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Thursday, 13 June 2019

----- ॥पद्म-पद 35 ॥ -----,

------ || राग-मेघमल्हार | -----
गरजि गरजि बरखा ऋतू आई
घोरि घटा एक एक परछाई

गरजि गरजि नभ घन आए ,
बादत मधुर मधुर अल्हादत नदि परबत परी पधराए | १ |
घुमरि घटा छननन झनकारे देखु बरखत छत छत छाए |
झुनुरु झुनुरु करि झरि झरि बुँदिआ कसि रसियन माहि अपुराए | २ |
रुर नुपूरन्हि के रूप धरी बनि झाँझरिआ परि पाए |
ऐ री सखि एहि दमकिहि दामिनि कि कटि कौधनिआ कौंधाए | ३ |
करन धार कौ आँचर देई पुरट पट अध् सीस धराए |
निरखि छटा छन छबि असि नीकी लोगन्हि मन अति सुख पाए | ४ |
सींचत तरु बन उपबन डोलै गहे अमरित घट अभराए |
दए जल पीपलि बट हरियावत पुनि पनघट गई पधराए | ५ |
धरेउ ओंठ कर कियौ अँजुरी दुइ बूँद कै आस लगाए |

गहि घट ओंक झट दे घारी जूँ तट तट प्यासत पाए | ६ |
घोर घाम सिरु तिसत कंठ बहु आह पथिक पंथ पेखाए |
करसि करसि कर दए भरि कलसी तापर नहीं पिअत अघाए | ७ |
अतिअ मीठ मिसिरी रस लागै देहु और कहत सकुचाए |
चलिए अजहुँ सखि संभु दुआरे कहा  नैनन सोंहि दुराए ? | ८ |
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आए पावस पाहुन पिया रे
अंजन सहुँ कारे कारे
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----- || राग -भैरवी || -----
बादल तोरी पालकी पवन कहारा
घन साँवरा सलौना तोरा साजन जग सोंहि न्यारा |
हंस दियो रे हिरन दियो रे दियो हीर को दहेज्यो
भूरि भूषन न्यौछारि तोहि पियहि के द्वारि भेज्यौ
मनि रतनन कौ आगर तोरा बाबुल प्यारा प्यारा
बिजुरी चुनरिया सीस पट देइ के
पुरट करि कंकनिया कौंधन  तट देइ के
कंठ घरी बूंदन करि मुतियन के हारा
बादल तोरी पालकी पवन कहारा...
माथ तोरे लाल करी ललटीका लोलती
कानन परी कुंदन की कुण्डलिआ बोलती
बरखाती बुंन्दतोरे मुतियन के हारा

 सूरज जटी चंदा जटी अरु  तारन जटी चूनरी
मनि मरकत करि मूँदरी


आगे पाछे परिजन ते नैना बचाई के
संग झलक लेत चलत तोरी छटा छब पै रिझाई के

हेरी घोर घटा चित्त चोर तोरा प्रीतम हरियारा
सिंगारा

Friday, 17 May 2019

----- ॥पद्म-पद 34 ॥ -

 रे पलकन्हि पाँखि पखेरे, 
घनिघनि अलकनि पिंजर देई कन खाँवहि छिन छिन केरे..,

भोर भईं नभ उड़ि उड़ि जावैं सो उठिते मूँह अँधेरे ..,
पहरनन्हि के परधन पहरैं प्यारे पियहि को हेरें.., 

बैसत पुनि छत छत छाजन पै सुरति के मुतिया सकेरे..,
बिचरत बीथि बीथि थकि जावैं सिरु पावत घाउँ घनेरे.., 

तापर हेरी हेर न पावैं अरु केहि फेराए न फेरें.., 
ढरकत दिन अब निकसिहि चंदा रे हारि कहैं बहुतेरे..,

तबहि बियद गत होत बिहंगे बिहुर चरनन्हि निज डेरे.., 
आन बसे साँझी सपन सदन करि नैनन रैन बसेरे..,

फिर मौसमे-गुल खिल खिल के महके 
दरख्तों के शाख़सार नए मेहमानों से चहके 




Tuesday, 14 May 2019

----- ॥पद्म-पद ३३ ॥ -----

                             बुधवार, १५ मई, २०१९                          
-----|| राग-मल्हार || ----

बरखे घटा घनकारे नयन से.., 
घिर घिर आवैं सो पहिले सावन से..,  

पलकन कै सीपियन में मोतियन की बुँदिया..,
लटकत लड़ि पड़ते लट पड़ेउ अलकन से.., 

झरि झरि सो गालन के छाजन पै झूरैं.., 
घडी घडी झड़ी करत लपटे रे अधरन से.., 

चढ़ी चढ़ीवहि सो आँट पे परी परी के गाँठी..,
कंठ सहुँ उतरे रे रसि रसि के रसियन से.., 

निरखत रे छबि प्यारे प्रीतम पिया की.., 
प्रीति सहित मेलत हरिदय के दरपन से.....
--------------------------
 रे पलकन्हि पाँखि पखेरे 
घनिघनि अलकनि पिंजर देई कन खाँवहि छन छन केरे 

