Thursday, 31 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 11 ॥ -----

-----|| राग मेघ-मल्हार || -----

घेरि घटा घन  घनकत घोरा |
छाए पिया पावस चहुँ ओरा || १ ||

थिरकत नदि जल झर झर झरे, पाँउ परे झनकत रमझोरा || २ ||

भर घमंड ए काल न देख्यो, बिनु नूपुर नाचहिं बन मोरा || ३ ||

बँट दै तरुवरि हरिअरि रसरी, पाए पवन हलै रे हिँडौरा  || ४ ||

ढूँढत जलनिधि सुध बुध भुल्यौ, पँवर पँवर भँवरत चितचोरा || ५ ||

साँझी दिवस सोंहि गठ जोरे, परिनय करत रैन अरु भोरा || ६ ||

दूरबा कर  बिछेउ बिछौने, तपन ऋतु कर न होए बहोरा || ७ ||

रमझोरा = घुंघरू
पँवर पँवर = द्वार-द्वार
चितचोरा = घनश्याम
पँवरहि = ढूंढ़ना

भावार्थ : - घटाओं से घिरा घन  घोर गर्जना कर रहा है | हे प्रीतम ! पावस ऋतू सर्वत्र व्याप्त हो रही है || १ ||  नदी नृत्य करती हुई सी प्रतीत हो रही है  झर  झर झरती हुई वह  इस भांति ध्वनि उत्पन्न कर रही है मानो उसके चरणों में नूपुर झंकृत हो रहे हैं || २ || घनता के  घमंड के वशीभूत इसने काल भी नहीं जिससे वन में मोर विभ्रमित हैं एवं पावस के आगमन का भ्रम लिए नूपुर के बिना ही नृत्य कर रहे हैं  || ३  || तरुवर भी बेल रूपी हरी हरी रसरियों को बँट  दे रही हैं पवन की संगत प्राप्त कर मानो इन तरुवरों में हिंडोले हिल्लोल रहे हैं | चित का हरण करने वाले ये  घनश्याम असमय मित्रों के साथ  क्रीड़ा की आशा से द्वार द्वार पर भ्रमण कर रहे हैं इसे ढूंढते ढूंढते  जलनिधि की  सुध बुध विस्मृत हो गई किन्तु यह नहीं मिल रहे || ५ || विवाह का  नहीं तथापि संध्या दिवस के साथ परिणद्ध हेतु आतुर है | रैन आओर भोर तो परिणय वेदी पर विराजमान हो गए हैं || दूर्वा के सुन्ब्दर बिछौने बीच गए तथापि तापस ऋतू का पग फेरी नहीं हुई है || 


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-----|| राग मेघ-मल्हार || -----

घेरि घटा घन घनकत घोरा |
छाए पिया पावस चहुँ ओरा || १ ||

बेनु हरित अहि बेलरि डारै | बंदनिवारे परे दुआरे ||
भयउ मगन मन मोदु न थोरा || २ ||

काल घना की काजर पूरी | माँग भरे भइ साँझ सिँदूरी ||
दिसत झरोखै करत निहोरा || ३ ||

बरसि बरसि बादल पनिहारे | भर भर कलसि करषि कर धारे ||
तृपित कंठ भा चकित चकोरा || ४ ||

अह ! यह तापस रितुवन की बेला | जलधि नभ चढ़ि करिहिं का खेला ||
उड़त पतंगिहि भँवरत भौंरा || ५ ||

भावार्थ : - घटाओं से घिरा घन  घोर गर्जना कर रहा है | हे प्रीतम ! पावस ऋतू सर्वत्र व्याप्त हो रही है || १ ||  बाँस, करीर पर पान की हरिणमय बेलें पड़ गई हैं जो बंदन वारों का रूप लेकर द्वारों को सुसज्जित कर रही हैं, यह दृश्य दर्श कर मन अतिशय प्रमुदित हो रहा है  || २ || नैनों में काले मेघों  की काजल उतारकर संध्या भी सिंदूरी हो चली है जो झरखों से संध्या वंदन करती दर्शित हो रही है || ३ || बादल वर्षा कर कर के पनिहारे का स्वांग भर लिया है प्यासे हाथों को खैंच खैंच कर मानो अमृत भरे कलश अर्पण कर रहे हैं, चकोर भी तृप्त कंठ होकर चकित है || ४ || आह ! यह तापस ऋतू की बेला है इस बेला में जलधि नभ में छाड़कर जाने कौन सा खेल कर रहे हैं पतंगे उड़ रही भौरें भंवर रहे हैं || ५ || 

