Wednesday, 16 May 2018

----- || रखताँ || -----


मेरे सरापे को जेहन में जगह दो,
के मुस्कराने की कोई तो वज़ह दो..,

वो मरमरीं चाँद जो शब् को न मयस्सर,
उसे हमराज करो और दामन में गिरह दो..,

ख़म को खोल गेसू-ए-दराज़ को संवार के,
लबे-कनार को सुर्खियाँ नज़रों को सियह दो..,

ज़हीनत के ज़मील-तन पे सीरत के हैं ज़ेवर,
दस्ते-दहल को हिना के रंग की निगह दो..,

हर रब्ते-मंद जाँ ऱगे-जाँ से हो नज़दीक,
रवाज़ी शामो-सहन की वो रस्मी सुबह दो..,

मुबारकें शफ़ाअतें सलामतें हो दम-ब-दम,
हम-क़दम को रुख़सते-रहल की रह दो.....

8 comments:

  1. with utmost regards.

    wonderful verse.

    does it not yhe lst line read as
    let the partner , move along , or something else .

    regards
    Kshetrapal Sharma 16.5.18

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    1. सरापा = मूरत
      ज़ेहन में = मन में

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    2. सरापा = मूरत
      ज़ेहन में = मन में

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  2. suprabhat.

    Thank you.

    I may be excused. for erroneous typing . the line starting above with "does ....yhe is the "and lst is last , "
    so pl.

    ....Regards Kshetrapal Sharma , 17.05.18

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    1. मुबारकें शफ़ाअतें सलामतें हो दम-ब-दम,
      आपकी बधाइयाँ, शुभकामनाए और भूल-चूक क्षमा करने की संस्तुति सदैव साथ रहे,

      हम-क़दम को रुख़सते-रहल की रह दो.....
      अब इस जीवन साथी को विदा कर प्रस्थान करने की अनुमति दीजिए.....

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    2. या
      बधाइयाँ, शुभकामनाए और भूल-चूक क्षमा करने की संस्तुति सदैव साथ रहें,
      अब इस जीवन साथी को विदा करवाइये और प्रस्थान करने की अनुमति दीजिए.....

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  4. बहुत बढिया पोस्ट

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