भोर भईं नभ उड़ि उड़ि जावैं सो उठिते मूँह अँधेरे 
पहरनन्हि के परधन पहरैं प्यारे पियहि को हेरें 

बैसत पुनि छत छत छाजन पै सुरति के मुतिया सकेरे 
बिचरत बीथि बीथि थकि जावैं सिरु पावत घाउँ घनेरे 

तापर हेरी हेर न पावैं अरु केहि फेराए न फेरें 
ढरकत दिन अब निकसिहि चंदा रे हारि कहैं बहुतेरे 

तबहि बियद गत होत बिहंगे बिहुर चरनन्हि निज डेरे 
आन बसे साँझी सपन सदन करि नैनन रैन बसेरे 

Wednesday, 20 March 2019

----- ॥पद्म-पद ३२ ॥ -----,

              ------|| फाग || -----
मोपे भरी भरी के पिचकार न असोइ रंग डारौ पिया |
होरिया के दिन देइ के द्वार न ऐसोइ पट ढारौ प्रिया ||

अलक पलक घनस्याम तोरी बिजुरी गिराए |
कोदंडु कासि कासि के तीछे बैनन्हि चलाए ||

करके नैनन को बाँकी कटार मोहे ऐसे न निहारो प्रिया |

मेले रंग माहि रंग मेले राग माहि राग |
मेले गगन संग धरती खेले फागुन मैं फाग ||

तुमभी गलबहियाँ न्यौछार तनिक लाज परिहारौ प्रिया |

पाके प्रीति के रंग कुमकुम करतल पै धार |
होरी होरी बोल के रही गोपियन बौछार ||

गूंजे ग्वालन ते गाँव गलियार रंगधुरी बिखारौ रसिया |


Thursday, 6 December 2018

----- ॥पद्म-पद ३१॥ -----,

 ----- || राग-      || -----
नीर भरे भए नैन बदरिया..,
चरन धरत पितु मातु दुअरिआ..,
अलक झरी करि अश्रु भर लाई बरखत भई पलक बदरिया..,
बूँदि बूंदि गह भीजत आँचर ज्यौं पधरेउ पाँउ पँवरिआ..,
घरि घरि बिरमावत भँवर घरी  कंकरिआ सहुँ भरी डगरिआ..,
नदिया सी बहति चलि आई बिछुरत पिय कि प्यारि नगरिया..,
 दरस परस के पयस प्यासे तट तट भयऊ घट नैहरिआ..,
 घट घट पनघट आनि समाई सनेह सम्पद गही अँजुरिआ....


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गगण में घण साँवरो बिराज्यौ
 गरज गरज गह गह घनकारौ बादलियो घन बाज्यौ
कारौ काजलियो सों साज्यौ 

Wednesday, 28 November 2018

----- ॥पद्म-पद ३० ॥ -----,

----- || राग-भैरवी || -----
काहे कीज्यो बाबुल मोहे पराई रे |
कहहु कहा छन भर कहुँ तोहे मोरी सुरति नाहि आई रे || १ ||
प्रान दान दए मोहि जियायो काहे परदेस पठाई रे |

पोस्यो बहु बरस लगे बिछुरत लागि न बारि |
पिय के गाँव पठाए के  पल महि दियो बिसारि || २ || 

चारि गलीं दुइ चौंहटीं अजहुँ छितिज लगी दूर दुराई रे |
निकट बसत कबहुँ न मिलि आयो अह एहि तोरी निठुराई रे || ३ ||

हम्हरेहि हुँते लहुरी भई का तुहरी गह अँगनाई रे |
बैस पंखि गहि पवन खटोरे उड़िअ गगन अतुराई रे || ४ ||

गह्यो पियबर पानि जूँ सीस दियो सिंदूर | 
गाँव पराया देइ के कियो नैन ते दूर || ५ || 

दहरी द्वार पट पारि करत जइहउ करतल कसि धाई रे ||
बरखत नैन बिन सावन कहियो घन काल घटा गहराई रे || ६ ||

पवन पँखुरि पाइ के री पतिआ पितु के देस |
करतल गहि दए गलबहीँ  एहि दिज्यो संदेस  || ७ ||

पवन पाँख गहि गगन बीथिका मम पितु गेह तुम्ह जाई रे |
लिखिअ ए सनेसा कह्यो दियो  भरि कंठहियो लपटाई रे || ८ ||