उरहि पतंगी भंवरहि भौंरा = आंधी में पत्तो और धूल का बवंडर, पतंग और भौंरे (लट्टू) का खेल


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-----|| राग मेघ-मल्हार || -----

ढरती साँझ अति भाई | रे भाई !
चारु चंद्र की कनक कनी सी बिंदिया माथ सुहाई || १ ||

उरत सिरोपर सैंदूरि धूरि जगत लखत न अघाई || २ ||

अरुन रथी सों रश्मि लेइ के बीथि बीथि बिहराई || ३ ||

दीप अली दुआरि लग जौंहे लौनी लौ न लगाई || ४ ||

बिरताइ जूँ  गौ धूलि बेला रैनि चरन बहुराई || ५ ||

भावार्थ : -- अरे भाई ! ये ढलती हुई संध्या मनभावनी प्रतीत हो रही है | इसके मस्तक पर प्रिय चन्द्रमा के स्वर्ण जटित हीरक कण के जैसी बिंदिया अति सुहावनी प्रतीत हो रही है || १ || शीश पर सेंदुर की धूलिका उड़ रही है दर्शन के पिपासु लोग सौंदर्य रस से परिपूर्ण होकर भी तृप्त नहीं हो रहे || २ || अरुण राठी की रश्मियाँ लेकर देखो कैसे यह नगर के पंथ पंथ का परिभ्रमण कर रही है || ३ || दीपक की पंक्तियाँ द्वार से संलग्न हो कर प्रतीक्षारत हैं तिली अथवा इस सुंदरी ने अबतक ज्योति जागृत नहीं की ||  अब तो गौधूलि बेला भी व्यतीत हो चली है, रात्रि का आगमन हो रहा है यह अब तक नहीं लौटी || 





Tuesday, 29 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 10॥ -----

        ----- || राग-भैरवी ||-----

ओ री मोरी सजनी तुअ नैहर न जइहो | 
न जइहो न जइहो तुअ नैहर न जइहो || १ || 


मैं सावन अरु तुम बन मेहा  नेहु घन रस बरखइयो | 
मैं पावस तुम घोर घटा री  घेरि गगन गहरइयो || २ || 

मैं सागर सहुँ तुम सुर गंगा हरिदय बहि बहि अइयो |  
पेम के एहि संगम तीरथ ए तीरथ नहि बिसरइयो  || ३  || 

देइब चीठी फेरिहु दीठी जोहि बिरहि घन दइयो | 
कमनिअ कंचन कमन कनीठी मोर कनि कने पइयो || ४  || 

कनक कली कर कानन करिके मोहि न कनखि लखइयो |
कंगन कलिइन लेइ बलइयाँ  मोर कंठन खनकइयो || ५ ||

नैन झरोखे पलक पट देइ हिय गिह पिय पौढ़इयों | 
रैन अँजोरे धरै अँजुरी प्रीत करि जोत जगइयो || ६  ||

Sunday, 27 May 2018

----- ॥ दोहा-द्वादश 4 ॥ -----

भगवन के ए सबहि पंथ भगवन के संसार | 
जहँ कहँ दुःख होइ तहँ लग करुना केर निहार || १ || 
भावार्थ : - यह संसार ईश्वर का है यहाँ हमारा कुछ भी नहीं है, सभी ग्रन्थ-पंथ हमें ईश्वर तक पहुँचाने के लिए हैं, उस तक पहुंचना तभी संभव है जब हमारी करुणा -दृष्टि की पहुँच न केवल मनुष्य अपितु प्रत्येक जीव के कष्ट तक हो | 

गगन बिसाल कि सिंधु हो धरति हो कि पाताल | 
आरत पुकारि सुनिहु जौ होई तरि पद ताल || २ || 
भावार्थ : - वह धरती में हो अथवा पाताल में हो, सिंधु में हो अथवा विशाल गगन में ही क्यों न हो | ईश्वर तक पहुंचना तभी संभव है जब हम चरण तल के नीचे स्थित जीव की भी आर्त पुकार को सुनें | 

रीति प्रीति सद चरित सों जोइ ग्यानद ग्रन्थ | 
होवनिहार चरन हेतु रचत सोइ सद पंथ || ३ || 
भावार्थ : - रीति प्रीति के सह शील व् चरित्र का गठन करते हुवे जो ग्रन्थ ज्ञान दायक होते हैं वह आने वाली पीढ़ी के संचालन हेतु सन्मार्ग का निर्माण करते हैं | 

