरे पास ऐसी कोई वस्तु नहीं है जो इस समाचार का प्रतिदान हो ॥ यह सन्देश सुनाकर तुमने मुझ पर जो कृपा की है उसके प्रतिफ में मैं जीवन भर तुम्हारा दास रहूंगा ॥ 

प्रभु आवन कथन जब करनन पाए । प्रमुदित उदित सब धावत आए ॥
बिरध सचिव सह बसिष्ठ महरिषि। लिए अर्घ द्रोन आए कर हरषि ॥
पुरवासियों ने जब प्रभु के आने की बात सुनी तो वे उठ उठ कर दौड़े चले आए ॥ वृद्ध साचोवों के साथ महर्षि वशिष्ठ भी दोनों हाथों में अर्घ पात्र लिय हर्षित होते हुवे चले आए ॥ 

हनुमत जी दरसाए पथ, चलि सब मंगल गात । 
तबहि भरत लोचन लखे, राम मनोहर आत ॥ 
और महावीर हनुमान के दर्शाए हुवे पथ पर सभी पुर वासी एवं मुनि गण मंगलगान करते चले ।  तभी भरत की दृष्टि ने परम मनोहर भगवान श्रीराम को देखा ॥ 

मंगलवार, १ ० दिसंबर, २ ० १ ३                                                                                 

लखमन सोहत बाम बिराजे । सिय दाहिन प्रभु बिचवइ साजे ॥ 
भेस मुनिस धर मुख अवसादे । दरसै प्रभुहू भरत पयादे ॥ 
लक्ष्मण बाईं और विराजते हुवे शोभित हो रहे थे माता सीता दीहिनी ओ प्रभु श्री राम स्वयं मध्य में शोभा दे रहे थे ॥ वल्कल वेश शीश पर जटा मुकुट धारण किये तथा मुख पर अवसाद लिए राजा भरत को भी श्रीरामचन्द्रजी ने पयादे ही आते देखा ॥ 

तिन्ह के सन सचिवन्ह देखे । तासु तनहु मुनि रूपन रेखे ॥ 
तेहु निरंतर तापस किन्हें । यहु कर काया कृष करि लिन्हें ॥ 
साथ ही उनके सचिवगण को भी देखा । उन सचिवों ने भी अपने राजा के सदृश्य मुनि के जैसा ही वेश धारण कर रखा था ।  वे भी निरंतर तप का आचरण करते थे इस कारण उनकी काया भी अत्यधिक दुर्बल हो गई थी ॥ 

दरसत दुर्गति भरत नरेसे । भए रघुबर के मनस कलेसे ॥ 
नयन पतिका पलक हिंडोले । रिसत निलय दुइ जलकन दोले ॥ 
भरत कि ऐसी दुर्दशा को देखकर श्री रघुवीर के मन में अत्यधिक पीड़ा हुई उनके नयन पकि पत्रिका -पलक के झूलों पर हृदय से रिस कर जल के दो कण झूलने लगे ॥ 

चिंतत प्रभु पुनि बोलन लागे । देखु दसा का कारि अभागे ॥ 
अस बनचर धरे न हम लोगे । जैसेउ भरत के जी भोगे ॥ 
(भरत कि इस अवस्था को देखकर )फिर प्रभु श्रीराम चिंतित होकर कहने लगे देखो राजाओं के भी राजा महा बुद्धिमान दशरथ के अभागे पुत्र भरत ने अपनी क्या दशा कर ली है ।  जैसे दुःख मेरे वियोग के कारण इस भरत के अंतस ने भोगा, वैसे दुःख  हमने वन में विचरण करते हुवे भी नहीं भोगे ॥ 

उत भरत के हस्त बढ़े  ,इत रघुबर के पाँउ । 
रमा रमन अनुसरन किए, प्रगसत आदर भाउ ॥  
उधर भारत के हस्त कमल बढ़े इधर श्री रघुवर के चरण बढे । रमा आदर भाव प्रकट करते हुवे अपने प्रिय का अनुशरण कर रही थीं ॥ 

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