कंठ लपटाइ के जिन्ह रख्यो जी ते लाइ  ||
ओ रे मोरा बाबुला ओहे लिजो बुलाइ || ९ ||







Saturday, 24 November 2018

----- ॥पद्म-पद २९ ॥ -----

----- || राग-रागेश्री  || -----

बैन दुसह पिया हम ना सहेंगे
दरस-परस बिनु पेम पयस बिनु मीन सरिस तलफेंगे || १ ||
पंखी पपीही पटतर पिय पिय पलछिन प्रति ररिहेंगे ||
जानत दारुढ़ दुसह दहन बरु बिरहा अगन दहेंगे ||  २ ||
छाँड़ देस गह गहस तिहारे नैहर गह जा रहेँगे ||
रहेंगे अजहुँ तुम सहुँ दूरी पद पितु पंथ गहेंगे || ३ ||
बासर चैन न रैन सैन नहि नैनन नींद लहेँगे ||
चहेंगे तुम्हरे हरिदय देस तुमकहुँ नाहि चहेंगे || ४ ||
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Friday, 23 November 2018

----- ॥पद्म-पद २८ ॥ -----,

----- || राग- सारंग ||-----
पिय हमहि ए कलि कलह न भावै |
निर्जर नैनि भई निर्झरनी झरझर नीर बहावै ||१ ||
पलक पहारी कहत कपोलक असुँअन ढर ढर आवै ||
तुम्हरे गह घरी घरी आनि हम्ह सोंहि बिरुझावै || २ ||
करिअ कर सब कृत करतब काजु दोषु धरिअ बिसरावै ||
हरिदय पावक बूझ चहे तव पेम पवन जौं पावै || ३ ||
भेदिनि बैरन परम बैर करि हठि घृत देइ दहावै ||
कुटिल कोदंड खैंच खैंचि के बियंग बैन चलावै  || ४ ||
मरमु भेद घन चोटि करिअ बहु बहु खरि खोटि सुनावै ||
जौ मुख आवै सो कहि निस दिन गरज गरज गरियावै || ५ ||
आपुनि गोई अरु कहि हमरी आगत कहत बतावै  ||
लषन सदगुन गनिहै न मोरे गनि गनि औगुन गावै || ६  ||
करुबर कहनाई कहि कहि के अनकहि कहन कहावै ||
पल छन पहर पिहर के आँगन सुमिरत मन बिरमावै || ७ ||

बिरुझावै = उलझना
आगत = गृहागत = अतिथि
गृह भेदिनी = क्लेष कर्ता
गरियावै = अनुचित वचन कहना
बिरमाना = बहलाना 

Thursday, 22 November 2018

----- ॥पद्म-पद २७ ॥ -----,

----- || राग- केदार || -----
बुए बिआ पिय पेम अँकूरे
जो दिन तुम्हरे संग बिरुझे अजहुँ सो दिन गयउ रे भूरे || १ ||
सांझ भोर करि उड़ि उड़ि जावै पलपल पल छन पंख अपूरे ||
जो दुःख सों सुख मुख बिरुझायो अजहुँ त अखियन सों भए दूरे || २ ||
जो सुख सों दुःख मुख मलिनायो रे अजहुँ त सो सुख भए धूरे ||
हरिदय देस नैनन फुर बारि बिरवा प्रतीति फूर प्रफूरे || ३ ||
 डोरि देइ पिय पलक हिंडोरे पुलकित प्रीति डारि पर झूरे || 
हमरे बिन तुम आधे अधबर तुहरे बिन हम आध अधूरे || ४ ||
कहत  डरपत मन रे साजना बैरि बिरहा बहुर न बहूरे ||
सुनहु पिया बर प्रीति ए साँची कहँ सौं लई तुहरे सहूँरे || ५ ||


Thursday, 15 November 2018

----- ॥पद्म-पद २६ ॥ -----,

   ----- || राग-भैरवी || -----

सोहत सिंदूरि चंदा जूँ रैन गगन काल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिआ तुहरे भाल पे..,

कंगन कलाई कर पियतम संग डोलते..,
पाँव परे नूपुर सों छनन छनन बोलते..,
छत छत फिरत काहे  दीप गहे थाल पे..,
जब लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

चरत डगरी रोकि रोकि बूझत ए बैन कहे.., 
बिरुझे मोरे नैन सहुँ काहे तुहरे नैन कहे ..,
देइ के पट पाटली भुज सेखर बिसाल पे..,
लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे..,

गुम्फित छदम मुक्ता हीर मनि बल के रे..,
करत छल छंद बहु छन छब सी झलके रे.., 
रिझियो ना भीति केरी मनियारि जाल पे.., 


लाल लाल चमके रे बिंदिया तुहरे भाल पे.....

Thursday, 8 November 2018

----- ॥पद्म-पद २५ ॥ -----,

लाल लाल तिलक रेख बसत पिया के भाल रे..,
हिलमेलती उरु रुचिरु गज मुकुतालि माल रे''..,

पीत बसन देह बसे नैनन में नेह रे'..,
बहुरि बहुरि मोहि कसे बहियन में लेह रे..,
दीप माल थाल धरे मोरे कुमकुम करताल रे..,

गली गली मनि दीपक की अलियाँ सँवार के..,
छाँड़त रे फूरझरी श्री की आरती उतार के..,
आजु अली सुबरनी भए गगन घनकाल रे..,

देख देख छबि छटा छन लोचन अभिराम जूँ..,
बारिअहिं अंग अंग कोटिकोटि सत काम जूँ..,
झरोखन्हि लगी जुवतीं होवति निहाल रे..,

बाँकी बर करधनि कर निरखत घनस्याम से..,
चितबत चित चोरि लेहि रे झलक देत राम से..,
अपलक भए पलक चलत जब मंजुल मराल रे..,

मिलत कंठ लाई पुर के लोगन्हि बिलोक के..,
हँसत कहत कहिबत कछु डगरी रोक रोक के..,
सोहत दए पाटल पट  भुज सेखर बिसाल रे.....