बाती बरै सार बरै बरै दीप के अंग | 
रैन उजास सब जर मुए कीर्ति धरै पतंग || ४ || 
भावार्थ : -- बाती जली तेल जला दीपक के अंग प्रत्यंग जल गए, रात्रि को उज्ज्वलित कर सभी जल कर मृत्यु को प्राप्त हुवे किन्तु नाम पतंगे का हुवा |  


अर्थात : - 'श्रम कहीं और होता है, यश कहीं और |' 

बैद मरे रोगी मरे मरे न जी के रोग | 
मार मरी न मरनि मरी मर मर गए सब लोग || ५ || 
भावार्थ : - चिकित्सक मर गए रोगी मर गए किन्तु रोग नहीं मरा | काल नहीं मरा मृत्यु नहीं मरी, लोग मरते गए | 

धनहि सेती प्रीति कियो प्रीतम दियो दुराए | 
बीति रीति बिसराए जग अजहुँ ए रीति चलाए || ६ || 
भावार्थ : - धन से अथाह प्रीति की किन्तु प्रीति के आधार स्वरूप प्रीतम को दूर कर दिया | पुरानी उत्तम रीतियां का चलन नहीं रहा लोगों में अब वही 'चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए' वाली रीति प्रचलित है | 

गेह दुआरि त्याज के  करिआ एक के तीन | 
बैसी भीतर नागिनी काम बजावै बीन || ७ || 
भावार्थ : - घर द्वार को त्याग कर सदैव एक का तीन करने में लगे रहे | अंतर्मन में कुत्सित भावों रूपी दुष्टता का निवास हो गया काम बीन बजाकर उसे जब-तब नचाता रहा |  

अति अधुनातन की रीति बिन प्रीतम की प्रीति  | 
अंतर बोल न पाइये कस को गावै गीत || ८ || 
भावार्थ : -अत्याधुनिक काल में प्रीतम विहीन प्रीति का चलन है | न इसमें बोल प्राप्य  है न अंतरे, अब इस काल का कोई गीत गाए भी  तो कैसे गाए | 

सीतौ सीते दुःख मिले तापन तापै दुख्ख | 
सावन सूखे सुख मिले काल बँधे दुःख सुख्ख || ९ || 
भावार्थ : - शीत ऋतु में शीतलता दुःख देती है तापसऋतु  में ताप दुःख देता है |  वर्षा ऋतु में सूखे से सुख मिलता है निष्कर्ष यह निकलता है कि प्रकृति जनित अनुभूतियाँ काल के अधीन है किसी काल में कोई कारक सुखद होता है  वही कारक कालपरिवर्तन पर दुखद हो जाता है | 



धर्मिन बादी पाहिला आगिल भौतिक बाद | 
झरबेरी जमुकिया न त खावै सोइ स्वाद || १० || 
भावार्थ : - मनुष्य का प्रागकाल या पूर्वकाल प्रकृतिवादी था भवितव्य काल भौतिक वादी होता चला गया, काल में केवल मात्र इतना ही परिवर्तन हुवा है अन्यथा जामुन और बेरी का स्वाद वही है जो पाषाणकाल में था अर्थात मनुष्य अब भी वनचारी प्रवृतियों से युक्त है, उसका अंतर्जगत वर्तमान में भी असभ्यता को प्राप्त है भौतिक वादिता ने केवल उसके बाह्यजगत को व्यवस्थित किया है | 

गिरही का तो रागना विरही का बैराग | 
दोउ एकै ठाउँ रहे त सुबरन पे सोहाग || ११ ||  
भावार्थ : - गृहस्थ का अनुराग और वैरागी का वैराग्य सदैव उत्तम व् कल्याणकारी होता है | जब ये दोनों एक स्थान पर प्राप्त हों तब वह सोने पर सुहागा के सदृश्य अति उत्तम व् अतिकल्याणकारी होते हैं | 

काम भरोसे होइ के  भूमि बिया दे बोए | 
फूल फल तब मिलिया जब राम भरोसे होए || १२ || 
भावार्थ : - कर्म के भरोसे होकर प्रथमतः भूमि में बीज वपन कर दिया | कर्म सहित भगवान के भरोसे ही उसे जल प्राप्त होगा और हमें फल, फूल, ईंधन,छाया, औषधि की प्राप्ति होगी  |  