----- ॥पद्म-पद २४ ॥ -----,

करतालि अस्थाल धरे  दीपन केरी मालि |
धन लखी का रूप बरे आई सुभ देवालि || 

हिरन सकासि साँझि करत करत रूपहरि भोर |
रिद्धि सिद्धि, समृद्धि संग चली गाँउ कहुँ ओर ||

पहिरी ससि कर मंजरी धरनि करी श्रृंगार |
धामधाम धन धान ते भरे पुरे भंडार ||

संपन्न सबहि काल भए भयो दारिदर दूर |
गह गह सुख सौभाग की भइ सम्पद भर पूर ||

धवल भीति पट पहिर के पहिरे मनिमय जाल |
पुरट छटा छन छबि धरत छहरत कमलिनि ताल ||

भाँति भाँति कर बस्तु लिए बैसि हाट बनिहारु |
भइ सुंदर सब गलीं भए चारु चौंक चौबारु ||

हरितक गौमय घोरि के, गह आँगन कहुँ लीप |
नव पट पहिरें गेहनी गेहि सजावहिं दीप ||

चारु चौंक पुराई के बाँधे बंदनिवार |
पुहुप भूषित भइ देहरि कंदिल देइ द्वार ||

पीत लाल हरि केसरी रंगोरी के रंग |
चित्रित कीन्हि गंगोत्री निकसत पावनि गंग ||

पाक बनाई रसवती बिंजन बहु पकवान |
मधुराई मुख घोरते मधुर मधुर मिष्ठान ||

भरे भेस मनभावते साजत सबहि सुसाज |
बहुरि पुरजन करन लगे पूजन केर समाज ||

उदये मंगल काल जब दीपक भरे अलोक |
भूति मई भू करत भए ज्योतिर्मय त्रिलोक ||

सुभ महूरत अगन धरत उजयारत चहुँ कोत |
जगमग जगमग जग करत जागिहि जगती जोत ||

जगजननि जग मंगल कर भूषन भेस सुसाजि |
कुमकुम चरनन धरत पुनि  अम्बुजासन बिराजि ||

परन बेलि के गंठि ते गुम्फित नलिन मृनाल |
ललित माल सों कलित कर किए अर्पित निर्माल |

भूषन भूषित श्री भई बसा अरुनमय भेस  |
दाहिन बाम बिराजते सोहत गिरा गनेस ||

लछित सिंदूरि साथिआ बहियन गयो लिखाए |
जगद बिभूति संग रहें गनपति सदा सहाए |

मंगल मौलि बँधेउ कर तिलक रेख दए भाल |
अक्षत कर्पूर गहे  पुनि सजी आरती थाल ||

किए नाद मुख संख पुरे बाजहिं पनव  मृदंग |
गावहिं सुमधुर बंदना पेम मुदित सब संग ||

पंचगव के चरनोदक पंच पात्र कर योग |
गहत पंचोपचार पुनि जगज्जननि गहि भोग ||

फुरझरी नभ छूटती ए सनेसा दए सुहाए |
दुख दारिद दुराई के सुख सम्पद नियराए ||

करतलों के थाल ने दीपकमाला को धारण कर लिया है, धन लक्ष्मी का रूप वरण किए शुभ-दीपावली के उत्सव का आगमन हो गया है | संध्या को स्वर्णमयी व् भोर को रजतमयी करते हुवे रीढ़ी सीधी के संग समृद्धि अब गांव की ओर चल पड़ी | अनाज की बालियों को अभरित कर धरती ने श्रृंगार किया तो अब प्रत्येक भवन धन-धान्य के भण्डार से भर गए | अब कहीं विपन्नता नहीं रही दरिद्रता को दूर करते सभी काल संपन्न काल हो गए, घर-घर सुख सौभाग्य की सम्पदा से परिपूर्ण हो गए  | इस सम्पदा को प्रकाशित करते चूने से लेपित भित्तियों में मणिमय झालरें आभारित की हुई हैं इन मणिमय झालरों की स्वर्णिम आभा विधुत की सी क्षणिक प्रभा धारण किए कमलिनी से युक्त सरोवर में बिखर रही है | विभिन्न प्रकार की वस्तुएं लेकर वणिक पणग्रंथि में विराजित  हैं | सभी गलियां और सभी चौंक-चौपंथ अत्यंत सुहावने व् शोभान्वित प्रतीत हो रही है | गायों के तत्कालोत्सर्जित हरित गोमय से घर-आँगन को लीपित कर नवल-नवल परिधानों को धारण किए गृहणियां व् गृहस्वामी दीपकों की सुसज्जा में व्यस्त हैं | द्वारों पर केला की शाखऐं प्रदानकर देहली को पुष्पाभूषणों से विभूषित किया तदनन्तर सुन्दर चौंक (आते से रचित आयाताकार चौकोण ) रचना से परिपूरित कर बंधनवार विबन्धित किए गए | पीतम, लाल हरी केसर आदि रंगों से रंगोली से गंगोत्री चित्रित की गई जहाँ से परम पावनि गंगा का उद्गम  हो रहा था| रसोई ने मुख में मधुरता घोलते मधुर-मधुर मिष्ठान के सह
अनेक प्रकार के व्यंजन व् पकवान रचित किए| मन को लुभाने वाले वेशभूषा व् सभी साज-सामग्रियों से सुसज्जित पुरजन ततपश्चात जगद-विभूति के नीराजन की तैयारी में जूट गए | मंगल बेला के उदयित होने पर दीपकों में आलोक प्रतिष्ठित हुवा,भूमि को ऐश्वर्य से युक्त करते हुवे तीनों लोक उद्दीप्त हो उठे | दिशा-दिशा को उज्जवलित कर जगताजगत को जगमग करते हुवे शभु मुहूर्त में अग्निधारण किए अखंड ज्योत जागृत हुई | जगज्जननी ने जग हेतु मंगलकर वेशाभूषणों से सुसज्जित हुईं ततपश्चात कुंकुंमाय चरणों को न्यासित करते अम्बुजासन में विराजित हुईं| पर्ण बेलों की ग्रंथियों से गूँथी नलिन मृणाल की सुन्दर मालिका कलित कर जगज्जननी को निर्माल्य अर्पित किए गए |जगद विभूति अरुणमयी वस्त्र धारणकर भूषणों से विभूषित हुईं जिनके दाहिन-वाम में माता सरस्वती व् भगवान गणेश जी विराजते सुशोभित हो रहे हैं| सैन्दूरी स्वास्तिक से लक्षित कर बही खातों में उल्लेखित किया गया 'जगद्विभूति के संगत श्री गणपति सदा सहाए रहें'|हस्त में मंगल मौली बांधकर श्री के भालपर तिलक लक्षित किया गया अक्षत व् कर्पूर ग्रहण किए तत्पश्चात आरती थाल सुसज्जित हुई |मुखापुरित शंख निह्नादित हो उठे पणव व् मृदंग आदि बजने लगे प्रेममुदित होते हुवे सभी एक साथ श्री की आरती-वंदना का गान करने लगे | पंचगव्य का चरणामृत व् पञ्च-पात्र में संयोजित पंचोपचार ग्राह्य कर नैवेद्य ग्रहण किया | नभ में छूटती फूलझड़ियां यह सन्देश देते सुशोभित हो रही हैं कि दुख-दरिद्रता दूर करते हुवे सुख-समृद्धि निकट आए | 

अस्थाल = थाल
सकासि =समरूप, जैसी
ससि मंजरी =अन्न कीबालियाँ
बनिहारु =वाणिज्यक 
चारु =सुन्दर 
हरितक गौमय =तुरंत का हरा गोवर
पट=वस्त्र 
कंदिल=केले की शाखें 
रसवती =रसोई 
बिंजन =व्यञ्जन 
समाज =तैयारी
गिरा =सरस्वती 
बहियन =बही -खाता 
परन बेलि =पान की बेले 
भाल =मस्तक 
पनव  =पणव,एक प्रकार ढोलक
पंचगव्य =देशी गाय के गोमय,मूत्र,दुग्ध,दधी,घृत का मेल
पंचोपचार =धूप,दीप,गंध,पुष्प,नैवेद्य इन पांच द्रव्यों से किया गया पूजन 
नियराना =निकट आना
सनेसा =सन्देश
आई सुभदीपावली गहे दीप कर माल |
धन लखिहि के रूप धरे कृत सम्पन सब काल ||

क्षीरोदधि केरि धिअदा सुख सम्पद करि दात |
अगजग सिस नवाए तिन्ह कहत आपुनी मात ||

रजत मई सांझी संग करत सुनहरी भोर |
अँधियारा समिटाए के चहुँ पुर भरत अँजोर ||



नन्हे नन्हे दीप
अगनि संगत सार गहे करत जगत उद्दीप 

Monday, 5 November 2018

----- ॥पद्म-पद २३ ॥ -----,

                 ----- || राग-ललित || -----

रैन ज्योति नैन ज्योति जगा ज्योति जग जगमगे | कनक कंगूरे कलस ज्योति अगत जगत जगरत जगे ||
नलिन ज्योति मृनाल ज्योति ताल ताल ज्योतिर्मई |
उदयत मंगल काल ज्योति घोर गहन घन तम जई ||