Friday, 25 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 9॥ -----

होरी पतंगि  उरि कहँ जाहु, 
तुहरि प्रिया एहि कहि कर दियो पुनि रार करन पिय आहु || १ || 
छितिजिहि  पारि हियपिय पिहरियो  छितिज परस न बहुराहु 
पैसिहु गह प्रीति पूरित सब रीति री प्रियातिथि तहँ पाहु || २ || 
भेंटिहि जननी तोहि उर लाइ जलज नयन भरी बाहु | 
त मोर हरिदय कर कहनि कहहु  जनि जनित सहित सब काहु || ३ || 
कर गहि जौ  तोहि भाई भउजाइँ सलिल सनेह बरखाहु  
जोरि पानि जुग ए बिनती करिहौ  बाबुल मोहि लए लाहु || ४ || 

पतंगी = चिट्ठी,पत्रिका, पत्ती 

भावार्थ : - अरी पतंगी तुम कहाँ उडी जा रही हो ? पतंगी कहती है : - तुम्हारी प्रिय ने यह कहकर मुझे वायु के हाथ में दिया है  कि प्रियतम पुनश्च झगड़ने आ रहे हैं | ह्रदय को प्रिय पीहर क्षितिज के पार है तुम क्षितिज को स्पर्श कर लौट न आना | क्षित के पार जाना और पीहर के गृह में प्रवेश करना वहां प्रीति से परिपूर्ण रीतियों से भरे अतिथि सत्कार का सुख प्राप्त करना | जननी से भेंट करना वह तुम्हें अश्रु पूरित नेत्रों से अँकवार कर जब  अपने ह्रदय से लगाएगी तब तुम जननी व् जनक सहित सभी कुटुंबजनों को मेरे ह्रदय की व्यथा कहना | भाई भौजाई जब तुम्हें हाथों में ग्रहण करेंगे तब तुम सलिल स्नेह की वर्षा कर हाथ जोड़ कर उनसे विनती करना और कहना भैया मुझे ले आओ | 

Wednesday, 23 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 8॥ -----

खोल के पुरट-पट घन स्याम रंग दिखराए रे, 
हाय हरियारा सावन झुम के नियराए रे..,

रूप हरे धूप भरे इंद्रधनुष कहुँ चंग दै, 
गरज-गरज घोर घनी काली घटा छाए रे.., 

गौर गगन ग्वाल कर लेइ जल तरंग माल,
थिरकत जमुना के तट स्याम उर मिलाए रे..,


बिरुझाइ लट बेनि बट करधनी तट घट किये,
होरी पनघट पे गोरि नैन पंथ लाए रे..,

बैरन सहुँ बैर पड़े डास डँसे बिरहन घन, 
पिय के पेमदूत बन बूँद-बूँद बरखाए रे.., 

बाबुल मोरे मोहे नैहर लीजो बुलाए.....
  

कहुँ = को या कहीं 
चंग = खेंचना , लटकाना 
गौर गगन ग्वाल = उज्जवल आकाश रूपी ग्वाल, मित्र  
कर = हाथ 
उर = हृदय 

Tuesday, 22 May 2018

----- ॥ दोहा-पद 7॥ -----

खोल के पुरट-पट घन स्याम रँग दिखाए है, 
होरी हाथ जोरि मोहे सबहि ढंग मनाए है.., 

पाए पाति पवन संग नभ बढ़ि चढ़ि पतंग, 
कासि थोरि थोरि डोरि अपने सँग मिलाए है..,


सपन नव दए के नैन रैन चरन भए बिहंग, 
भोरी चोरि चोरि रंग में भंग मिलाए है.., 



प्रीतम हरि लाल सरि करि ताल धरि रँग-बिरंग 
हो री होरी होरी बिन रे मोहे अंग लगाए है 

पुरट-पट = सुनहरा घूँघट, बिजली का घूँघट 




खोल के चश्मे-जद यूँ शाम रंग दिखाए, 
दस्ते-सफ़हे पे शफ़क़ टूट के बिखरी..,  

----- ॥ दोहा-पद 6॥ -----

बाबूजी मोहे नैहर लीजो बुलाए, 

नैन घटा घन बरसन लागै घिर घिर ज्यों सावन आए, 
पेम बिबस ठयऊ सनेहु रस जबु दोइ पलक जुड़ाए.., 

भेजि दियो करि ह्रदय कठोरे  काहु रे देस पराए, 
बैनन की ए बूंदि बिदौरि छन छन पग धुनि सुनाए..,


मैं तोरि बगियन केरि कलियन फुरि चुनि पुनि दए बिहाए,
ए री पवन ये मोरि चिठिया बाबुल कर दियो जाए..,


पिय नगरी महुँ सब कहुँ मंगल चारिहुँ पुर भए कुसलाए, 
सुक सारिका अहइँ सबु कैसे पिंजर जिन रखिअ पढ़ाए.....