दमकत दीपक माल ज्योति ज्योतिर्मय सुभ दीपावली | 
भीति भीति मनि जाल ज्योति बीथि बीथि सब गली गली ||
उदयत मंगल काल ज्योति दीप बरे
तिलक लषन दिए भाल ज्योति जग जोए पानि बंदन करे |
तिलक लषन दए भाल ज्योति तिलक

करतल हिरन थाल ज्योति छजत छत छत पंगत परी |
लखत लालमलाल ज्योति छूटत जब नभ फूरझरी ||

कलित किरीट कपाल ज्योति मञ्जुलित मुख मंडलम |
धन लखि के निर्माल ज्योति सुभोदय सुभदर्शनम ||
ज्योतिर ललाटुलम |



भव ज्योति भव भूमि ज्योति ज्योति ज्योति त्रिभुवनं

भवन भवन ज्योतिर करत भूतिमई भई भगवते |
करत पूजन सब धरत ज्योति भरे भेस मन भावते |
सोहत गिरा संग गनपति दाहिन बाम बिराजते ||
गिरा ज्योति ज्योतिर्मय श्री गनपते |





Monday, 23 July 2018

----- ॥ दोहा-पद २० ॥ -----,

----- || राग -मेघमल्हार || -----
आई रे बरखा पवन हिंडोरे,
छनिक छटा दै घट लग घूँघट स्याम घना पट खोरे |
 छुद्र घंटिका कटि तट सोहे लाल ललामि हिलोरे ||
सजि नव सपत चाँद सी चमकत, लियो पियहि चितचोरे |
भयो अपलक पलक छबि दरसै लेइ हरिदै हिलोरे |
परसि जूँ पिय त छम छम बोले पाँव परे रमझोरे |
दए भुज हारे रूप निहारे नैन सों नैनन जोरे ||
बूँद बूँद बन तन पै बरसे अधर सुधा रस घोरे |
नेह सनेह की झरी लगाए भिँज्यो रे मन मोरे ||
चरन धरे मन मानस उतरे राजत अधर कपोरे |
गगन सदन सुख सय्या साजी जलज झालरी झौंरे ||
सुहाग भरीं विभाबरि सोभा जो कछु कहौं सो थोरे |
नीझरि सी निसि रिस रिस रीते भयउ रे रतिगर थोरे ||







Thursday, 12 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १९ ॥ -----,

                   ----- ॥ गीतिका ॥ -----
हरिहरि हरिअ पौढ़इयो, जी मोरे ललना को पलन में.,
बल बल भुज बलि जइयो, जी मोरे ललना को पलन में.,

बिढ़वन मंजुल मंजि मंजीरी, 
कुञ्ज निकुंजनु जइयो, जइयो जी मधुकरी केरे बन में..... 

बल बल बौरि घवरि बल्लीरी,
सुठि सुठि सँटियाँ लगइयो लगइयो जी छरहरी रसियन में.....

 पलने में परि पटिया पटीरी, 
बल बल बेलिया बनइयो बनइयो जी मोरे ललना के पलन में..... 

दए दए दसावन ओ री बधूरी , 
सुरभित गंध बसइयो बसइयो जी मोरे ललना के पलन में.....


हरिहरि हरिअ  = धीरे से 
हरुबरि = मंद-मंद 
बिढ़बन = संचय करने 
मंजि-मंजीरी = पुष्प गुच्छ, कोपलें पत्र इत्यादि 
मधुकरी केरे बन = भौंरो के वन में- मधुवन 
बल बल बौरि घवरि बल्लीरी =  आम के बौर से युक्त लतिकाएं । बढ़िया से गुम्फित कर 
पटिया पटीरी =चन्दन की पटनियाँ 
बल बल बेलिया = घुमावदार बेलियां 
दसावन = बिछावन 

Wednesday, 11 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १८ ॥ -----,


            ----- || राग-बिहाग | -----
बाँध मोहि ए प्रेम के धागे प्यारे पिय पहि खैंचन लागे  |
अँखिया मोरि पियहि को निरखे औरु निरखे नाहि कछु आगे ||
निरखै ज्योंहि पिय तो सकुचै आनि झुकत कपोलन रागे |
ढरती बेला सों मनुहारत  कर जोर मन मिलन छन मागे ||
दिसि दिसि निसि उपरागत जब सखि गै साँझी नभ चंदा जागे | 
मिले दुइ छनहि त कर गहि चुपहि पद चापत पिया लेइ भागे ||
धरे करतल भरे पिय बैंयाँ सब लोकलाज दियो त्यागे |
बँध्यो तन मन पेम के पासु मोरे रोम रोम अनुरागे  ||
चितब रहिउ कहँ पिय मोहि काहु त गिरे पलक पियहि समुहागे |
करनन्हि फूर परस प्रफूरे पैह पिया के अधर परागे ||
लगन मिले ऐसो सजन मिले एहि भा हमरे सौभागे ||

 रैनी द्वार बिराजहि लेइ सुख सौभाग |
सुहासिनि मधुरिम मधुरिम गावत रहि सोहाग ||

भावार्थ = प्रिया कहती है -- देखो ( सखी )ये प्रेम के धागे मुझे प्यारे प्रीतम के पास खैंचने लगे हैं | मेरे नयन प्रीतम को ही देख रहे हैं इन्हे आगे और कुछ भी नहीं दिखाई देता ||  प्रीतम ने ज्योंहि मुझे देखते हुवे देखा तब लज्जावश  नयन झुक आए और  कपोलों को सुरागित कर दिया || ढलती हुई बेला से मनुहार करते मन ने मिलन के क्षण मांगे || संध्यावसान के पश्चात दिशा दिशा में निशा को अरुणिम करते हुवे जब नभ में चंद्रोदयित हुवा तब मिलन के दो क्षण प्राप्त हुवे तब प्रीतम ने चुपके से मेरा हाथ पकड़ा और मुझे दबे पाँव ले भागे || प्रीतम ने सभी लोक मर्यादाओं का त्याग करते हुवे प्रीतम ने करतल धरे जब उन्होंने मुझे भुजाओं में भरा तब हे सखी ! तनमन प्रेम पाश के बंध गए और रोम रोम अनुराग से परिपूरित हो गए  | मुझे क्यूँ देख रही थीं ? जब प्रीतम ने यह पूछा  तो ये पलकें उनके सम्मुख अवनत हो गईं  | प्रीतम के अधर परागों के स्पर्श को प्राप्तकर कर्णफूल जैसे प्रफुल्लित हो उठे | लग्न उदयित हुवे तो ऐसे प्रीतम मिले हे सखी यह मेरा सौभाग्य है |

----- || राग-दरबार || -----
लो फिर हर शै हुई ज़ाहिरॉ.., 
ए चाँद तेरे नूर से..,
अपनी शम्मे-रु को अब..,
मैं किस तरह अर्जे-हाल करूँ..,

शाम ज़रा स्याहे-गूँ तो हो..,
लम्हे भर को तू हिज़ाब कर..,
सिल्के-गौहरे-गुल के दस्त..,
 मैँ ख्वाबे-शब विसाल करूँ.....

Sunday, 8 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १७ ॥ -----,


साँझ सैँदूरि जोहती पिया मिलन की रैन | 
रीति के बस दिवस भयो भयो प्रीति बस नैन || 

स्वजन सोँहि बैनत गए नैन पिया के पास | 
लखत लजावत पियहि मुख बिथुरी अधर सुहास || 

ना निलयन ते दूर हैं न नैनन ते दूर | 
सौमुख मोरे साँवरे तापर बिरह अपूर || 

हेली मेली मेलि जूँ हेलि मिले पुनि कोइ | 
मिले नहीं पर पिया सहुँ घरी मिलन की दोइ || 

अंजन कू अंजन कियो पलकनि करियो पाति | 
नैना ठहरे बावरे बैने हिय की बाति || 

भावार्थ : - सिन्दूरमयी संध्या प्रियतम के मिलन-रात्रि की प्रतीक्षा में थी  दिवस रीतियों के अधीन तो प्रिया के नेत्र प्रीति के अधीन हो चले थे || १ || स्वजनों से वार्तालाप करते जब प्रीतिपूरित नेत्र प्रियतम के पास गए तब प्रियतम के लज्जाशील मुख-मंडल को देखकर प्रिया के अधरों पर एक मंद हास बिखर गई || २ || न ह्रदय  से दूर थे  न ही नेत्रों से दूर थे प्रियतम  सम्मुख उपस्थित थे तथापि वियोग भरपूर था  || ३ || संगी-साथी  मेल मिलाप कर लौटते तो प्रियतम को फिर कोई और पुकार लेता इस प्रकार दिवसभर में प्रियतम को प्रिया से मिलाप हेतु दो क्षण तक नहीं मिले || ५ || प्रीति की अधीनता ने काजल को मसि व् पलकों को पत्र में परिणित किया और बावरे नैन अंतर्मन की बातों को व्यक्त करते चले गए ( जिसे न जाने कब प्रियतम ने पढ़ लिया )|

Tuesday, 3 July 2018

----- ॥ दोहा-पद १६ ॥ -----,

बादहि बादल बजहि बधावा,
पिया भवनन मोदु प्रमोदु मन सावन घन घमंडु भरि छावा | 
मंगल धुनि पूरत अगासा परत रे पनवा माहि घावा  ||   
हेरी माई देउ सगुनिया परिअ दुअरि दुलहिन के पाँवा |  
कंठि हारु कर करिअ निछावरि तृन तोरत सिरु बारि फिरावा ||   
सकल ननदिया आरती करहि पावै सोइ जोइ मनभावा | 
लोक रीति करि पाएँ पखारै दूब पयस मय थार धरावा ||  
छुटत कंगन खोरत कर गाँठि हारत गए पिय खोरि न पावा  |  
दूबि संगत धरेउ बरायन गोतिनि कंगन द्युत खिलावा || 
गह करतल पिय बारहिबारा ,जय पावत मुख बिहँस सुहावा  |  
गावैं जहँ तहँ लोग लुगाई निरख नयन भर पियहि बिहावा || 

भावार्थ : - बादल वादन कर रहे हैं जिसमें 'बधाई' बज रही है | प्रीतम के भवन पर परिजनों के मन में आनंदोल्लास, सावन के मेघों जैसे घुमड़ कर छा रहे हैं | नगाड़ों पर चोट पड़ रही है, मंगल ध्वनि से आकाश परिपूरित हो रहा है | वधु के आगमन का सन्देश देते हुवे देवर ने कहा अरी जननी शगुन दो तुम्हारे द्वार पर दुलहन का आगमन हो रहा है तब  होती जननी बलैयाँ लेती कंठ पर के हार को वधु के शीश पर वार कर न्यौछावरी देती हैं | सभी ननदें वधु की आरती उतारती हैं और रूचि अनुसार भेंट प्राप्त करती हैं | लोक रीति का निर्वहन करते वरवधू का चरण प्रक्षालन किया गया दूर्वा पायस से युक्त थाल सामुख आधरित की गई | सप्त-ग्रंथि पड़े कंगन खोलने के खेल में  प्रीतम की हार होती हैं वह ग्रंथि खोल नहीं पाते | तदनन्तरखोले गए कंगन के छल्ले को दूर्वा के साथ पयस भरी थाल में ज्येष्ठ पत्नी वरवधू को कंगन के पण की क्रीड़ा करवाती हैं | प्रीतम छल्ला न ढूंढ कर वारंवार वधु का करतल ग्रहण करते हैं तथापि उक्त क्रीड़ा में वह विजय प्राप्त करते हैं उनके मुख का सुहास अतिशय सुहावना प्रतीत हो रहा है | प्रियवर के इस विवाह का दर्शन कर नर नारियां उसकी शोभा को जहाँ-तहाँ वर्णन करते हैं | 

पनवा = नगाड़ा 
घावा = चोट 
तृण तोड़ना = बलैया लेना 
बरायन = विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन को कंगन के साथ पहनाया जाने वाला छल्ला 
गोतिनि = कुल वधु, जेष्ट की स्त्री 
द्युत = पण 


Tuesday, 26 June 2018

----- ॥ दोहा-पद १५ ॥ -----,

हाय भयो (रे)कस राम ए रोरा..,
सांझ बहुरत बहुरेउ पाँखी, नभ सहुँ लाखै सहसै आँखी |
रैन भई ना गयउ अँजोरा ||

कहत दिवस सों साँझि रे पिया, झूठि आँच ते जरइहौ हिया |
कन भरै मन मानै न तोरा  ||

यहु तापन यहु बैरन रारी, हम सों अतिसय तुअहि प्यारी |
अगन लगइ ए फिरै चहुँ ओरा  ||

रे निस दिन केरी कहीबत ए  पास परौस मुख जोर कहत ए |
कह अनभल सकुचाए न थोरा ||

अजहुँ लगन की बेला न आइ  तापर दियरा पौंर पधराए                                                                            निज हुँत पेखै पंथ ए मोरा ||    

भावार्थ : - ये कैसा व्यर्थ का कोलाहल है
संध्या  के लौटते ही पंछी लौट आए,  अभी नभ में सूर्य भी सम्मुख दर्शित हो रहे है || न रैन हुई है न उजाला ही गया है  तथापि यह कैसा कोलाहल है |   संध्या दिवस से कहती रे प्रियतम  झूठी आंच से अपने ह्रदय को तप्त कर रहे हो,  कान भरे बिना तुम्हें विश्राम नहीं मिलता | यह तापस ऋतु और यह कलह बड़ी ही बैरन है, जो तुम्हें हमसे भी प्रिय हैं  ये चारों ओर आग लगाए फिरती हैं |  पास पड़ोस के लोग बातें बनाते हुवे कहते हैं ये झगड़ा तो निसदिन का है इसे क्या सुनना, अनुचित कथन करते इन्हें  किंचित भी संकोच नहीं होता | अभी तो लगन की बेला नहीं आई तद्यपि अपने स्वार्थ हेतु ये दीप ड्योढ़ी पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे हैं..... 

Monday, 11 June 2018

----- ॥ दोहा-पद 14॥ -----,

----- || राग-पहाड़ी || -----

नीर भरी निरझरनी, 
पहाड़ानु छोड़ चली.., 
डब डब अँखियन ते लखे, 
बाबुल की प्यारी गली..,

नैनन की नैया पलक पतवारा, 

हरियारे आँचल में अँसुअन की धारा.., 
 दोई कठारन दोई कहारा, 
दोई कहारन पे.., 
अन्न धन की धानी ले के, 
दो तीर्थों को जोड़ चली.., 

ये साधु संतों की कही बानी, 
नारी नदी तेरी एक कहानी.., 
आँचल में प्रीति पलकों में पानी, 
पलकों में पानी लिए..,  
नई प्रेम कहानि कहने, 
देखो सागर की रानी चली.....